अहंकार से मुक्ति

 अहंकार - दुखों का मूल और संसार में भटकने का कारण


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मै से मुक्ति





संसार को सत्य समझने वाला व्यक्ति अपने मिथ्या अहंकार को भी सत्य समझ बैठता है। जिसने इस नश्वर संसार को ही सब कुछ मान लिया, वह अपने आप को ही इस संसार का केंद्र मान लेता है। उसके लिए बाकी सब उसके प्रतिद्वंद्वी हैं, शत्रु हैं। वह हर पल इसी तुलना में जीता है कि कौन उससे आगे है और कौन पीछे।

आत्मज्ञान कैसे हो


ऐसा अहंकारी व्यक्ति दिन-रात धन-संपदा, पद-प्रतिष्ठा और महंगी वस्तुओं का संग्रह करने में जुटा रहता है। उसका संग्रह किसी आवश्यकता के लिए नहीं, बल्कि दूसरों को नीचा दिखाने के लिए होता है। वह सोचता है कि मेरे पास बड़ी गाड़ी है, बड़ा घर है, इसलिए मैं बड़ा हूँ। वह अपने अहंकार को इन वस्तुओं से सजाता है। उसके मन में एक ही भाव चलता रहता है - "मैं ही हूँ, मेरे द्वारा ही सब होता है, यही लोक है, परलोक कुछ नहीं है। मैं दूसरों से बेहतर हूँ।"


"मैं-मैं" करने में ही उसका पूरा जीवन चला जाता है। वह कभी शांत नहीं बैठ पाता। वह जन्म और मरण के इस अंतहीन चक्र में फँसा रहता है, क्योंकि कर्ता भाव ही जन्म का कारण है। जब तक मन में यह भाव है कि "मैं कर रहा हूँ", तब तक कर्म बंधन बनता रहेगा और कर्म बंधन ही नए जन्म का बीज है।


अहंकार युक्त व्यक्ति का मन कभी स्थिर नहीं रहता, इधर-उधर भागता रहता है। उसे एक क्षण भी शांति नहीं मिलती। वह सोचता है - "मेरे पास जो है, वह कम है। दूसरे के पास ज्यादा है। मैं कैसे उससे आगे निकल जाऊँ? कैसे उसका नाश हो जाए? कैसे मैं सबसे ऊपर दिखूँ?" यही ईर्ष्या, यही जलन उसे दिन-रात जलाती रहती है।


अहंकारी व्यक्ति के पास सारे मानसिक दोष ऐसे आ जाते हैं, जैसे मीठे में चींटियाँ आ जाती हैं। जहाँ अहंकार है, वहाँ घृणा अपने आप आ जाएगी, द्वेष आ जाएगा, काम आ जाएगा, अशुभ विचार आ जाएंगे, लालच आ जाएगा, क्रोध आ जाएगा। मन के सारे दोष अहंकार के मित्र हैं। वे एक साथ ही आते हैं और उसी व्यक्ति के हृदय में डेरा डाल लेते हैं।


यह अहंकार उसे सच्चे सुखों से वंचित रखता है। उसके पास सब कुछ होते हुए भी वह सुखी नहीं होता, क्योंकि सुख बाहर की वस्तुओं में नहीं, मन की शांति में है और अहंकारी मन कभी शांत हो ही नहीं सकता। वह धीरे-धीरे दुखों के सागर में डूबता चला जाता है। ऊपर से वह हँसता हुआ दिखता है, पर भीतर से वह सदा जलता रहता है।


अहंकारी व्यक्ति सदा मानसिक विकार से ग्रस्त रहता है। वह कभी अपनी परिस्थितियों में संतुष्ट नहीं रह पाता। उसे भगवान ने जो दिया है, वह उसे कम लगता है। वह स्वयं ही इस गर्त में पड़ा रहता है और इसी गर्त में पड़े-पड़े वह कर्मों के जाल बुनता रहता है। कभी किसी को धोखा देना, कभी किसी का हक छीनना, कभी झूठ बोलना - ये सब जाल वह स्वयं ही बुनता है। फिर इन्हीं कर्मों के फल को उसे भोगना पड़ता है।


फिर इस जन्म में ही नहीं, वह अनंत जन्मों तक इस संसार में विचरण करता रहता है। कभी मनुष्य बनता है, कभी पशु, कभी और किसी योनि में भटकता है। अहंकार रूपी शत्रु उसे संसार रूपी जाल में कभी शांति से बैठने ही नहीं देता। यह शत्रु बाहर नहीं, उसके भीतर ही बैठा है।


मन में "मैं कर्ता हूँ" की बुद्धि होने के कारण वह परमात्मा से दूर चला जाता है। जहाँ "मैं" है, वहाँ परमात्मा नहीं। जैसे अंधकार और प्रकाश एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही अहंकार और परमात्मा एक साथ नहीं रह सकते। वह भूल जाता है कि करने वाला तो कोई और है, वह तो केवल एक निमित्त मात्र है।

जैसे हमने पिछली पोस्ट में जाना

मन से मुक्ति पार्ट4

अहंकार इतना बढ़ जाता है कि फिर वह दूसरों के दुखों में भी आनंद लेने लगता है। किसी का घर टूट जाए तो उसे खुशी होती है कि अच्छा हुआ, वह मुझसे पीछे हो गया। वह दूसरों को डराने में, कमजोर का शोषण करने में उसे आनंद आता है। वह धनवान को सम्मान देता है, चाहे वह दुष्ट ही क्यों न हो, और गरीब से घृणा करता है, चाहे वह संत ही क्यों न हो। उसकी दृष्टि पूरी तरह से उल्टी हो जाती है।





अहंकार से दुःख 


यह संसार अनादि काल से दुख-सुख, स्वर्ग-नर्क, जन्म-मरण का अनुभव कर रहा है, यह सब अहंकार का ही परिणाम है। मानव कभी धर्म के नाम पर लड़ता है, कभी देश के नाम पर, कभी जातियों के नाम पर, कभी स्त्री के नाम पर, कभी धन के नाम पर, कभी अपने ही परिवार में भाई-भाई लड़ते-मरते रहते हैं। यदि गहराई से देखा जाए तो हर लड़ाई के पीछे एक ही कारण है - अहंकार। अहंकार ने व्यक्तियों को जितना दुःख दिया है, शायद दुःख की उत्पत्ति ही अहंकार से हुई है।


जहाँ "मैं" और "मेरा" का अनुभव हो, वहीं अहंकार का वश चलता है। मेरा घर, मेरा पैसा, मेरा परिवार, मेरी जाति, मेरा धर्म - यही सब बंधन हैं।


परंतु मुक्ति का मार्ग क्या है? मुक्ति का मार्ग अहंकार का छूट जाना है।


जब यह भाव आ जाए कि "मैं नहीं हूँ, मेरे द्वारा कुछ नहीं होता, सब परमात्मा का है। मेरे पास जो कुछ है, वह परमात्मा का दिया हुआ है। मेरे अनुसार जीवन हो या न हो, मेरे रूप में स्वयं परमात्मा ही है और सब कुछ वही है।" फिर मैं क्यों स्वयं को कष्ट दूँ?


जो होगा, परमात्मा की मर्जी से होगा। अब मैं तो कुछ करता ही नहीं, फिर मैं इच्छा रख कर क्या करूँ? जो होगा, वही होगा, जो परमात्मा की इच्छा है। यही अहंकार का छूट जाना है और यही परमात्मा का हो जाना है।

आगे हम जानेंगे 


जिस दिन मनुष्य के भीतर से "मैं" मिट जाता है, उसी दिन वह पशु से मानव और मानव से महात्मा बन जाता है। वरना मानव में और पशु में कुछ अंतर नहीं। पशु भी खाता-पीता है, संग्रह करता है, लड़ता है, और अहंकारी मनुष्य भी वही करता है।


इसलिए हे मानव, यदि शांति चाहिए तो अहंकार को छोड़ दे। यही सबसे बड़ा तप है, यही सबसे बड़ा वैराग्य है।

संसार में परिवर्तन ही नियम है और अहंकार ही बंधन है


संसार में एक ही नियम अटल है - परिवर्तन। यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है। नदी का पानी, मौसम, शरीर और मन - सब पल-पल बदल रहे हैं। इसी परिवर्तन की धारा में जीव का जीवन बहता है। योग वासिष्ठ कहता है - "अहंकार एव दुःखस्य मूलम्"। दुःख का मूल संसार नहीं, बल्कि इस परिवर्तनशील संसार को अपना और सदा रहने वाला मान लेना है, और इसका कारण केवल अहंकार है






1. बाल्यावस्था - निर्भरता और चंचलता का काल*


व्यक्ति जब इस संसार में आता है तो बाल्यावस्था में पूरी तरह मूर्ख और असहाय होता है। वह नित्य रोता-बिलखता रहता है। उसे भूख लगी है, नींद आ रही है, पीड़ा हो रही है - वह बता भी नहीं सकता, केवल रो सकता है। वह माता-पिता पर पूरी तरह निर्भर होता है। उनकी देखभाल से ही वह जीवित रहता है।


इस अवस्था में वह अनाप-शनाप बातें करता है। अकारण ही रोने लगता है और अकारण ही हँसने लगता है। बाल्यकाल में मन दस गुना अधिक चंचल रहता है। वह एक जगह शांत नहीं बैठता। उसका मन तितली की तरह एक विचार से दूसरे विचार पर उड़ता रहता है। योग वासिष्ठ में बाल्यावस्था को अज्ञान की पहली सीढ़ी कहा गया है, जहाँ जीव को अपने स्वरूप का कोई ज्ञान नहीं होता।


पर इस अवस्था में एक सुंदरता भी है - अहंकार अभी बीज रूप में है, अंकुरित नहीं हुआ। बच्चा सब में अपना ही रूप देखता है।


*2. युवावस्था - अहंकार रूपी शत्रु का घोंसला*


युवावस्था में व्यक्ति जब संसार के प्रति जागता है, तो उसके मन में अहंकार रूपी शत्रु चिड़िया की तरह घोंसला बनाकर रहने लगता है। यह जीवन का सबसे खतरनाक मोड़ है।


अब उसे लगता है - मैं कुछ हूँ। मैं सुंदर हूँ, मैं बलवान हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ। उसे समाज में अपनी अकड़ और झूठे अहंकार की पूर्ति करने के लिए जो बन पाए, वह करता है। यौवनावस्था में ही स्त्री, जुआ, कलह आदि व्यसनों को उत्पन्न करने वाले राग, लोभ आदि दोष प्रकट होते हैं। काम, चिंता आदि के वश में होने से पुरुष स्वयं को नष्ट कर डालता है।


योग वासिष्ठ स्पष्ट कहता है - महानरक के समान, सदा भ्रान्ति पैदा करने वाली यौवनावस्था से जिन लोगों का विनाश नहीं हुआ, उनका दूसरे किसी से विनाश नहीं हो सकता। यौवन ही वह आग है जो सारे दोषों को जन्म देती है। व्यक्ति सोचता है वह संसार को जीत रहा है, पर वास्तव में अहंकार उसे जीत रहा होता है।


इस अवस्था में वह जीवन भर दूसरों के सामने अपने को बेहतर साबित करने में लगा रहता है। उसे मान-बड़ाई का चस्का उसके अहंकार से ही लगा है।


3. वृद्धावस्था - निर्बलता और फिर भी मोह


काल किसी को नहीं छोड़ता। वही सुंदर शरीर, वही घमंड - सब धीरे-धीरे गलने लगता है। वृद्धावस्था में व्यक्ति पूरी तरह निर्बल हो जाता है। वह रोगों का घर बन जाता है। घुटने दुखते हैं, आँखें धुंधली हो जाती हैं, सुना हुआ शरीर कुरूप शरीर में परिवर्तित हो जाता है।


आश्चर्य देखो - वृद्ध व्यक्ति फिर से एक बालक की तरह अपने परिवार पर ही निर्भर हो जाता है। जो बचपन में माता-पिता पर निर्भर था, वही बुढ़ापे में अपने बच्चों पर निर्भर हो जाता है। जीवन का चक्र पूरा हो जाता है।


जब वृद्धावस्था में उसकी वासनाएँ समाप्त होने लगती हैं, तब उसे परमात्मा की याद आती है। फिर वह भजन करता है, जो उसने जीवन भर कभी किया ही नहीं। लेकिन विडंबना यह है कि जब मौत उसके करीब आती है, तब भी उसके परिवार का मोह नहीं छूटता और अहंकार बना ही रहता है। वह अब भी कहता है - "ये मेरा घर है, ये मेरे बच्चे हैं, मेरी इज्जत है।"


4. अहंकार का मायाजाल और जीवन का सत्य


ये संसार हमेशा इसी तरह चलता रहेगा। अहंकार के होने से ही संसार में लोगों को ये जीवन बहुत थोड़ा होकर भी ऐसा लगता है जैसे ये हमेशा से है और हमेशा बना रहेगा।


ये जीवन पल-पल समाप्त होता जा रहा है। घड़ा टपक रहा है, पर व्यक्ति को लगता है घड़ा भरा ही रहेगा। फिर परमात्मा का नाम लेने से ज्यादा उसे समाज में नाम कमाना है। जैसे उसके नाम न हो तो वह संसार में मर जाएगा। अरे, मौत तो फिर भी आने वाली है। नाम रहे या न रहे, शरीर तो जाना ही है।


वह परमात्मा से प्रार्थना भी करता है तो कैसे? कि उसे संसार में सुख मिले और कष्ट न मिले, जैसे सुख-दुख उसे परमात्मा देता हो। परमात्मा को भुलाकर कल खत्म होने वाले संसार में उसकी रुचि इसके अहंकार से ही है। वह जिन वस्तुओं के पीछे भागता है, वह एक दिन मृत्यु छीन ही लेगी।




वैराग्य का नाश 

वह रोता-बिलखता है कि ये उसे प्राप्त न हुआ। लेकिन जो परमात्मा उसे प्राप्त ही है, वह उसे दूर स्वयं धकेल देता है। ये दशा देखो - दुःख मिले तो परमात्मा को दोष देता है, लेकिन सुख में स्वयं को ही परमात्मा मान लेता है। "मैंने किया, मैं करता हूँ" - यही दशा उसके अहंकार का ही परिणाम है।


परब्रह्म परमात्मा जो सबके अंदर है, वह किसी का भी हो सकता है, लेकिन व्यक्ति के अहंकार से दूर चला जाता है। उसे अहंकार ने रोका हुआ है, वरना परमात्मा तो एक पुकार में ही चला आता है। उसे जो कभी भी नहीं भूलता, वह भी उसे कभी नहीं भूलता। पल-पल परमात्मा के स्मरण में जो सुख है, शायद ही व्यक्ति को संसार की किसी वस्तु में प्राप्त हो।





लेकिन व्यक्ति अपने अहंकार को ही सत्य समझता है - मैं ये हूँ, मैं यहाँ रहता हूँ, ये काम करता हूँ, मेरे माता-पिता, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरे भगवान। इस तरह वह परमात्मा को भी अपने अहंकार का शिकार बना देता है और व्यक्ति सदा दुःख में विचरने लगता है।


अहंकार न हो तो दुख कब का विदा हो जाए। परमात्मा को भुला देना ही अहंकार के वश में होते चले जाना है और इसका उलट भी उतना ही सत्य है - परमात्मा का स्मरण ही अहंकार से मुक्ति है।









अंत में -* जीवन बहुत छोटा है। इसे "मैं" को साबित करने में मत गँवाओ। "मैं" को मिटाने में लगाओ, तभी वह मिलेगा जो कभी मिटता नहीं।


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