परमब्रह्म की माया: संसार का सत्य और जीवन का रहस्य

परमात्मा का स्वरूप -  माया से परे एकमात्र सत्य



ईश्वर अपने आप को जिस किसी रूप में चाहता है, दिखाता है, परन्तु वास्तव में उसमें न तो कोई रूप ही है। वह अरूप है, निराकार है, निर्गुण है। जो भी रूप दिखाई देते हैं, वे सब उसकी लीला मात्र हैं।



उसमें ये सब रूप मायिक भेद हैं। परमात्मा में अनंत जीव, देवता, दानव, मानव, स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी मायिक ही हैं। यह सारा चराचर जगत उसकी माया से ही सत्य प्रतीत होता है। जैसे स्वप्न में देखा गया नगर स्वप्न टूटने पर मिथ्या हो जाता है, वैसे ही यह अनंत कोटि ब्रह्माण्ड परमात्मा की माया के कारण ही सत्य लगता है।



ईश्वर मनोभाव में नहीं जीता। उसमें न मन ही है तो संसार कैसे हो सकता है उसमें? वहाँ तो सत्य ही शेष रहता है, बाकी सम्पूर्ण जगत उसमें असत्य और मिथ्या ही है। वहाँ स्वयं देवता, स्वयं दानव, स्वयं ही अन्धकार, स्वयं ही प्रकाश है। स्वयं ही नाश करने वाला और स्वयं ही जिसका नाश होता है, वह भी वही है। वह स्वयं में स्वयं ही है। उसके सिवा दूसरा कुछ है ही नहीं।




अनंत ब्रह्माण्ड










उसने स्वयं में मन उत्पन्न किया, फिर मन में अहंकार उपजा, फिर संकल्प से स्वयं ही भिन्न-भिन्न रूपों में प्रतीत हो रहा है। यही सृष्टि का आदि रहस्य है।



"मैं मन हूँ, मेरा रूप यह है, मेरा कुल यह है, मेरा शरीर यह है, मेरा धर्म यह है" - यह सब परमात्मा ने ही संकल्प किया है। फिर अनंत रूपों में स्वयं ही स्वयं को अनुभव कर रहा है। एक ही परमात्मा अनंत आँखों से स्वयं को देख रहा है, अनंत मनों से स्वयं को सोच रहा है।



इसीलिए शास्त्र कहते हैं -


*सम्पूर्ण जगत परमात्मा ही है। इसलिए भेद का प्रसंग किस प्रमाण से, किस प्रकार का, कौन और कहाँ हो सकता है? ॥२१॥*



*यह पर्वत है, यह अणु है और यह उसकी विचित्र माया के आडम्बरों का विलास है। ये सब मन की भावना की दृढ़ता से असत् होते हुए भी सत्-से प्रतीत होते हैं ॥२२॥*




जब सब कुछ वही है, तो भेद कैसा? यह छोटा है, यह बड़ा है, यह पवित्र है, यह अपवित्र है - ये सब मन की कल्पनाएँ हैं। परमात्मा की दृष्टि में कोई भेद नहीं है।



परमात्मा की माया है इसलिए जीवों को वह सत्य लगती है। यह माया बड़ी प्रबल है। परमात्मा जो चाहे करने में समर्थ है। जिसे चाहे वह अपनी माया का दास बना दे, जिसे चाहे वहाँ से निकाल ले जाये। यही उसकी स्वतंत्रता है। वह किसी नियम में बंधा नहीं है।



इसे जानने वाले लोग निश्चित ही उसकी कृपा से ही संसार की माया से तरते हैं। अन्य किसी तप, जप, दान, पुण्य, कर्म से इसको नहीं जाना जा सकता। वेद पढ़ लेने से, तीर्थ कर लेने से, हजारों यज्ञ कर लेने से परमात्मा प्राप्त नहीं होता।



उसकी दृष्टि पड़ने पर ही उसकी माया स्वयं हट जाती है, अन्य कोई कारण नहीं। जब तक उसकी कृपा नहीं होती, तब तक मनुष्य कितना भी प्रयत्न कर ले, माया के जाल से नहीं निकल सकता। और जब कृपा होती है, तो अकारण ही वह जिसे चाहे उसे स्वयं की माया से पार करा दे, जिसे चाहे जन्म-मरण के चक्कर कटवाता फिराये।



अन्य किसी कारण से नहीं, परमात्मा की माया, परमात्मा की ही माया है। इससे वह स्वयं निकालने में समर्थ है, अन्य किसी कारण से नहीं। वह अकारण ही यह कर सकता है। उसमें किसी के नियम नहीं चलते, वह जो चाहे कर दे। वह किसी का ऋणी नहीं है, वह किसी से बंधा नहीं है। वह पूर्ण स्वतंत्र है।



परमात्मा की माया निश्चित ही बड़ी डरावनी है। जिसे चाहे नरकों के दर्शन करवा दे, जिसे चाहे स्वर्गों के सुखों में रत कर दे। यह सब उसके एक संकल्प से होता है। स्वयं परमात्मा ही है जो नरकों में सुख और स्वर्गों में दुःख अनुभव करा देता है।



जितने उसके करीब, उतना ही सुख, जितने उससे दूर, उतना ही दुःख। यही परमात्मा की माया का परम रहस्य है। सुख और दुःख स्थान से नहीं आते, वे परमात्मा की निकटता और दूरी से आते हैं। जो जीव परमात्मा के जितना समीप होता जाता है, उसके हृदय में उतना ही आनंद प्रकट होता जाता है। और जो उससे विमुख होता जाता है, वह चाहे स्वर्ग में भी क्यों न हो, दुखी ही रहता है।



इसलिए ज्ञानीजन इस भेद को मिटा देते हैं। वे जानते हैं कि सब कुछ वही है। वे न किसी से राग करते हैं, न द्वेष। वे जानते हैं कि यह सब उसी एक की लीला है। यही अद्वैत बोध है, यही अवधूत ज्ञान है।













जब यह बोध हो जाता है कि सम्पूर्ण जगत परमात्मा ही है, तब फिर भय कैसा, शोक कैसा, मोह कैसा? तब तो केवल 

एक ही सत्य शेष रहता है - वह स्वयं।

परब्रह्म परमात्मा की दुष्कर माया


परब्रह्म परमात्मा की माया निस्संदेह ही बड़ी दुष्कर है। वेदों ने इसे दुस्तर कहा है, जिसे पार करना जीव के अपने बल से संभव नहीं। यह माया कोई बाहर की वस्तु नहीं, यह उसी परमात्मा की अपनी शक्ति है। जैसे सूर्य की किरण सूर्य से अलग नहीं, वैसे ही माया परमात्मा से अलग नहीं।





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जीवों को संसार में ही सुख मिलने की इच्छा है, यही उनके अनुरूप सत्य है। जीव चाहता है कि उसे यहीं सुख मिले, यहीं सम्मान मिले, यहीं अपनापन मिले। इसी कारण संसार में ही उसका मन लगा रहता है। वह सुबह से शाम तक इसी संसार को सजाने में लगा रहता है। उसे लगता है कि यदि घर बन गया, परिवार सुखी हो गया, धन आ गया तो वह सुखी हो जाएगा।

जीवों की संसार को सत्य मानने की माया उनके लिए सत्य ही है। यह सबसे बड़ी विडंबना है। जो असत्य है, वही जीव के लिए सत्य बन गया है। जैसे स्वप्न में देखा गया महल स्वप्न के भीतर सत्य ही लगता है, जब तक नींद नहीं खुलती। वैसे ही यह संसार रूपी स्वप्न जीव के लिए सत्य है। इसीलिए व्यक्ति इस तरह माया में लिप्त है कि उसे स्वयं भी परमात्मा आकर दर्शन दे, तो वह उसे भी पहचान नहीं पाए। वह परमात्मा को भी संसार की कसौटी पर ही तौलेगा। वह सोचेगा कि यह व्यक्ति मुझे क्या दे सकता है, मेरा कौन सा स्वार्थ सिद्ध कर सकता है।

व्यक्ति को संसार इस तरह सत्य लगता है जैसे वह इसी में रहने के लिए बना हो। उसे स्मरण ही नहीं कि वह तो एक यात्री है। जैसे धर्मशाला में ठहरा हुआ यात्री धर्मशाला को ही अपना घर मान ले, वैसे ही जीव ने इस चार दिन के संसार को ही अपना स्थायी निवास मान लिया है।

वास्तव में परमात्मा रूपी महासागर में असंख्य जीव विचरने में लगे रहते हैं। हम सब उस महासागर की मछलियों के समान हैं। मछली महासागर में ही जन्म लेती है, महासागर में ही खेलती है, और महासागर में ही विलीन हो जाती है, फिर भी वह महासागर की थाह नहीं जान पाती। वैसे ही जीव नहीं जान पाते कि हम परमात्मा के ही अंदर हैं, चारों तरफ परमात्मा से ही घिरे हुए हैं। परमात्मा हमारे इतने करीब है कि हम हिल भी नहीं सकते अगर वो न चाहे। हमारी श्वांस, हमारी धड़कन, हमारी सोच, सब उसी की सत्ता से चल रही है। कठोपनिषद कहता है कि उसके भय से वायु बहती है, सूर्य उदय होता है।

परमात्मा रूपी महासागर में बूंद-बूंद में ब्रह्मांड हैं। हमारी बुद्धि इसे कल्पना कहती है, पर यह सत्य है। जैसे एक छोटे से बीज में पूरा वटवृक्ष छिपा होता है, वैसे ही परमात्मा के एक-एक रोम में करोड़ों ब्रह्मांड स्थित हैं। उन अनंत ब्रह्मांडों में अनंत ही आकाशगंगा, अनंत ही सूर्य, अनंत ही पृथ्वियां हैं। वह सब अनंत ही है। विज्ञान आज जिसे मल्टीवर्स कह रहा है, हमारे ऋषियों ने उसे अनंत कोटि ब्रह्मांड कहा है।

उन अनंत पृथ्वियों में अनंत ही जीवों को अपने अनुरूप ही संसार दिखलाई पड़ता है, वह उनके लिए सत्य ही है। चींटी का संसार अलग है, देवता का संसार अलग है, मनुष्य का संसार अलग है। सबको अपने-अपने कर्म और इंद्रियों के अनुसार सृष्टि दिखती है। अन्य जीवों को अन्य ब्रह्मांड के बारे में ज्ञात नहीं होता। उन्हें वे असत्य ही लगते हैं। वे उनके लिए महज कल्पना है। जीवों को अपनी सृष्टि ही ऐसी ज्ञात है कि जैसे हम ही हों, अन्य केवल मिथ्या ही हैं। यही अहंकार है। यही माया का सबसे सूक्ष्म बंधन है।

जीव अपने संसार में ही कर्म करता है। उसके अनुसार व्यवहार करता है और उसी के फल भोगता है। परन्तु यह संसार सागर असार है। यह शरीर भी एक दिन मिट ही जाता है। यह जीवनकाल भी छोटा ही है। यदि सौ वर्ष भी जी लिया तो वह अनंत काल के सामने एक पल के समान है। यह अपने परिवार में ही स्वार्थ ही है, अन्य परिवार की बात ही छोड़ दें। हम जिसे अपना कहते हैं, वह भी अपने प्रयोजन के लिए ही है। पुत्र को पिता से सुख चाहिए, पिता को पुत्र से सेवा चाहिए। पति को पत्नी से, पत्नी को पति से। यह सब अपने प्रयोजन के लिए ही है। प्रेम के नाम पर भीतर सूक्ष्म स्वार्थ ही खड़ा है।

जीवों को सुख मिला है, वो भी कुछ समय बाद अपने आप ही नष्ट होने वाला है। इंद्रियों के भोगों में सुख लगता है, लेकिन वह सुख भी बिजली की चमक जैसा है। क्षण भर को चमका और अंधकार और गहरा कर गया। ये शरीर भूख-प्यास से ही बना हुआ है। इसे जितना भरो, यह फिर खाली हो जाता है।

परमात्मा की माया बड़ी दुष्कर है। आज जो सुखी है, कल वह दुखी हो जाता है। जिससे हमें सुख मिले, वह कल दुख का कारण बन जाता है। जिस पुत्र के जन्म पर उत्सव मनाया था, वही पुत्र बड़े होकर दुख देता है। जिस धन को सुख का साधन माना, वही धन चिंता का कारण बन जाता है। यह कुछ भी स्थायी नहीं है। मिलने के बाद दुख, न मिलने पर दुख तो है ही।

मन रूपी कटोरा जीवों को संसार रूपी माया में पकड़ा दिया जाता है। जिसे भरने में ही सारा जीवन लगा रहता है। मनुष्य सोचता है कि यह मिल जाए तो कटोरा भर जाएगा, वह मिल जाए तो भर जाएगा। पर मृत्यु आ जाती है, जीवों का फिर भी मन रूपी कटोरा खाली ही रहता है, जैसे कभी भरने के लिए बना ही न हो। सिकंदर जैसा विश्व विजेता भी खाली हाथ गया।


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जीवों ने संसार, परमात्मा की निस्संदेह दुष्कर माया को ही सत्य जान लिया है। उन्हें ज्ञात नहीं कि हमसे पहले अनंत ही जीवों का अंत हो चुका है। हमारे जैसे अनंत ही ब्रह्मांडों में अनंत ही जीवों का अस्तित्व है। वो न हमसे ज्यादा खास हैं, न हम उनसे ज्यादा। इस अनंत प्रवाह में हमारा अहंकार कितना तुच्छ है।


कोई भी परमात्मा रूपी महासागर में बूंद की बूंद में करोड़-करोड़ गुना छोटी पृथ्वी में ये न कहे कि हमने कुछ पाया, हमने कुछ किया। हम ये हैं, हम वो हैं। निश्चित ही उसे माया रूपी रोग निकाले नहीं निकलेगा। यही अहंकार ही बंधन है।

वही करता है, उसका ही सारा अस्तित्व है। वो परमात्मा ही अपनी माया से जीवों को ग्रस्त करता है, फिर वो ही तो है जो उन्हें निकालने में समर्थ है। जैसे जाल बुनने वाला ही जाल को खोलना जानता है। शर्त है कि परमात्मा को ही समर्पित हो जाए। उसी के लिए ही हमारा जीवन हो, वही परमात्मा हमारे जीवन का उद्देश्य बने, न कि मायारूपी संसार। जब जीव अपने मन के कटोरे को संसार की ओर से पलटकर परमात्मा की ओर कर देता है, तभी वह भरता है। और एक बार परमात्मा से भर गया तो फिर कभी खाली नहीं होता।

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