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परमात्मा की माया

 परमात्मा का स्वरूप - भाग 3 : माया से परे एकमात्र सत्य* ईश्वर अपने आप को जिस किसी रूप में चाहता है, दिखाता है, परन्तु वास्तव में उसमें न तो कोई रूप ही है। वह अरूप है, निराकार है, निर्गुण है। जो भी रूप दिखाई देते हैं, वे सब उसकी लीला मात्र हैं। उसमें ये सब रूप मायिक भेद हैं। परमात्मा में अनंत जीव, देवता, दानव, मानव, स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी मायिक ही हैं। यह सारा चराचर जगत उसकी माया से ही सत्य प्रतीत होता है। जैसे स्वप्न में देखा गया नगर स्वप्न टूटने पर मिथ्या हो जाता है, वैसे ही यह अनंत कोटि ब्रह्माण्ड परमात्मा की माया के कारण ही सत्य लगता है। ईश्वर मनोभाव में नहीं जीता। उसमें न मन ही है तो संसार कैसे हो सकता है उसमें? वहाँ तो सत्य ही शेष रहता है, बाकी सम्पूर्ण जगत उसमें असत्य और मिथ्या ही है। वहाँ स्वयं देवता, स्वयं दानव, स्वयं ही अन्धकार, स्वयं ही प्रकाश है। स्वयं ही नाश करने वाला और स्वयं ही जिसका नाश होता है, वह भी वही है। वह स्वयं में स्वयं ही है। उसके सिवा दूसरा कुछ है ही नहीं। उसने स्वयं में मन उत्पन्न किया, फिर मन में अहंकार उपजा, फिर संकल्प से स्वयं ही भिन्न-भिन्न र...

परमात्मा का स्वरूप पार्ट 2

 स्वयंभू परमात्मा का स्वरूप - जगत है ही नहीं, केवल परमात्मा है* स्वयंभू परमात्मा न तो किसी कारण से है, न अकारण ही है। परमात्मा में जगत न तो था, न है, न ही होगा, यही श्रुति की मान्यता है। श्रुति का अर्थ है पूर्व के ज्ञानियों ने जिसे सुनकर, अनुभव करके बताया है। इसे हम एक दृष्टांत से समझते हैं। समुद्र में जल के बुलबुले उठते हैं। बुलबुला देखने में अलग लगता है, गोल-गोल चमकता है, पर है तो वह समुद्र का जल ही। बुलबुला फूटता है तो कहाँ जाता है? समुद्र में ही मिल जाता है। उसका अलग अस्तित्व कभी था ही नहीं। वह था ही नहीं, केवल प्रतीत हो रहा था। बिल्कुल वैसे ही समुद्र भी जल ही है। जल के अलावा समुद्र कुछ नहीं है। वैसे ही ये नाना प्रकार के अनंत ब्रह्मांड, ये सृष्टियाँ, ये जीव, ये पहाड़, ये नदियाँ, ये सब परमात्मा से भिन्न नहीं हैं, स्वयं परमात्मा ही हैं। *परब्रह्म में जगत कभी उत्पन्न हुआ ही नहीं* परब्रह्म परमात्मा में ये सब कभी उत्पन्न ही नहीं हुए, न होंगे। ये सब दृश्य जगत जीवों को सत्य लगता है, जो उनके मन की कल्पना मात्र है। जीव जगत को देखकर परमात्मा को भिन्न जानता है। उसे लगता है परमात्मा कहीं ऊ...

परमात्मा का स्वरूप

 विश्व में पूजे जाने वाला परमात्मा भिन्न-भिन्न धर्मों में भिन्न-भिन्न प्रकार से जाना गया है।*  कहीं उसे मूर्ति में ढाला जाता है, सुंदर श्रृंगार किया जाता है, उसे अवतार के रूप में पूजा जाता है। श्री राम, श्री कृष्ण, शिव, बुद्ध के रूप में। तो कहीं किसी धर्म में उसके मूर्ति न होने पर जोर दिया जाता है। कहा जाता है कि परमात्मा की कोई मूर्ति नहीं हो सकती, उसका कोई आकार नहीं है, उसे निराकार ही मानो। एक धर्म कहता है मंदिर में है, दूसरा कहता है मस्जिद में है, तीसरा कहता है चर्च में है। पर सच तो यह है कि परमात्मा संसार के किसी भी धर्म में फिट नहीं होता। धर्म तो इंसान ने बनाए हैं, परमात्मा ने नहीं। धर्म तो नदी के किनारे बने घाट हैं, परमात्मा तो स्वयं सागर है। क्या सागर किसी एक घाट में फिट हो सकता है? नहीं। वैसे ही परमात्मा किसी एक धर्म की सीमा में नहीं बंध सकता। उसको मानने वाले न तो उसे जानते हैं और न ही उन्होंने उसे कहीं अनुभव किया है। वे सिर्फ हजारों सालों से चली आई कहानियों को ही अपने धर्मों के अनुरूप सत्य समझे बैठे हैं। दादा ने कहा, पिताजी ने कहा, ग्रंथ में लिखा है, इसलिए सत्य है। पर...

आत्म ज्ञानी का भाव

   *शुद्ध चैतन्य स्वरूप में स्थित आत्मज्ञानी का लक्षण* शुद्ध चैतन्य स्वरूप परमात्मा में स्थित आत्मज्ञानी के लिए न तो परमात्मा के बारे में कोई प्रमाण है और न ही वह परमात्मा को बाहर कहीं देखता है। उसका मौन ही उसका उत्तर है और उसका जीवन ही परमात्मा के होने का प्रमाण है। आम व्यक्ति परमात्मा को सिद्ध करने के लिए तर्क देता है, शास्त्रों के प्रमाण देता है, पर आत्मज्ञानी जानता है कि जो सबका साक्षी है, उसे किसी प्रमाण की क्या आवश्यकता? जैसे आँख को देखने के लिए किसी दूसरी आँख की जरूरत नहीं, जैसे दीपक को दिखाने के लिए किसी दूसरे दीपक की जरूरत नहीं, वह स्वयं प्रकाश है, वैसे ही परमात्मा स्वयं प्रकाश है। आत्मज्ञानी उसे बाहर नहीं खोजता, वह तो स्वयं उसी स्वरूप में स्थित हो जाता है। इसलिए वह चुप हो जाता है। उसका मौन ही सबसे बड़ा उत्तर है। लोग उससे पूछते हैं परमात्मा कहाँ है? तो वह बोलता नहीं, क्योंकि बोलना भी उस एक को दो कर देगा। उसका शांत, निर्विकार जीवन ही इस बात का परिणाम और प्रमाण है कि परमात्मा है। यह संसार आम व्यक्ति के जैसे आत्मज्ञानी को प्रतीत नहीं होता। आम आदमी को संसार बहुत ठोस, बहुत...

आत्म ज्ञानी कैसे होता हैं

*सच्चा आत्मज्ञानी कौन है? - संसार सागर का गोताखोर* संसार रूपी सागर में एक गोताखोर की तरह उसमें से आत्म-ज्ञान रूपी अमूल्य रत्न निकालने वाला ही सच्चा आत्मज्ञानी है। जैसे सागर की ऊपरी लहरें बहुत शोर मचाती हैं, पर मोती तो गहराई में छिपा होता है, वैसे ही संसार के कोलाहल में सत्य नहीं मिलता। सत्य तो मन की गहराई में, मौन में छिपा है। आत्मज्ञानी वही है जो इस कोलाहल से बाहर निकलकर अपने भीतर गोता लगाता है। संसार को एक मृगतृष्णा की तरह असत्य जानने वाला और परमात्मा को ही एकमात्र सत्य जानने वाला ही आत्मज्ञानी है। जैसे रेगिस्तान में हिरण को दूर से पानी दिखाई देता है पर वहाँ जाने पर केवल रेत मिलती है, वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति को संसार के भोगों में सुख दिखाई देता है। वह धन, पद, सुंदर शरीर के पीछे भागता है, पर अंत में उसे खालीपन ही मिलता है। आत्मज्ञानी इस मृगतृष्णा को पहचान लेता है। वह जान लेता है कि संसार में सुख है ही नहीं, जो सुख जैसा लगता है वह केवल दुःख का ही दूसरा रूप है। इसलिए वह परमात्मा को ही सत्य मानता है, क्योंकि परमात्मा ही वह है जो कभी बदलता नहीं, कभी नष्ट नहीं होता। उसकी सारी भोग की वासनाए...

अहंकार से मुक्ति पार्ट 2

*संसार में परिवर्तन ही नियम है और अहंकार ही बंधन है* संसार में एक ही नियम अटल है - परिवर्तन। यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है। नदी का पानी, मौसम, शरीर और मन - सब पल-पल बदल रहे हैं। इसी परिवर्तन की धारा में जीव का जीवन बहता है। योग वासिष्ठ कहता है - "अहंकार एव दुःखस्य मूलम्"। दुःख का मूल संसार नहीं, बल्कि इस परिवर्तनशील संसार को अपना और सदा रहने वाला मान लेना है, और इसका कारण केवल अहंकार है। *1. बाल्यावस्था - निर्भरता और चंचलता का काल* व्यक्ति जब इस संसार में आता है तो बाल्यावस्था में पूरी तरह मूर्ख और असहाय होता है। वह नित्य रोता-बिलखता रहता है। उसे भूख लगी है, नींद आ रही है, पीड़ा हो रही है - वह बता भी नहीं सकता, केवल रो सकता है। वह माता-पिता पर पूरी तरह निर्भर होता है। उनकी देखभाल से ही वह जीवित रहता है। इस अवस्था में वह अनाप-शनाप बातें करता है। अकारण ही रोने लगता है और अकारण ही हँसने लगता है। बाल्यकाल में मन दस गुना अधिक चंचल रहता है। वह एक जगह शांत नहीं बैठता। उसका मन तितली की तरह एक विचार से दूसरे विचार पर उड़ता रहता है। योग वासिष्ठ में बाल्यावस्था को अज्ञान की पहली...

अहंकार से मुक्ति

 अहंकार - दुखों का मूल और संसार में भटकने का कारण* --- संसार को सत्य समझने वाला व्यक्ति अपने मिथ्या अहंकार को भी सत्य समझ बैठता है। जिसने इस नश्वर संसार को ही सब कुछ मान लिया, वह अपने आप को ही इस संसार का केंद्र मान लेता है। उसके लिए बाकी सब उसके प्रतिद्वंद्वी हैं, शत्रु हैं। वह हर पल इसी तुलना में जीता है कि कौन उससे आगे है और कौन पीछे। ऐसा अहंकारी व्यक्ति दिन-रात धन-संपदा, पद-प्रतिष्ठा और महंगी वस्तुओं का संग्रह करने में जुटा रहता है। उसका संग्रह किसी आवश्यकता के लिए नहीं, बल्कि दूसरों को नीचा दिखाने के लिए होता है। वह सोचता है कि मेरे पास बड़ी गाड़ी है, बड़ा घर है, इसलिए मैं बड़ा हूँ। वह अपने अहंकार को इन वस्तुओं से सजाता है। उसके मन में एक ही भाव चलता रहता है - "मैं ही हूँ, मेरे द्वारा ही सब होता है, यही लोक है, परलोक कुछ नहीं है। मैं दूसरों से बेहतर हूँ।" "मैं-मैं" करने में ही उसका पूरा जीवन चला जाता है। वह कभी शांत नहीं बैठ पाता। वह जन्म और मरण के इस अंतहीन चक्र में फँसा रहता है, क्योंकि कर्ता भाव ही जन्म का कारण है। जब तक मन में यह भाव है कि "मैं कर रहा ...

वैराग्य का जन्म - संसार के मोह का नाश

 संसारी व्यक्ति जो इस संसार को सत्य मानता है और ऐसा जानता है कि ये संसार हमेशा बना रहेगा, वह घोर अंधकार में है। वह इस नाशवान संसार में सुख ढूंढता है और उसकी चित्तवृत्ति सदा संसार की वस्तुओं में ही लगी रहती है। ऐसा व्यक्ति निश्चित ही संसार की माया से ग्रस्त है। उन्हें इस संसार में सुख मिलना ऐसा ही है जैसे रेगिस्तान में भटकते हिरण को दूर से पानी का तालाब दिखना। मृगतृष्णा के कारण हिरण दौड़ता-दौड़ता अपने प्राण दे देता है, पर उसे जल नहीं मिलता। ठीक वैसे ही संसारी जीव धन, पद, स्त्री और भोगों के पीछे दौड़ता रहता है, पर उसे सच्चा सुख कभी मिलता ही नहीं। क्योंकि इस संसार में सुख है ही नहीं। मन से व्याप्त जीव हमेशा सुख को बाहर ढूंढता है। वह कभी भीतर झांक कर नहीं देखता। इसलिए वह इस मायाजाल से कभी मुक्त होना भी नहीं चाहता। उसे यह बंधन ही सुख जैसा लगता है। इस संसार में हर व्यक्ति केवल धन-संपदा को पाने का ही पुरुषार्थ करता है। वह इसके लिए छल-कपट करने से भी नहीं चूकता। अपने मित्र, परिजनों या अपने माता-पिता से भी वह केवल धन-संपदा की ही इच्छा रखता है। और जब उसकी यह इच्छा पूरी नहीं होती, तो वह सदा उन...

वैराग्य का जन्म - स्त्री मोह का नाश

 काम से जन्मा जीव और काम से मुक्ति कैसे ?* जीव काम के द्वारा ही जन्म लेता है, उसका सारा जीवन काम का ही रचा होता है। यह अटल सत्य है कि जिस काम-बीज से शरीर बनता है, जीवन भर वही बीज वृक्ष बनकर उसे घेरे रहता है। फिर प्रश्न उठता है कि वह स्वयं काम से जन्म लेकर काम वासना से मुक्त कैसे हो ? इसलिए वह इसके लिए स्त्री संग में रहता है। वह सोचता है कि यही सुख है, यही जीवन का आधार है। वह स्त्री के लिए धन कमाता है, दिन-रात मेहनत करता है, पसीना बहाता है। उसकी खुशी के लिए साधनों को जमा करने पर ही ध्यान देता है। बड़ा घर, गाड़ी, गहने, कपड़े - सब कुछ इसी मोह में जुटाता है। बदले में उससे संभोग पाता है और उसी को परम सुख मान लेता है। फिर बच्चे पैदा करता है। फिर उन बच्चों के लिए भी साधनों को जुटाने में लग जाता है। अब उसकी चिंता दोगुनी हो जाती है। पहले स्त्री के लिए, अब बच्चों के लिए। फिर बुढ़ापे में वह बच्चों के बच्चों के साथ समय बिताता है और सोचता है कि यही जीवन की पूर्णता है। फिर एक दिन मर जाता है। सारा जोड़ा हुआ धन, सारे साधन, सारा परिवार यहीं रह जाता है। फिर वही उसके स्त्री, बच्चे और बच्चों के बच्चे ...

वैराग्य का जन्म - शरीर के मोह का नाश

 *वैराग्य का जन्म - शरीर के मोह का नाश*              शरीर को देखना और आत्मा को पहचानना इस शरीर की रचना किस प्रकार होती है, ये कहाँ से आता है और किस प्रकार चला जाता है, कोई नहीं जानता। एक दिन प्रत्येक व्यक्ति अचानक स्वयं को इस शरीर में पाता है और इसमें लगाव के कारण वह स्वयं को शरीर ही समझ लेता है। यही अज्ञान उसके जीवन के दुखों का पहला कारण बन जाता है। उसके सारे क्रियाकलाप इस शरीर के द्वारा ही होते हैं। वह मुंह से बोलता है, कानों से सुनता है, आँखों से देखता है, हाथों से कार्य करता है, पैरों से चलता है, मन से सोचता है। इसी क्रिया के कारण वह शरीर के मोह में पड़ जाता है, जो निश्चित ही होना चाहिए। धीरे-धीरे ये शरीर ही उसकी पहचान बन जाता है। लोग उसे उसके नाम से नहीं, उसके शरीर से पहचानते हैं और वह चाह कर भी स्वयं को इससे अलग नहीं कर पाता। *शरीर की पूजा और भ्रम का जाल* विस्मय की बात तो यह है कि मनुष्य अंत में शरीर का ही पूजन करने लगता है। वह परमात्मा को भी स्वयं जैसा एक शरीर देकर उसकी मूर्तियां बनाने में लगा रहता है। वह सोचता है कि परमात्मा भी उसकी तरह ही...

वैराग्य का जन्म - काल की लीलाएं

-- *काल - परमात्मा का आज्ञाकारी सेवक* जीवों को अनुभव में आने वाला यह संसार सागर पहले भी था और हमेशा रहेगा। यह अनादि है। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है, वैसे ही यह संसार उत्पन्न होता है और नष्ट होता है। यह चक्र कभी रुकता नहीं। पर इस संसार सागर को हर जीव अलग-अलग देखता है। मनुष्य को यह भोग की भूमि लगता है, देवता को यह क्रीड़ा स्थल लगता है, और ज्ञानी को यह माया का पर्दा लगता है। भिन्न-भिन्न योनियों में भिन्न-भिन्न प्रतीत होने वाला यही संसार जीव को अपने जाल में फंसाए रखता है। इस संसार का सबसे बड़ा अटल नियम है - जिसने यहाँ जन्म लिया है, उसका मर जाना तय है। इससे कोई नहीं बच सकता। न राजा, न रंक, न देवता, न दैत्य। और इस नियम को पूरा करने वाला है - काल। यह काल अत्यंत भयानक है। इसको किसी पर दया नहीं आती। जैसे एक छोटा बालक गेंद को उठाता है, पटकता है, फिर उठा लेता है, वैसे ही काल बड़े-बड़े ग्रहों और तारों के साथ करता है। वह खेल रहा है। उसके लिए एक चींटी और एक ब्रह्मांड में कोई अंतर नहीं। संसार में जितने भी प्राणी ऐश्वर्य से पूर्ण हैं, धन से, बल से, बुद्धि से बड़े हैं, वह सब काल के साम...

आत्मज्ञान कैसे हो

 आत्मज्ञान कैसे प्राप्त होता है? वैराग्य के बिना क्यों नहीं मिलता मोक्ष* . जीवों को दुःख देने वाला यह संसार और ईश्वर द्वारा रचित माया में लगा रहने वाला यह मन, कभी भी वैराग्य के बिना आत्मज्ञान नहीं पा सकता। यह सबसे बड़ा सत्य है जिसे हम समझना नहीं चाहते। हम सुबह से शाम तक इसी संसार के पीछे भागते हैं। नया घर, नई गाड़ी, नया नाम। लेकिन यह भागना ही दुःख का कारण है। *यह जगत नीले आकाश जैसा है* जीवों को आकाश में नीलिमा की तरह सत्य लगने वाला यह जगत निश्चय ही असत्य है। आकाश का रंग नीला नहीं है, वो तो ऐसे ही दिखता है। वैसे ही यह जगत भी सच नहीं है, सिर्फ सच जैसा दिखता है। शास्त्र इसको मिथ्या कहते हैं। मिथ्या का मतलब है जो दिखे तो सही, पर विचार करने पर न मिले। जैसे रस्सी में साँप दिखना। अंधेरे में रस्सी को देख कर हम डर जाते हैं कि साँप है, लेकिन रोशनी आते ही पता चलता है कि वो तो रस्सी थी। संसार भी ऐसा ही है। अज्ञान के अंधेरे में यह सच लगता है, ज्ञान के प्रकाश में यह खो जाता है। जब तक मन इस असत्य जगत को सत्य मानता रहेगा, तब तक वह आत्मा की ओर मुड़ेगा ही नहीं। *मुक्ति और आत्मज्ञान का उदय कब होता है...

आत्मज्ञान क्या है।

  मन ही संसार है - और मन ही मोक्ष* मन से ही यह सारा संसार उत्पन्न हुआ है। इसलिए हर जीव को यह संसार अलग-अलग दिखाई देता है।  एक मनुष्य के लिए संसार उसकी इच्छाओं, उसके सपनों और उसके डर के अनुसार है। वही एक पशु के लिए संसार केवल भूख, नींद और भय के अनुसार है। संसार एक ही है, पर सबके मन अलग-अलग हैं, इसलिए सबका संसार भी अलग-अलग है। यह बात समझ लेना ही आधी मुक्ति है। *जब मन ही सब कुछ बन जाता है* जब व्यक्ति अपने मन के द्वारा बनाये हुए इस संसार को ही 100% सत्य मान लेता है, तभी सारी समस्या शुरू होती है। उसे लगता है कि यही घर, यही पैसा, यही रिश्ता, यही इज्जत ही सब कुछ है। ऐसा मानते ही उसकी वासनाएं, उसकी इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं। एक इच्छा पूरी होती है तो मन दूसरी इच्छा खड़ी कर देता है। मन उसे कहता है - "अब ये मिल जाए तो सुखी हो जाऊंगा।" वो वस्तु मिल भी जाती है, पर सुख दो दिन में खत्म हो जाता है। फिर मन किसी और वस्तु के पीछे दौड़ा देता है। इसी उलझन में वह सारे कर्म अहंकारवश करता है। उसे लगता है "मैं कर रहा हूँ, मेरे कारण हो रहा है।" इसी अहंकार के कारण वह कर्मों में लिप्त हो जात...

पुरूषार्थ से परमपद पार्ट 2

 भाग्यवादी नहीं, पुरुषार्थी बनो - क्योंकि परमात्मा स्वयं तुम्हारे रूप में बैठा है भाग्य में विश्वास करने वाला व्यक्ति अनजाने में ही अपने जीवन को नरक की तरफ ले जाता है। जो व्यक्ति हर बात पर यह कहता है कि "सब कुछ भाग्य है, किस्मत में जो लिखा है वही होगा", वह वास्तव में अपने हाथों से अपने जीवन की डोर को काट देता है। ऐसा व्यक्ति सदा उन पुरुषों के अधीन होता है जो पुरुषार्थी हैं, जो कर्म में विश्वास रखते हैं। भाग्यवादी व्यक्ति इस लोक में भी अपमान सहता है और परलोक में भी उसकी कोई गति नहीं होती। दूसरों को सुखी, संपन्न और सफल देखकर अपने भाग्य को दोष देने वाला व्यक्ति सबसे बड़ी भूल करता है। वह यह नहीं जानता कि वह केवल अपने भाग्य को नहीं, बल्कि अपने भीतर छुपे हुए परमात्मा को ही असमर्थ और कमजोर समझ रहा है। जब तुम कहते हो "मैं नहीं कर सकता, मेरी किस्मत ही खराब है", तो तुम उस ईश्वर का अपमान करते हो जिसने तुम्हें यह मनुष्य जीवन दिया है। यह तुम्हारे अज्ञान को ही दिखाता है। जिसने जीवन को केवल अपने अहंकार की दृष्टि से देखा, वो कभी यह नहीं जान पाता कि परमात्मा तो सर्वसमर्थ है। अहंकारी...

पुरुषार्थ से परमपद

  *Title:* पुरुषार्थ ही मन से मुक्ति और परमात्मा प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है *Post:* मनुष्य के जीवन में दो ही रास्ते हैं - एक मन के अनुसार चलना और दूसरा उद्देश्य के अनुसार चलना। जो मन के अनुसार चलता है वह जीवन भर भटकता है, और जो उद्देश्य के अनुसार चलता है वही पुरुषार्थी कहलाता है। पुरुषार्थ क्या है? पुरुषार्थ का अर्थ है - पुरुष होने का अर्थ, अपने जीवन के उद्देश्य के लिए किया गया अथक प्रयास। शास्त्रों में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। लेकिन इन सभी की नींव एक ही है - निरंतर प्रयास। जीवों को जन्म-मरण की इस अनंत यात्रा से पार करने में केवल मनुष्य का पुरुषार्थ ही सहारा बनता है। जानवर तो अपने भाग्य और प्रकृति के अनुसार जीते हैं, लेकिन मनुष्य के पास चुनाव है। वह चाहे तो भाग्य को रोता रहे, या चाहे तो पुरुषार्थ से अपना नया भाग्य लिख दे। भाग्य में विश्वास करने वाला कभी मुक्त नहीं होता भाग्य में विश्वास करने वाला व्यक्ति कभी भी पुरुषार्थ का सहारा नहीं ले पाता। वह सोचता है - "जो किस्मत में होगा मिल जाएगा।" यही सोच उसे आलसी और कमजोर बना देती है। याद रखिए, भाग्य भी...

मन से मुक्ति पार्ट 4

 *दो पक्षियों की कथा - जीव से शिव तक की यात्रा* जीवन को एक अज्ञानी की तरह जीने वाले हम मनुष्य इस जीवन में सब कुछ करते हैं, धन कमाते हैं, रिश्ते बनाते हैं, मान-सम्मान के पीछे भागते हैं, लेकिन कभी हमारा ध्यान उस ईश्वरीय ताकत को प्राप्त करने में नहीं जाता जो हमारे होने का कारण है और इस जगत का भी। जिसने हमें ये सारी व्यवस्था, ये शरीर, ये श्वास, ये बुद्धि करके दी है, हम उसे इस तरह नकारते हैं जैसे वो है ही नहीं।  हमारे मन ने हमें संसार में बांध कर रखा हुआ है। वो परमात्मा चाहे भी तो हमें आज़ादी नहीं दे पाता, क्योंकि हम खुद ही आज़ाद होना नहीं चाहते। हम बंधन को ही सुख मान बैठे हैं। जो परमात्मा हमें सबसे पहले याद आना चाहिए, वो हमसे भूला जा चुका है। मनुष्य के मन में संसार की वासना भरी है, उसको परमात्मा की तरफ जाना नहीं आता। मन अनेक भोग भोगने पर भी कभी तृप्त नहीं होता। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म लेती है। फिर वो क्या है जिसे प्राप्त करने पर मन कभी दुःख में नहीं होता? हमारी ही तरह शरीर वाले वे कौन लोग थे जिन्हें इच्छित वस्तु प्राप्त न होने पर भी उनका मन कभी दुःख में नहीं आता था? वो कौ...

मन से मुक्ति पार्ट 3

  *टाइटल:* मन वर्तमान में क्यों नहीं रहता? अतीत और भविष्य की बेचैनी का इलाज *आर्टिकल:* *मन से संसार का जन्म कैसे होता है?* हमारे ऋषियों ने कहा है - मन से संसार का जन्म होता है। मन ने ही जीव को मृत्यु के चंगुल में फंसाया है। अगर मन न हो, तो मृत्यु का डर भी खत्म हो जाये। वरना परमात्मा तो सब में एक ही है। एक ही चेतना सब में काम कर रही है। लेकिन मन अलग-अलग दृष्टियों से संसार को अनुभव करता है। किसी चीज में सुख देखता है और किसी में दुःख देखता है। इसी वजह से भेद पैदा होता है। मन की सबसे बड़ी समस्या ये है कि ये कभी वर्तमान में नहीं रहता। ये हमेशा और पाने के भ्रम में रखता है। अभी ये मिल जाये, फिर वो मिल जाये, इसी दौड़ में जीवन खत्म हो जाता है। *भूत और भविष्य का रोग* मन का सारा खेल भूत और भविष्य का है। उसके सारे विचार या तो भूतकाल के होते हैं या भविष्य के। भूतकाल के विचार पछतावा पैदा करते हैं - काश ऐसा हो जाता, काश ये न होता। और भविष्य के विचार आशा और डर पैदा करते हैं - ऐसा होगा या नहीं होगा। जिससे मन में हमेशा सुख-दुःख होता रहता है। मन वर्तमान में नहीं रह पाता, क्योंकि वहां वो है ही नहीं। व...