परमात्मा का स्वरूप - भाग 3 : माया से परे एकमात्र सत्य* ईश्वर अपने आप को जिस किसी रूप में चाहता है, दिखाता है, परन्तु वास्तव में उसमें न तो कोई रूप ही है। वह अरूप है, निराकार है, निर्गुण है। जो भी रूप दिखाई देते हैं, वे सब उसकी लीला मात्र हैं। उसमें ये सब रूप मायिक भेद हैं। परमात्मा में अनंत जीव, देवता, दानव, मानव, स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी मायिक ही हैं। यह सारा चराचर जगत उसकी माया से ही सत्य प्रतीत होता है। जैसे स्वप्न में देखा गया नगर स्वप्न टूटने पर मिथ्या हो जाता है, वैसे ही यह अनंत कोटि ब्रह्माण्ड परमात्मा की माया के कारण ही सत्य लगता है। ईश्वर मनोभाव में नहीं जीता। उसमें न मन ही है तो संसार कैसे हो सकता है उसमें? वहाँ तो सत्य ही शेष रहता है, बाकी सम्पूर्ण जगत उसमें असत्य और मिथ्या ही है। वहाँ स्वयं देवता, स्वयं दानव, स्वयं ही अन्धकार, स्वयं ही प्रकाश है। स्वयं ही नाश करने वाला और स्वयं ही जिसका नाश होता है, वह भी वही है। वह स्वयं में स्वयं ही है। उसके सिवा दूसरा कुछ है ही नहीं। उसने स्वयं में मन उत्पन्न किया, फिर मन में अहंकार उपजा, फिर संकल्प से स्वयं ही भिन्न-भिन्न र...
Avdhut Gyan par jaaniye Bhagavad Gita ka satya arth, Vedant aur Atma Gyan. Sab kuch Vasudev hi hai - Vasudevam Sarvam ka rahasya saral bhasha me.