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मन से मुक्ति

.Title: मन क्या है? मन ही संसार है | अवधूत गीता से मुक्ति का पहला कदम*


*ॐ दत्तात्रेय नमः*













*हमारा जीवन व्यर्थ क्यों जा रहा है?*


आज हर व्यक्ति एक ही सवाल से परेशान है - शांति क्यों नहीं मिल रही? हम सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं, पैसे कमाते हैं, परिवार के लिए सब कुछ करते हैं, फिर भी रात को नींद नहीं आती। इसका कारण बाहर नहीं, अंदर है।







हमारा पूरा जीवन मन की गुलामी करने में बीत जाता है। मन जो कहता है, हम वही करते हैं। लेकिन हम कभी भी इस मन से मुक्त नहीं हो पाते। इसी वजह से हम दुखों में गिर जाते हैं और हमारा सारा जीवन व्यर्थ हो जाता है। जन्म और मरण का चक्कर इसी वजह से चलता रहता है।


इस मन से मुक्ति कैसे पाएं, यही इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य है।


*मन की परिभाषा क्या है?*


हमारे शास्त्रों, खास तौर पर अवधूत गीता और अष्टावक्र गीता में साफ लिखा है - *मन ही संसार है।*


मन कोई वस्तु नहीं है। मन विचारों का एक प्रवाह है। जैसे नदी में पानी बहता रहता है, वैसे ही मन में विचार बहते रहते हैं।


जिसका मन कंट्रोल में नहीं है, वो इस दिखने वाले संसार को ही सत्य समझ लेता है। उसे लगता है कि ये घर, ये गाड़ी, ये रिश्तेदार ही सब कुछ हैं। और इसी भ्रम में वो परमात्मा को भूल जाता है, जो वास्तव में एकमात्र सत्य है।


*मन में अहंकार कैसे बनता है?*


मन में ही अहंकार पैदा होता है। अहंकार का मतलब है - मैं शरीर हूँ।


जैसे ही ये विचार आता है कि मैं शरीर हूँ, वैसे ही सुख और दुख पैदा हो जाते हैं। अगर शरीर को सुख मिला तो हम खुश, दुख मिला तो हम दुखी।


और फिर हमें और पाने का भ्रम बना रहता है। और पैसा चाहिए, और इज्जत चाहिए, और बड़ा घर चाहिए। इस दौड़ में हम अपनी ही आत्मा से बहुत दूर हो जाते हैं।


आज का सच ये है कि सारा संसार मन का गुलाम बन चुका है, लेकिन परमात्मा का गुलाम कोई नहीं बनना चाहता।


*मुक्ति का रास्ता क्या है?*


इस मन से मुक्त होना ही परमात्मा को जानना है। और परमात्मा कोई मंदिर में नहीं है। परमात्मा हमारा सत्य स्वरूप है।


वो स्वरूप जो न कभी जन्मता है, न कभी मरता है। जिसमें संसार नाम की कोई वस्तु ही नहीं है। जो सबका साक्षी है, सब कुछ है, फिर भी एक है।


लेकिन मन उस एक परमात्मा को अनंत रूपों में देखता है। कहीं उससे छोटा दिखता है, कहीं बड़ा, कहीं अमीर, कहीं गरीब, कहीं सुंदर तो कहीं कुरूप। ये सब मन का खेला हुआ भ्रम है जो एक में भेद देखता है।


*निष्कर्ष:* इसलिए याद रखो - मन ही संसार है और मन से मुक्ति ही स्वयं परमात्मा है।

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