सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मन से मुक्ति पार्ट 4

 *दो पक्षियों की कथा - जीव से शिव तक की यात्रा*











जीवन को एक अज्ञानी की तरह जीने वाले हम मनुष्य इस जीवन में सब कुछ करते हैं, धन कमाते हैं, रिश्ते बनाते हैं, मान-सम्मान के पीछे भागते हैं, लेकिन कभी हमारा ध्यान उस ईश्वरीय ताकत को प्राप्त करने में नहीं जाता जो हमारे होने का कारण है और इस जगत का भी। जिसने हमें ये सारी व्यवस्था, ये शरीर, ये श्वास, ये बुद्धि करके दी है, हम उसे इस तरह नकारते हैं जैसे वो है ही नहीं। 


हमारे मन ने हमें संसार में बांध कर रखा हुआ है। वो परमात्मा चाहे भी तो हमें आज़ादी नहीं दे पाता, क्योंकि हम खुद ही आज़ाद होना नहीं चाहते। हम बंधन को ही सुख मान बैठे हैं। जो परमात्मा हमें सबसे पहले याद आना चाहिए, वो हमसे भूला जा चुका है। मनुष्य के मन में संसार की वासना भरी है, उसको परमात्मा की तरफ जाना नहीं आता। मन अनेक भोग भोगने पर भी कभी तृप्त नहीं होता। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म लेती है। फिर वो क्या है जिसे प्राप्त करने पर मन कभी दुःख में नहीं होता?


हमारी ही तरह शरीर वाले वे कौन लोग थे जिन्हें इच्छित वस्तु प्राप्त न होने पर भी उनका मन कभी दुःख में नहीं आता था? वो कौन थे जो किसी कीचड़ में कमल की तरह संसार की माया में सदा बने रहते हुए भी उससे सदा असंग रहते थे? उनका मन संसार की ओर नहीं, सदा परमात्मा की ओर रहता था।


इस रहस्य को समझाने के लिए मुण्डक उपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद में एक बहुत सुंदर कथा आती है।


*📖 कहानी*










मंत्र है - `द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥`


एक बहुत बड़ा और सुंदर वृक्ष है। यह वृक्ष इतना विशाल है कि इसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएं नीचे फैली हैं। उस वृक्ष की डालियों पर दो दिव्य पक्षी बैठे हैं, जो सदा साथ रहने वाले घनिष्ठ मित्र हैं। दोनों के पंख अत्यंत सुंदर और आकर्षक हैं।


*पहला पक्षी - नीचे की डालियों पर:* यह पक्षी बहुत चंचल और बेचैन है। वह एक डाल से दूसरी डाल पर फुदकता रहता है। वह वृक्ष पर लगे फलों को चखने में पूरी तरह व्यस्त है। जब उसे कोई मीठा फल मिलता है, तो वह बहुत खुश और आनंदित होता है, उछलने लगता है। लेकिन जैसे ही उसे कोई कड़वा या खट्टा फल मिलता है, वह दुख और निराशा से भर जाता है, रोने लगता है और बेचैन हो उठता है। वह बार-बार सुख और दुख के इस चक्र में फंसता रहता है। कभी हंसता है, कभी रोता है।


*दूसरा पक्षी - वृक्ष की सबसे ऊंची चोटी पर:* यह पक्षी अत्यंत शांत, स्थिर, तेजस्वी और राजसी है। वह वृक्ष का एक भी फल नहीं खाता। वह बस चुपचाप, बिना किसी चाहत या लालसा के, नीचे बैठे अपने मित्र पक्षी को और पूरे संसार को देखता रहता है। वह सुख और दुख दोनों से पूरी तरह अछूता है, सदा आनंद में स्थित है।


*कहानी का मोड़:*


नीचे बैठा चंचल पक्षी जब कड़वे फल खा-खाकर बहुत दुखी और असहाय महसूस करता है, थक जाता है, तो वह अचानक ऊपर बैठे अपने शांत मित्र की ओर देखता है। वह देखता है कि उसका मित्र बिना कुछ खाए भी कितना आनंदित, प्रकाशमान और शांत है। उसे आश्चर्य होता है कि बिना भोग के भी कोई इतना सुखी कैसे हो सकता है।


जैसे ही नीचे वाला पक्षी ऊपर वाले पक्षी के करीब जाता है और उसकी महिमा को पहचानता है, उसका सारा भ्रम दूर हो जाता है। उसे बोध होता है कि वह और ऊपर वाला पक्षी वास्तव में अलग नहीं हैं। दोनों एक ही हैं। इस बोध के साथ ही उसका सारा दुख, सारा शोक, सारा बंधन उसी क्षण गायब हो जाता है।


*इस कथा का गहरा आध्यात्मिक अर्थ:*


यह कहानी किसी बाहरी पक्षी की नहीं, बल्कि हमारे स्वयं के भीतर की स्थिति की है।


*1. वृक्ष -* यह हमारा भौतिक शरीर और यह संसार है, जिसे शास्त्रों में पीपल के वृक्ष के समान कहा गया है। यही कर्म-क्षेत्र है जहाँ हम फल भोगते हैं।


*2. नीचे वाला पक्षी - जीवात्मा (The Jiva):* यह हमारी इगो, हमारा अहंकार और हमारा चंचल मन है। हम खुद को यही पक्षी मान लेते हैं। यही कर्ता-भोक्ता बना हुआ है, जो दुनिया के सुख-दुख रूपी मीठे-कड़वे फल चखता है।


*3. ऊपर वाला पक्षी - परमात्मा या आत्मा (Atman / The Witness):* यह हमारे भीतर की शुद्ध चेतना है, हमारा साक्षी भाव है। यह हमारे भीतर ईश्वर का ही रूप है जो हमारे कर्मों को बिना किसी निर्णय के, बिना किसी आसक्ति के सिर्फ देखता है। गीता में इसी को साक्षी, द्रष्टा कहा है।


उपनिषद हमें समझाते हैं कि इंसानी जीवन का दुख तब तक खत्म नहीं हो सकता जब तक वह संसार के 'फलों' में सुख ढूंढता रहेगा। क्योंकि फल नश्वर हैं, आज मीठे हैं कल कड़वे हो जाएंगे।


जीवन में सच्ची शांति और मुक्ति तब मिलती है, जब हम अपनी चंचल इगो से ध्यान हटाकर अपने भीतर छुपे उस मौन साक्षी से जुड़ जाते हैं। वहाँ मन का अस्तित्व नहीं है, वहाँ कोई वासना नहीं है। वो परमात्मा संसार से सदा-सदा असंग है, उसका संसार के क्रियाकलापों से कुछ लेना-देना नहीं है। वही उसका सत्य स्वरूप है, जो हमारा भी सत्य स्वरूप है। उसी स्वरूप में स्थित होना ही मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।








जिसका जीवन परमात्मा को समर्पित हो गया, उसका ही जीवन वास्तव में सफल है। जो नहीं कर पाया, उसके लिए फिर जन्म-मरण, सुख-दुख, पशुओं की योनि और नर्कों की यात्रा बनी रहती है। इस मन से मुक्ति ही परमात्मा की तरह होना है, वही जो सत्य है और हमारा भी सत्य स्वरूप है

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मन से मुक्ति

.Title: मन क्या है? मन ही संसार है | अवधूत गीता से मुक्ति का पहला कदम* *ॐ दत्तात्रेय नमः* *हमारा जीवन व्यर्थ क्यों जा रहा है?* आज हर व्यक्ति एक ही सवाल से परेशान है - शांति क्यों नहीं मिल रही? हम सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं, पैसे कमाते हैं, परिवार के लिए सब कुछ करते हैं, फिर भी रात को नींद नहीं आती। इसका कारण बाहर नहीं, अंदर है। हमारा पूरा जीवन मन की गुलामी करने में बीत जाता है। मन जो कहता है, हम वही करते हैं। लेकिन हम कभी भी इस मन से मुक्त नहीं हो पाते। इसी वजह से हम दुखों में गिर जाते हैं और हमारा सारा जीवन व्यर्थ हो जाता है। जन्म और मरण का चक्कर इसी वजह से चलता रहता है। इस मन से मुक्ति कैसे पाएं, यही इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य है। *मन की परिभाषा क्या है?* हमारे शास्त्रों, खास तौर पर अवधूत गीता और अष्टावक्र गीता में साफ लिखा है - *मन ही संसार है।* मन कोई वस्तु नहीं है। मन विचारों का एक प्रवाह है। जैसे नदी में पानी बहता रहता है, वैसे ही मन में विचार बहते रहते हैं। जिसका मन कंट्रोल में नहीं है, वो इस दिखने वाले संसार को ही सत्य समझ लेता है। उसे लगता है कि ये घर, ये गाड़ी, ये रिश्तेदा...

मन से मुक्ति पार्ट 2

टाइटल:* जीवन का सबसे बड़ा भ्रम क्या है? मन ही संसार का बीज है *लेबल:* मन की माया, जीवन का सत्य, अद्वैत *आर्टिकल:* जीवन का भ्रम क्या है? हम सब एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। हमें लगता है कि मन द्वारा रचित ये संसार ही सत्य है। हम जो आँखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं, उसी को सच मान लेते हैं। लेकिन शास्त्रों में कहा गया है कि इस संसार के पीछे जो विराट परमात्मा है, वो मन की आँखों से कभी नहीं देखा जा सकता। उस परमात्मा को देखने के लिए मन का मिट जाना बहुत जरूरी है। मन संसार का बीज कैसे है? किसी भी पेड़ को देखिए। वो एक छोटे से बीज से बनता है। बीज दिखता नहीं, लेकिन उसी में पूरा पेड़ छुपा होता है। ठीक वैसे ही, मन ही इस संसार का मूल बीज है। मन दिखाई नहीं देता, लेकिन इसी से ये पूरा दिखने वाला संसार बनता है। इसीलिए शास्त्रों में लिखा है - *मन ही संसार है।* इसलिए ज्ञानियों ने कहा है, मन का गुलाम मत बनो, बल्कि मन को अपना गुलाम बनाओ। जो मन का गुलाम है, वो दुखी है। जो मन का मालिक है, वो सुखी है। मन की अपार शक्ति मन के पास अपार शक्ति है। ये एक ही चीज को अनेक प्रकार से दिखाता है। ये भेद करता है। ए...