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मन से मुक्ति पार्ट 2

टाइटल:* जीवन का सबसे बड़ा भ्रम क्या है? मन ही संसार का बीज है


*लेबल:* मन की माया, जीवन का सत्य, अद्वैत










*आर्टिकल:*


जीवन का भ्रम क्या है?


हम सब एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। हमें लगता है कि मन द्वारा रचित ये संसार ही सत्य है। हम जो आँखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं, उसी को सच मान लेते हैं।


लेकिन शास्त्रों में कहा गया है कि इस संसार के पीछे जो विराट परमात्मा है, वो मन की आँखों से कभी नहीं देखा जा सकता। उस परमात्मा को देखने के लिए मन का मिट जाना बहुत जरूरी है।


मन संसार का बीज कैसे है?


किसी भी पेड़ को देखिए। वो एक छोटे से बीज से बनता है। बीज दिखता नहीं, लेकिन उसी में पूरा पेड़ छुपा होता है।


ठीक वैसे ही, मन ही इस संसार का मूल बीज है। मन दिखाई नहीं देता, लेकिन इसी से ये पूरा दिखने वाला संसार बनता है।


इसीलिए शास्त्रों में लिखा है - *मन ही संसार है।*


इसलिए ज्ञानियों ने कहा है, मन का गुलाम मत बनो, बल्कि मन को अपना गुलाम बनाओ। जो मन का गुलाम है, वो दुखी है। जो मन का मालिक है, वो सुखी है।


मन की अपार शक्ति


मन के पास अपार शक्ति है। ये एक ही चीज को अनेक प्रकार से दिखाता है। ये भेद करता है।


एक ही परमात्मा को ये अलग-अलग रूपों में दिखाता है। इसी भेद के कारण मानव जीवन दुखी है।


मानव इस मन के रचित संसार को सत्य समझता है और मन के पार जिससे मन उत्पन्न होता है, उस परमात्मा की तरफ उसकी दृष्टि कभी जाती ही नहीं।


सोचो, मन का बीज क्या है? मन का बीज परमात्मा है, जो हमारा सत्य स्वरूप है। मन के नाश होने पर ही वो सत्य स्वरूप प्रकट होता है।


एक कहानी से समझो


एक आदमी सपना देख रहा है। सपने में उसने एक बहुत बड़ा महल देखा। महल में बहुत धन है। वो बहुत खुश है। लेकिन जैसे ही उसकी नींद खुली, महल गायब।


क्या सपने का महल सत्य था? नहीं।


ठीक वैसे ही, मन ही असत्य है तो उसके द्वारा रचित संसार कैसे सत्य हो सकता है? ये संसार भी सपने जैसा ही है।


सत्य केवल एक है - परमात्मा। वही अपनी माया द्वारा इस मन को प्रकट करता है, जिसमें ये दिखने वाला संसार मानव को दिखाई देता है।


वास्तव में न तो मन है और न ही मन के द्वारा सत्य लगने वाला ये संसार सत्य है। फिर ये कहाँ से सत्य हो सकता है? जो भी भेद-कल्पनाएं हैं, सब मन में हैं। जो असत्य है, उसका मिट जाना ही परमात्मा का प्रकट हो जाना है।


जब मन नहीं होता, तो संसार भी सत्य नहीं लगता। केवल मूर्ख मन ही संसार को सत्य समझता है। आज का मानव मन के पूरे कंट्रोल में है, इसलिए इस संसार को सत्य समझता है।


*अगले ब्लॉग में हम जानेंगे कि मन से मुक्ति का अभ्यास कैसे करें। पुरुषार्थ

 करने से ही मन से मुक्ति कैसे संभव है।*


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