विश्व में पूजे जाने वाला परमात्मा भिन्न-भिन्न धर्मों में भिन्न-भिन्न प्रकार से जाना गया है।*
कहीं उसे मूर्ति में ढाला जाता है, सुंदर श्रृंगार किया जाता है, उसे अवतार के रूप में पूजा जाता है। श्री राम, श्री कृष्ण, शिव, बुद्ध के रूप में। तो कहीं किसी धर्म में उसके मूर्ति न होने पर जोर दिया जाता है। कहा जाता है कि परमात्मा की कोई मूर्ति नहीं हो सकती, उसका कोई आकार नहीं है, उसे निराकार ही मानो। एक धर्म कहता है मंदिर में है, दूसरा कहता है मस्जिद में है, तीसरा कहता है चर्च में है। पर सच तो यह है कि परमात्मा संसार के किसी भी धर्म में फिट नहीं होता।
धर्म तो इंसान ने बनाए हैं, परमात्मा ने नहीं। धर्म तो नदी के किनारे बने घाट हैं, परमात्मा तो स्वयं सागर है। क्या सागर किसी एक घाट में फिट हो सकता है? नहीं। वैसे ही परमात्मा किसी एक धर्म की सीमा में नहीं बंध सकता।
उसको मानने वाले न तो उसे जानते हैं और न ही उन्होंने उसे कहीं अनुभव किया है। वे सिर्फ हजारों सालों से चली आई कहानियों को ही अपने धर्मों के अनुरूप सत्य समझे बैठे हैं। दादा ने कहा, पिताजी ने कहा, ग्रंथ में लिखा है, इसलिए सत्य है। पर किसी ने स्वयं आँख बंद करके अपने भीतर झाँका ही नहीं कि वह है भी या नहीं। यह तो ऐसे ही है जैसे किसी ने आम कभी खाया ही नहीं और आम के स्वाद पर किताबें लिख रहा है। धर्म की किताबें पढ़कर परमात्मा को जानने का दावा करना वैसा ही है।
*परम तत्त्व किसी के पूजे जाने पर प्रसन्न नहीं होता। वह न संसार के धर्मों को सत्य समझता है।*
हम सोचते हैं कि हम पूजा करेंगे तो परमात्मा खुश होगा, हम भोग लगाएंगे तो वह प्रसन्न होगा। यह हमारी सबसे बड़ी भूल है। परम तत्त्व, वह शुद्ध चैतन्य, किसी के पूजने पर प्रसन्न नहीं होता। प्रसन्न होना तो मन का लक्षण है। मन को कुछ अच्छा लगे तो वह प्रसन्न होता है, बुरा लगे तो उदास होता है। परमात्मा मन नहीं है, वह तो मन का भी साक्षी है।
उसके लिए न कहीं उसके मंदिर हैं, न ही उसकी मस्जिद और चर्च। ये सब महज संसार के लोगों का उसके प्रति अपनी भक्ति दिखाने का जरिया है। इन सब में परमात्मा की कोई रुचि नहीं है। मंदिर, मस्जिद, चर्च इंसानों को चाहिए, परमात्मा को नहीं। इंसान को एक जगह चाहिए जहाँ वह बैठकर अपने अहंकार को थोड़ा शांत कर सके, इसलिए उसने ये स्थान बनाए। परमात्मा तो कण-कण में है, उसे किसी विशेष इमारत की क्या आवश्यकता?
परमात्मा न तो स्वयं को इस तरह जानता है कि मेरे लिए ये सब कितना कुछ करते हैं, कितने दान, कितने पुण्य, कितने मंदिर-मस्जिद मेरे लिए ही बनाए हैं, मैं इनको कितना कुछ देता हूँ। ऐसा सोचना तो अहंकार का लक्षण है। एक राजा सोचता है कि प्रजा मेरे लिए कितना करती है। एक सेठ सोचता है कि नौकर मेरे लिए कितना काम करते हैं। पर परमात्मा में अहंकार है ही नहीं, तो वह ऐसा क्यों सोचेगा?
वह परमात्मा स्वयं में इस तरह कुछ नहीं देखता। उसके लिए ये सब धर्म, यज्ञ, अनुष्ठान, पूजा पद्धति, समारोह, त्योहार, तीर्थ कुछ नहीं है। वह किसके लिए ये सब देखकर प्रसन्न हो? उसमें किस चीज की कमी है जो वह कुछ चाहे? उसे किसकी जरूरत है जिसे तुम देकर पूरा करो? उसे क्या खलता है जो तुम पूरा करो? जो पूर्ण है, उसे क्या चाहिए?
प्रसन्न होना मनुष्य का लक्षण है क्योंकि उसमें अहंकार है जिससे वह स्वयं को श्रेष्ठ जानता है। जब कोई हमारी पूजा करता है, हमारी तारीफ करता है, तो हमारे अहंकार को भोजन मिलता है और हम प्रसन्न होते हैं। हममें संसार का रस है कि हमें संसार में ये सब चीजें मिल सकती हैं जिससे हम अपने अहंकार को भरते हैं। और इसी अहंकार को भरते-भरते वह स्वयं को भी परमात्मा से दूर कर लेता है। जितना बड़ा अहंकार, परमात्मा से उतनी ही बड़ी दूरी।
*परमात्मा में अहंकार बिल्कुल नहीं है। उसमें किसी से बेहतर बनने की कोई इच्छा नहीं, वह सब कुछ है।*
उसके लिए उसके सिवा कोई दूसरा है ही नहीं। जब दूसरा कोई है ही नहीं, तो बेहतर किससे बनना? प्रतियोगिता किससे करनी? इसलिए वह न किसी चीज के मिलने पर पूर्ण हो जाएगा और न किसी चीज के छूटने पर अधूरा रह जाएगा। वह स्वयं में ही पूर्ण है।
*ब्रह्मसत्ता से ही जगत की स्थिति है, उसकी पृथक सत्ता नहीं है।* जैसे माला में धागा है, धागे से ही मोतियों की स्थिति है, मोतियों की अपनी कोई अलग सत्ता नहीं, वैसे ही ब्रह्मसत्ता से ही इस जगत की स्थिति है।
प्राणियों को पृथक अपनी सत्ता से जो जगत की स्थिति प्रतीत होती है, वह ब्रह्मस्वरूप स्थिति के ज्ञात न होने के कारण ही है। जैसे सर्वव्यापक आकाश आदि भी सूक्ष्म होने के कारण दृष्टिगोचर नहीं होता, आँखों से दिखता नहीं, वैसे ही निरवयव शुद्ध चेतन सर्वव्यापक होने पर भी नहीं दिखाई देता।
*जैसे मणि के अन्दर प्रतिबिम्ब भली-भाँति स्थित-सा चारों ओर प्रतीत होता है, वह न तो सत्य है और न असत्य है, वैसे ही आत्मा में यह सृष्टि है।* मणि के अंदर आप देखो तो बहुत सारे रंग दिखते हैं, पर वे रंग न तो पूरी तरह सत्य हैं न असत्य। वैसे ही यह सारा संसार आत्मा में दिख रहा है, पर न सत्य है न असत्य, यह तो माया है।
इसीलिए उपनिषद कहते हैं -
*ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।*
*पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।*
*ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥*
वह परमात्मा पूर्ण है, यह जगत भी उसी पूर्ण से निकला होने से पूर्ण है। उस पूर्ण में से यह पूर्ण जगत निकलने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है। उसमें कभी कोई कमी नहीं आती। वह सदा पूर्ण, सदा शांत है।
*वासुदेवम् सर्वम्।*


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