आध्यात्मिक व्यक्ति होने के लिए 5 आवश्यक नियम
आध्यात्मिक होने के सच्चे मायने
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| आध्यात्मिक विचारधारा |
आध्यात्मिक होने के लिए न किसी खास धर्म को मानने की जरूरत है, न मंदिर-मस्जिद जाने की। अध्यात्म का जन्म तब होता है जब व्यक्ति अंदर झांकता है। जब उसे संसार में कोई सार नजर नहीं आता, जब बाहर की सारी चमक-दमक खोखली लगने लगती है।
वह परमात्मा को नहीं जानता, लेकिन उसे अपने जीवन में सार्थकता चाहिए। अंदर एक खालीपन है, जिसे भरने के लिए वह बाहर नहीं, भीतर देखता है।
सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति किसी धर्म का अंधों की तरह पालन नहीं करता। वह किसी किताब, किसी पंडित या किसी भीड़ के कहने पर नहीं चलता। वह स्वयं अपने विचार और अपने अनुभव से परमात्मा को देखता है। उसे मानसिक गुलाम नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि वह स्वयं अपने जीवन का मार्गदर्शक होता है।
आज हर दूसरा व्यक्ति खुद को आध्यात्मिक कहता है, लेकिन अध्यात्म का असली अर्थ बहुत कम लोग जानते हैं। आध्यात्मिक दिखना आसान है - तिलक लगा लेना, माला पहन लेना, पर आध्यात्मिक होना बिल्कुल अलग बात है।
आइए जानते हैं ऐसे 5 नियम, जो केवल एक सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति के अंदर होते हैं और जिनसे वह कभी समझौता नहीं करता:
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| Adhyatma ka janm andar jhankne se hota hai, sansar khokhla lagta hai - Avdhut Gyan |
1. अंधविश्वास नहीं, अनुभव
वास्तव में आध्यात्मिक व्यक्ति कभी भी किसी चीज को केवल इस कारण से स्वीकार नहीं करता कि वह समाज द्वारा पूजित है या लोग उसमें अंधों की तरह जा रहे हैं। समाज ने अपने नियम, मान्यताएं और परंपराएं बना रखी हैं, लेकिन एक सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति उन मान्यताओं को तब तक सत्य नहीं मानता, जब तक उसे स्वयं उसका प्रत्यक्ष अनुभव न हो जाए।
वह भीड़ को देखकर सत्य का निर्णय नहीं करता। हजारों लोग किसी एक दिशा में जा रहे हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वही दिशा सही है। उसे परमात्मा में गहरा विश्वास है, लेकिन वह विश्वास अंधविश्वास नहीं है। वह लोगों की सुनी-सुनाई बातों, अफवाहों या डर के आधार पर ईश्वर को नहीं मानता।
उसके मन में यह विचार कभी नहीं आता कि 'ऐसा न किया तो क्या होगा, चलो एक बार करके देख लेता हूँ'। वह भय से कर्म नहीं करता। उसे धर्म के नाम पर, समाज के नाम पर या मान्यता के नाम पर डराया नहीं जा सकता। वह जानता है कि डर से किया गया कोई भी कार्य आध्यात्मिक नहीं हो सकता।
वह परमात्मा को अपनी स्वयं की नजरों से देखना चाहता है, किसी दूसरे की उधार ली हुई नजर से नहीं। उसे किसी धर्म या पंथ की आँखों से ईश्वर को नहीं देखना, बल्कि अपने स्वयं के अनुभव की आँख से देखना है। ऐसा व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक कहलाता है, जो दूसरों के अनुभवों को सुनकर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरकर, स्वयं को जानकर परमात्मा को जानना चाहता है।
2.अंतरात्मा को पूर्णता समर्पित
सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति का गुण यह है कि उसे पाखंड पसंद नहीं होता। वह पाखंडी लोगों से स्वयं को दूर कर लेता है। जो अंदर कुछ और बाहर कुछ और दिखाता है, वह कभी भी अध्यात्म को अपना नहीं सकता, क्योंकि अध्यात्म में सच्चाई ही आधार है।
आध्यात्मिक व्यक्ति अपने अंदर की कमियों को अच्छे से जानता है और उन्हें स्वीकार करता है। वह कमियों को छिपाता नहीं, बल्कि सुधारने का प्रयास करता है। उसे समाज के सामने किसी चीज का दिखावा नहीं करना होता। वह जैसा है वैसा ही रहना पसंद करता है।
उसे यदि कोई गलत कह दे तो वह अहंकार से काम नहीं लेता। वह लड़ता नहीं, बल्कि शांत मन से भीतर देखता है। वह परमात्मा की भक्ति का कभी दिखावा नहीं करता। वह जानता है कि भक्ति दिखाने की नहीं, जीने की चीज है।
वह रोज अपने अंदर झांकता है और खुद से पूछता है कि कहीं मैं तो पाखंड नहीं कर रहा, मेरे अंदर किसी के प्रति द्वेष या बुरे विचार तो नहीं हैं। वह मानता है कि दूसरे पर सवाल उठाने से पहले स्वयं पर सवाल उठाना ज्यादा जरूरी है।
सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति इसका पूरा ध्यान रखता है। उसे आत्मा की सुंदरता की चिंता है, शरीर की नहीं। वह कोई भी कार्य तभी करता है जब उसके अंदर किसी प्रकार की ग्लानि न हो।या उसमें कोई अपराधबोध जन्म न ले।
3.सुख नहीं संसार का
आध्यात्मिक होने से पहले हमें अपने जीवन में एक परिवर्तन करना पड़ता है। जो सुख इंद्रियों के भोग से मिलते हैं, जो क्षणिक और अस्थायी हैं, उनसे ज्यादा महत्व हमें परमात्मा को देना पड़ता है। जब तक हम संसार के भोगों को ही सब कुछ मानते रहेंगे, तब तक सच में आध्यात्मिक नहीं हो सकते। सच्चा अध्यात्म तभी शुरू होता है जब हम स्थायी सुख की खोज में निकलते हैं।
अध्यात्म संसार के सुखों की बातें नहीं करता। वह तुम्हें स्वर्ग के भोगों का लालच भी नहीं देता कि अच्छा कर्म करोगे तो स्वर्ग मिलेगा। वह तो तुम्हें ऐसी अवस्था तक ले जाना चाहता है जहाँ भोगों की आवश्यकता ही न रहे। जहाँ कुछ पाना शेष ही न रह जाए, जहाँ तुम स्वयं में ही पूर्ण हो जाओ। यही अध्यात्म का असली लक्ष्य है।
आध्यात्मिक व्यक्ति होने पर संसार धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है। उसके जीवन में संसार की बात ही नहीं रह जाती। उसके लिए अवसर केवल एक ही बचता है और वह है स्वयं परमात्मा जैसा हो जाना, परमात्मा में लीन हो जाना।
सुखी व्यक्ति तो संसार में बहुत देखे जा सकते हैं क्योंकि उनके पास साधन हैं, धन है, सुविधाएं हैं, वे भोग-विलास कर सकते हैं। लेकिन यह सुख बाहर की वस्तुओं पर निर्भर है। असली आश्चर्य तो तब है जब जिसके पास बाहर कुछ भी न हो, फिर भी वह स्वयं में पूर्ण हो, उसे किसी की आवश्यकता ही न हो, वह अपने आप में प्रसन्न हो।
ऐसे व्यक्ति ने सुख का स्रोत संसारी वस्तुओं में नहीं, बल्कि स्वयं ब्रह्मांड में, अपने भीतर ही ढूंढ लिया है। वास्तव में केवल सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है। भीतर से ऐसा तृप्त हो जाना जिसे कोई आशा ही न हो, तो वह निराश कैसे होगा। ऐसा गुण रखने वाला ही सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक कहलाता है।
4.परमात्मा हीं जीवन का लक्ष्य
साधारण मनुष्य का जीवन बाहर संसार में कुछ पाने में ही लग जाता है। धन, पद, मान-सम्मान, योग्यता, साधन ,स्त्री आदि को ही वह जीवन का लक्ष्य बना लेता है और पूरी जिंदगी इन्हीं के पीछे भागता रहता है। उसे लगता है कि इन्हें पा लेने से वह सुखी हो जाएगा।
लेकिन आध्यात्मिक व्यक्ति ऐसा नहीं सोचता। उसे संसार में कुछ भी नहीं पाना होता। उसका लक्ष्य संसार नहीं, स्वयं परमात्मा होता है। चाहे बदले में उसे संसार में कुछ भी न मिले, चाहे उसे दर-दर की ठोकरें खानी पड़े, फिर भी वह परमात्मा को ही चुनेगा। परमात्मा को चुनना ही उसका अंतिम चुनाव है और इसके लिए वह कोई समझौता नहीं करता।
वह सत्य को जानना चाहता है। उसके अंदर सत्य के प्रति जो प्यास है, वह कभी बुझती नहीं। यह प्यास उसे हर पल खोज की तरफ ले जाती है। अगर यही प्यास तुम्हारे अंदर भी है तो समझो तुम भी आध्यात्मिक हो।
क्या परमात्मा ही तुम्हारे जीवन का लक्ष्य है? क्या तुम जानना चाहते हो कि सत्य क्या है, इस संसार का कारण क्या है, मैं कौन हूँ? अगर ये सवाल तुम्हारे अंदर घर कर चुके हैं और तुम्हें सोने नहीं देते, तभी खुद को आध्यात्मिक समझो।
आध्यात्मिक होना यानी परमात्मा और सत्य की प्यास का होना है। वरना मंदिर मस्जिद तो सारी दुनिया जाती है, गीता कुरान तो सारी दुनिया पढ़ती है। जिसके लिए संसार लक्ष्य हो ही नहीं सकता, केवल परमात्मा ही लक्ष्य हो सकता है, तभी अंदर सच्ची प्यास होती है। यह प्यास ही अध्यात्म है।
5.अकेले चलने का साहस
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| Akele chalne ka sahas hi sacha adhyatma hai, bheed me Parmatma nahi milta |
न ध्यान से, न किसी योग से, न ज्यादा बुद्धि से और न ही दान और पूजा-पाठ से आप आध्यात्मिक कहे जाओगे। आध्यात्मिक होने के लिए इन सब की जरूरत नहीं है। ये सब साधन हो सकते हैं, लेकिन साध्य नहीं। वास्तव में सत्य को जिसने भी जाना, उसने भीड़ में कभी नहीं पाया। सत्य हमेशा एकांत में ही मिलता है और उसी एकांत में वह परमात्मा को जान पाया।
पृथ्वी पर चंद ही लोग ऐसे हुए हैं जिन्हें सत्य का, परमात्मा का पता चला। उस सूची में आप भी हो सकते हैं, यदि आप भीड़ में घुलने की आदत छोड़कर अकेले में घुलना शुरू कर दें। भीड़ में रहकर परमात्मा को नहीं पाया जा सकता।
ये दोस्त, यार, परिवार, रिश्ते, ये सब एक सीमा तक मतलब के ही हैं। इन्हीं में मोह रखना हमें संसारी बनाता है, आध्यात्मिक नहीं। जब तक हम इन रिश्तों के मोह में उलझे रहेंगे, तब तक सत्य तक नहीं पहुँच सकते।
गीता में भी जब अर्जुन को सामने शत्रुओं के रूप में अपने ही सगे-संबंधी दिखाई दिए, तब उसका मोह टूटा और तभी भगवान कृष्ण ने उसे गीता सुनाई। वास्तव में अकेले चलने का साहस ही अध्यात्म की पराकाष्ठा है।
क्योंकि अकेले व्यक्ति के साथ ही परमात्मा आ सकता है। भीड़ में उसे परमात्मा की याद नहीं आती। जो जितना अकेला होगा, वह परमात्मा को उतनी तत्परता से याद कर पाएगा। और आश्चर्य यह है कि अगर आध्यात्मिक व्यक्ति परमात्मा को न भी माने, तो भी उसका जीवन परमात्मा जैसा ही हो जाता है।
अंत में
अपने जीवन में अगर आपको अध्यात्म की तरफ रुचि भी है तो भी ऊपर दी हुई बातों के बिना आपके जीवन में अध्यात्म नहीं उतर सकता। क्योंकि पश्चिम की एक प्रसिद्ध कहावत है कि धर्म उनके लिए है जो नर्क से डरते हैं और अध्यात्म उनके लिए है जो नर्क से गुजर चुके हैं। यानी धर्म डर से पैदा होता है, जबकि अध्यात्म अनुभव से।
आपको अगर सच्चा अध्यात्म चाहिए तो आपको अपने सारे मोह, सारे बंधन त्यागने भी पड़ सकते हैं। यह आसान नहीं है, क्योंकि मन हमेशा पकड़ कर रखना चाहता है। जिसने भी आध्यात्मिक होने का दावा किया है, वह ऊपर दी गई बातों में जरूर विश्वास करेगा और उन्हें जीवन में उतारेगा। जो आध्यात्मिक नहीं है, वह उन्हें जीवन में कभी नहीं पा सकेगा।
इस लेख का उद्देश्य ही यही है कि आपके भीतर अध्यात्म की आग लग जाए, आपके अंदर एक प्यास पैदा हो। आप अपने आप को आत्मा जानिए, शरीर नहीं। शरीर तो केवल एक वस्त्र है, आप स्वयं आत्मा हैं। जब आप ऐसा जान लेंगे, तभी आप अध्यात्म की ओर पहला कदम बढ़ाएंगे।
और जो अध्यात्म आपको प्राप्त कराएगा, वह स्वयं अनंत कोटि ब्रह्मांडों का जाल फैलाने वाला परमात्मा होगा। उसी परमात्मा में लीन हो जाना ही इस ब्रह्मांड के या अन्य अनंत ब्रह्मांडों के अनंत जीवों का अंतिम आत्मिक लक्ष्य है। वही लक्ष्य श्रेयस्कर है, यानी सबसे बड़ा है, अनंत पृथ्वियों के सारे लक्ष्यों से भी बड़ा।





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