भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं का संक्षिप्त विवरण
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं में से पहले 12 के बारे में हमने पिछली पोस्ट में जाना था - पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा और भ्रमर।
भगवान दत्तात्रेय का परिचय
अब जानते हैं बाकी के 12 गुरुओं के बारे में, जिन्हें देखकर दत्तात्रेय जी ने जीवन का गहरा ज्ञान लिया
1.एक कुंवारी लड़की
भगवान दत्तात्रेय एक बार एक घर में गए, वहाँ एक कुंवारी कन्या धान कूट रही थी। उसके दोनों हाथों में बहुत सारी चूड़ियाँ थीं, जो कूटते समय खनक रही थीं। उसे डर था कि यह आवाज़ सुनकर घर आए मेहमान को लगेगा कि भूख के कारण वह धान कूट रही है। इसलिए उसने शर्म से एक हाथ की सारी और दूसरे हाथ की एक छोड़कर बाकी चूड़ियाँ तोड़ दीं। फिर आवाज़ बंद हो गई। दत्तात्रेय जी ने इससे सीखा कि परमात्मा के मार्ग में लगे अवधूत को भी अकेले ही रहना चाहिए, भीड़ में रहने से व्यर्थ का शोर और झंझट ही बढ़ता है।
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2.तीर बनाने वाला
भगवान दत्तात्रेय ने एक बार एक तीर बनाने वाले को देखा। वह अपनी छोटी सी दुकान में बैठा बड़ी तन्मयता से तीर को सीधा कर रहा था। उसकी आँखें और मन बस उसी काम में लगे थे। उसी समय वहाँ से ढोल-नगाड़ों के साथ राजा का बड़ा जुलूस निकला, पर उस कारीगर को कुछ पता ही नहीं चला। वह न तो खड़ा हुआ और न ही उसने राजा की ओर देखा। उसकी ऐसी एकाग्रता देखकर दत्तात्रेय जी ने सीखा कि हमें भी परमात्मा के ध्यान में इतना लीन हो जाना चाहिए कि बाहर कुछ भी होता रहे, हमारा ध्यान भटके ही नहीं।
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3 मकड़ी
जिस तरह मकड़ी अपने अंदर से ही जाला निकालती है, उसी जाले में खुद रहती है, खेलती है और अंत में उसी को वापस निगल जाती है। फिर कुछ समय बाद वही प्रक्रिया दोहराती है। ठीक वैसे ही परमात्मा भी इस पूरे जगत को अपने से ही रचता है, उसी में निवास करता है और अंत में सबको अपने में समेट लेता है। भगवान दत्तात्रेय ने मकड़ी से यही सीखा कि अवधूत को परमात्मा के बनाए हुए मोह-माया के जाल में नहीं उलझना चाहिए। उसे उस परमात्मा की तरह स्थिर रहना चाहिए, जो जगत बनाकर भी उसके बंधन में कभी नहीं बंधता।
4.हाथी
हाथी को स्पर्श का सुख बहुत प्रिय होता है। वह इसी सुख के पीछे पागल रहता है। इसी कमजोरी का फायदा शिकारी उठाता है। वह जंगल में गड्ढा खोदकर ऊपर से घास डाल देता है और वहां कागज की बनी हथिनी खड़ी कर देता है। हाथी उसे असली समझकर स्पर्श सुख के लिए उसकी ओर दौड़ता है और गड्ढे में गिर जाता है, फिर पकड़ा जाता है। भगवान दत्तात्रेय ने इससे सीखा कि मनुष्य भी ऐसे ही एक छोटे से सुख के पीछे अपने बड़े लक्ष्य को छोड़ देता है और दुख के गड्ढे में गिर जाता है। इसलिए अवधूत को परमात्मा प्राप्ति करने के लिए क्षणिक सुखों से दूर रहना चाहिए।
5.मछली
भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि मछली जीभ के स्वाद के कारण ही अपनी जान गंवा देती है। मछुआरा कांटे में आटे का टुकड़ा लगाता है, मछली स्वाद के लालच में उसे निगलते ही फंस जाती है और प्राण दे देती है। वैसे ही मनुष्य भी जीभ और इंद्रियों के भोगों के पीछे भागते-भागते अपने ही कर्मों के जाल में फंसकर नर्क जैसा दुख भोगता है। इसलिए अवधूत को कभी भी अपनी इंद्रियों का गुलाम नहीं बनना चाहिए।
6.मधुमक्खी
भगवान दत्तात्रेय कहते हैं, जिस तरह मधुमक्खी कई तरह के फूलों पर जाती है, पर हर फूल से केवल मीठा रस ही लेती है और उससे शहद बनाती है, कचरा नहीं लेती। उसी तरह मनुष्य को भी जीवन में कई शास्त्रों, लोगों और अनुभवों से मिलना पड़ता है। उसे चाहिए कि वह सब जगह से केवल अच्छी और शुभ बातें ही ग्रहण करे, उन्हें अपने जीवन में उतारे। बेकार, नकारात्मक और अशुभ विचारों को मधुमक्खी की तरह छोड़ देना ही बुद्धिमानी है।
7.हिरन
भगवान दत्तात्रेय कहते हैं, जैसे हिरण मधुर संगीत सुनकर उस पर मोहित हो जाता है। शिकारी बांसुरी या वीणा की मीठी धुन बजाता है, हिरण उसी ध्वनि में इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे आस-पास के खतरे का पता ही नहीं चलता और वह आसानी से शिकार हो जाता है। वैसे ही मनुष्य भी बाहर की मीठी-मीठी बातों, झूठी प्रशंसा और आकर्षक प्रलोभनों में फंसकर अपना होश खो बैठता है। अवधूत को चाहिए कि वह कानों के इस मोह से बचकर अपने लक्ष्य पर स्थिर रहे।
8.भृंगी किट
भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि भृंगी कीट एक छोटे कीड़े को पकड़कर अपने घोंसले में ले आता है और उसके सामने लगातार भिन-भिन की आवाज करता रहता है। वह कीड़ा डर और उसी आवाज में खोकर हर समय उसी का ध्यान करता रहता है, और धीरे-धीरे वह खुद भी भृंगी जैसा ही बन जाता है। वैसे ही अवधूत भी अगर सच्चे मन से लगातार परमात्मा का ही चिंतन करता रहे, तो एक दिन वह परमात्मा को अपने हृदय में बसा लेता है और खुद परमात्मा स्वरूप हो जाता है।
9.सांप
भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि सांप का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह दूसरों को देखकर बिना कारण फन फैलाता है और डंक मार देता है। लोग भी उसे देखकर डरते हैं, लाठियों से मारते हैं और भगा देते हैं। उसका जीवन हमेशा भय और नफरत में ही बीतता है। वैसे ही जो व्यक्ति उद्दंडी, क्रूर और अत्याचारी होता है, वह भी बिना वजह दूसरों को सताता है। अंत में उसी के बुरे कर्मों का फल लौटकर उसी पर आता है और उसे भी समाज में तिरस्कार और दुख ही सहना पड़ता है।
10.लुहार
भगवान दत्तात्रेय ने एक दिन एक लुहार को देखा। वह लोहे को भट्टी में डालकर खूब तपाता है, फिर हथौड़े से पीट-पीटकर उसे नरम बनाता है। तपने और चोट सहने के बाद वही कठोर लोहा सुंदर और आकर्षक औजारों, मूर्तियों के रूप में ढल जाता है। दत्तात्रेय जी कहते हैं, वैसे ही मनुष्य का जीवन भी है। यदि व्यक्ति दुख, तप और संघर्ष की चोटें सहने को तैयार हो जाए, तो वही जीवन कुंदन की तरह निखर जाता है। फिर उसे परमपद पाने से कोई नहीं रोक सकता।
11.कौआ
भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि कौआ अपनी धूर्तता और कर्कश आवाज के कारण किसी को प्रिय नहीं लगता। वह चालाकी से दूसरों का भोजन छीनने की कोशिश करता है और जोर-जोर से काँव-काँव करता है, इसलिए लोग उसे प्यार नहीं करते, बल्कि देखते ही भगा देते हैं। वैसे ही जो इंसान धूर्त होता है और हमेशा कड़वा व कठोर बोलता है, उसे भी परमात्मा से कभी सम्मान नहीं मिलता। उसे भी परमात्मा से तिरस्कार ही सहना पड़ता है।
12.अबोध बालक
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भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि एक नन्हा बालक भी मेरा गुरु है। क्योंकि वह बिल्कुल निश्छल होता है, उसके मन में राग-द्वेष, काम-क्रोध और अहंकार जैसे कोई रोग नहीं होते। वह हर पल मस्ती में जीता है, न अतीत की चिंता न भविष्य का भय। उसका चेहरा इतना सौम्य और सुंदर होता है कि हर कोई उसे देखते ही प्यार करने लगता है। वैसे ही अवधूत की अवस्था भी होनी चाहिए। जो संत बालक के समान सरल और पवित्र होता है, उसे भी सब जगह से प्रेम ही मिलता है।
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अंत में
मैं भगवान दत्तात्रेय के पावन चरणों में सादर नमन करता हूँ। उन्होंने प्रकृति और जीवन से जो 24 गुरु बनाए, उनका सरल अर्थ और उनसे मिलने वाली शिक्षा को मैंने आपको समझाने की कोशिश की है। मेरा उद्देश्य सिर्फ कहानी सुनाना नहीं, बल्कि आपको जागरूक करना है। यदि आप इन 24 गुरुओं की सीख को अपने जीवन में उतारते हैं, अपने स्वभाव और विचारों में सच्चा परिवर्तन लाते हैं और अपने जीवन को परमात्मा के मार्ग पर लगाते हैं, तो मैं समझूंगा कि मेरा यह छोटा सा लेख लिखना सच में सफल हो गया।





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