परमात्मा के चुने हुए व्यक्ति के लक्षण
परमात्मा के चुने हुए व्यक्ति के 5 दिव्य लक्षण - क्या आप भी उनमें से एक हैं?
![]() |
| परमात्मा का भक्त |
इस धरती पर 800 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। सब सुबह उठते हैं, पैसा कमाते हैं, रिश्ते बनाते हैं, और एक दिन चले जाते हैं। लेकिन इन करोड़ों की भीड़ में कुछ हजार लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें परमात्मा ने खुद अपने हाथों से चुना होता है।
ये भीड़ के नहीं होते, भीड़ इनकी नहीं होती।
इनका जीवन आम आदमी जैसा नहीं होता। इनके जीवन में ऐसी घटनाएं घटती हैं, जिन्हें सुनकर दुनिया कहेगी - "ये तो झूठ है, ऐसा हो ही नहीं सकता।" लेकिन वही इनके जीवन का सबसे बड़ा सत्य होता है। परमात्मा ने इन्हें इस संसार में अपना प्रमाण देने के लिए भेजा होता है। जब दुनिया कहती है कि भगवान नहीं है, तब परमात्मा अपने इन चुने हुए लोगों के जीवन से कहता है - "देखो, मैं हूँ।"
ऐसे लोगों को आम जिंदगी जीने का सौभाग्य नहीं मिलता। इन्हें एक अलग, सुनसान और बहुत कठिन मार्ग दिया जाता है। जिस मार्ग पर चलकर आम इंसान या तो हार मान लेगा, या पूरी तरह टूट कर बिखर जाएगा। लेकिन परमात्मा का चुना हुआ उसी कठिन मार्ग से हंसता हुआ निकल जाता है, क्योंकि उसे खींचने वाला हाथ किसी इंसान का नहीं, स्वयं परमात्मा का होता है।
तो कैसे पहचानोगे कि कौन परमात्मा का चुना हुआ है? उसके जीवन में 5 लक्षण ऐसे होते हैं, जो दुनिया के बाकी लोगों में कभी नहीं मिलेंगे।
1. अकेले चलने का अटूट साहस
दुनिया को भीड़ चाहिए। अकेलेपन से सब डरते हैं। आम आदमी को जीने के लिए परिवार चाहिए, रिश्तेदार चाहिए, दोस्त चाहिए, समाज की तालियां चाहिए। अगर उसे किसी का सहारा न मिले, कोई मार्गदर्शन न मिले, तो वह मानसिक रूप से टूट जाता है। वह खुद से एक कदम भी नहीं चल पाता।
लेकिन परमात्मा का चुना हुआ भीड़ से नहीं, अकेलेपन से प्रेम करता है।
वह जानबूझकर खुद को अकेला कर लेता है। ऐसा नहीं कि उसके पास लोग नहीं हैं, बल्कि वह जानता है कि भीड़ में परमात्मा की आवाज सुनाई नहीं देती। इसीलिए वह अपने जीवन की नाव को केवल परमात्मा के भरोसे छोड़ देता है। वह अपनी तरफ से हिलता-डुलता भी नहीं है।
वह कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता। न नौकरी के लिए, न पैसे के लिए, न सहानुभूति के लिए। वह भविष्य की चिंता में घुलता भी नहीं है। दुनिया कल की चिंता में आज को बर्बाद कर देती है, लेकिन वह जानता है कि उसकी चिंता करने वाला कोई और नहीं, अनंत कोटि ब्रह्मांडों का मालिक स्वयं है।
इसीलिए वह जीवन भर अकेला ही चलता है। लोगों को लगता है वह अकेला है, लेकिन सच्चाई यह है कि वह कभी अकेला होता ही नहीं। उसके साथ वह चलता है जो कभी किसी का साथ नहीं छोड़ता।
2. वज्र जैसा धैर्य और संयम
हमारा जीवन हमारी मर्जी से नहीं चलता। दुख बिना दरवाजा खटखटाए आ जाता है। कभी बीमारी, कभी गरीबी, कभी अपनों का छूट जाना।
जब ऐसा बुरा समय आता है, तो आम आदमी क्या करता है? वह या तो अवसाद में चला जाता है, या नशे और बुरी आदतों का गुलाम बन जाता है। उस घड़ी में उसके साथ केवल परमात्मा होता है, लेकिन वह उसी परमात्मा को गाली देने लगता है। कहता है - "तू है ही नहीं, अगर है तो मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?" उसका विश्वास एक झटके में टूट जाता है।
यही वह जगह है जहां परमात्मा का चुना हुआ सबसे अलग खड़ा होता है।
उसके जीवन में भी तूफान आते हैं, बल्कि दूसरों से बड़े तूफान आते हैं। लेकिन वह तूफान में भी परमात्मा का आँचल नहीं छोड़ता। उसके पास एक अलौकिक धैर्य होता है। वह रोएगा, टूटेगा, लेकिन परमात्मा को नहीं भूलेगा।
आधी रात को जब सारी दुनिया सो रही होती है, जब कोई सुनने वाला नहीं होता, तब वह अकेले में परमात्मा से बातें कर रहा होता है। यही धैर्य, यही संयम उसे संसार से अलग करता है और परमात्मा के सबसे करीब ले जाता है। परमात्मा को भी ऐसे ही धैर्यवान लोगों से प्रेम है।
3. सत्य के लिए प्राण देने की तैयारी
परमात्मा के चुने हुए का जीवन सत्य की प्रयोगशाला होता है। वह न तो कभी किसी गलत काम में जाएगा, और न ही कभी जानबूझकर किसी का दिल दुखाएगा। उसका जीवन सत्य और ईमानदारी का जीता-जागता प्रमाण होता है।
लेकिन परमात्मा उसकी परीक्षा लिए बिना नहीं छोड़ता। उसके जीवन में ऐसे मौके बार-बार आएंगे जहां वह झूठ बोलकर, बेईमानी करके बहुत सारा धन, बहुत बड़ी कुर्सी, बहुत बड़ा सुख पा सकता है। दुनिया कहेगी - "ले ले, सब ले रहे हैं, एक तू ही साधु क्यों बन रहा है?"
यही उसकी असली परीक्षा होती है। क्या वह परमात्मा को भूलकर इन झूठे सुखों के पीछे भागेगा?
और यहीं वह जीत जाता है। वह ऐसी बेईमानी की थाली को लात मार देता है, जिसे पाने के लिए लोग अपना ईमान बेच देते हैं। उसकी अंतरात्मा उसे छल-कपट वाले रिश्तों में, झूठे लोगों के साथ एक पल भी नहीं रहने देती। घुटन होने लगती है उसे।
वह सत्य के साथ कभी समझौता नहीं करता, चाहे उसकी कीमत उसकी जान ही क्यों न हो। क्योंकि वह जानता है कि सत्य ही परमात्मा है। और सत्य के प्रति उसकी यही प्यास, यही प्रेम, एक दिन स्वयं सत्य को यानी परमात्मा को उसके पास खींच लाता है। दुनिया में वह हारता हुआ दिख सकता है, लेकिन अंत में जीत हमेशा सत्य की ही होती है, यानी परमात्मा के चुने हुए की ही होती है।
4. अहंकार का पूर्ण अभाव
अहंकार ही मनुष्य और परमात्मा के बीच की सबसे बड़ी दीवार है। और परमात्मा के चुने हुए में यह दीवार पहले ही गिरी हुई होती है।
वह कभी खुद को दूसरों से बेहतर नहीं मानता। उसके अंदर यह भाव ही नहीं आता कि "मैं कुछ हूँ"। वह न किसी को नीचा दिखाता है, न किसी को नीचा दिखाने की कोशिश करता है। क्योंकि उसके लिए करने वाला, करवाने वाला, सब कुछ केवल परमात्मा है। वह तो बस एक माध्यम है।
इसीलिए आप उसे कभी देखेंगे नहीं कि वह गरीब को देखकर मुंह बना रहा है, या अमीर को देखकर उसकी चापलूसी कर रहा है। उसके लिए एक भिखारी और एक राजा दोनों में वही एक परमात्मा बैठा है। उसमें भेदभाव का भाव रत्ती भर भी नहीं होता।
वह जात, धर्म, पैसा, पद - इन सब छोटी बातों से बहुत ऊपर उठ चुका होता है। अहंकार का न होना ही उसे परमात्मा का चुना हुआ बनाता है। जब "मैं" मिट जाता है, तभी "वह" आता है। वह अपने जीवन के सारे फैसले अहंकार से नहीं, परमात्मा के इशारे से लेता है। इसीलिए वह कभी दुखी नहीं रहता, क्योंकि दुखी तो अहंकार होता है, आत्मा नहीं।
5. परमात्मा को समर्पित एक-एक सांस
आम आदमी का जीवन बंटा हुआ है। वह कुछ फैसले माँ-बाप के लिए लेता है, कुछ समाज के लिए, कुछ जाति के लिए, कुछ धर्म के लिए। वह सबको खुश करने में ही पूरा जीवन निकाल देता है।
लेकिन परमात्मा के चुने हुए का जीवन बंटा हुआ नहीं, समर्पित होता है।
वह जो कुछ भी करता है - खाना, पीना, सोना, रोना, हंसना - सब परमात्मा को समर्पित कर देता है। वह अपने और परमात्मा के बीच किसी तीसरे को आने ही नहीं देता। न समाज को, न रिश्तेदारों को, न दुनिया के डर को। वह जानता है कि इस मार्ग पर चलने के लिए उसे केवल एक की जरूरत है, और वह है परमात्मा।
उसका विश्वास इतना अटूट होता है कि अक्सर उसे दुनिया से प्रेम मिलता ही नहीं। उसके अपने ही उसे दुत्कार देते हैं, पागल कहते हैं, नीचा दिखाते हैं। उसे कोई नहीं चाहता, कोई नहीं अपनाता। लेकिन उसे इस बात का कोई दुख नहीं होता, क्योंकि वह एक गहरे रहस्य को जान चुका होता है - उसे प्यार करने वाला, उसे अपनाने वाला, उसे आगे बढ़ाने वाला केवल एक ही है, और वह है परमात्मा।
इसलिए वह हर हाल में, सुख में भी और दुख में भी, केवल परमात्मा का ही गुणगान करता है। उसका जीवन एक प्रार्थना बन जाता है।
![]() |
| परमात्मा के दर्शन |
अंत में एक ही बात कहूंगा। अगर तुम्हें लगता है कि तुम भी भीड़ से अलग हो, तुम्हें भी अकेले चलना अच्छा लगता है, तुम्हें भी सत्य के लिए लड़ना अच्छा लगता है, तो घबराओ मत। तुम टूटे हुए नहीं हो, तुम चुने हुए हो। परमात्मा तुम्हें बना रहा है। यह कठिन मार्ग ही तुम्हें उस तक ले जाएगा। परमात्मा ने तो तुम्हे आजमाया क्योंकि उसकी दिया हुआ जीवन तुम्हारे लिए एक श्राप न बन जाए ।तुम उससे दूर न हो जाऊ क्योंकि उससे दूरी ही नर्क है।वह तो तुम्हे परमसुख देना चाहते है।उसपे तुम्हें विश्वास आज नहीं तो कल करना ही होगा ।क्योंकि दुनिया की जिंदगी तो केवल माया है।जिसमें अनन्त जीव फंसे हुए है।उसकी तुम्हारे ऊपर अनंत कृपा हुई तभी तुम उसके भरोसे जीवन जी रहे हो।उसको आभार प्रकट करो ।वह तुम्हारे लिए सब कुछ बन जाएगा ।तुम्हे खालीपन और अकेलापन कभी नहीं खलेगा




टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें