कलियुग में परमात्मा इतना दूर क्यों?


कलियुग की व्यवस्था और परमात्मा से दूरी





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कलियुग की व्यवस्था और परमात्मा से दूरी - मेरा अपना अनुभव


मैंने बहुत सालों तक सोचा कि मैं परमात्मा से दूर क्यों हूँ? मैं मंदिर भी जाता था, पूजा भी करता था, फिर भी भीतर एक खालीपन रहता था। फिर धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि कमी मुझमें नहीं, इस पूरे युग की व्यवस्था में ही है।


कलियुग की सारी व्यवस्था ही ऐसी बनाई गई है कि मनुष्य परमात्मा से दूर होता चला जाए। ये कोई संयोग नहीं है, ये इस युग का स्वभाव है। इसका जाल इतना महीन है, इतना सुंदर है कि पता ही नहीं चलता कि कब हम संसार की तरफ खिंच गए और परमात्मा से मुंह मोड़ लिया।


कलियुग में माया और अहंकार - जो मैंने देखा


मैं लोगों से मिलता हूँ, बात करता हूँ। मैंने देखा है कि कलियुग में हर व्यक्ति के दिल में छल, कपट, दंभ, लालच और अहंकार भरा पड़ा है। हर आदमी ने एक मुखौटा पहन रखा है। बाहर से मुस्कुराता है, भीतर से जलता है।


मैंने देखा है - लोग प्रेम की बात करते हैं, पर प्रेम में भी उनका स्वार्थ छिपा होता है। लोग भक्ति की बात करते हैं, पर भक्ति में भी सौदा करते हैं। मंदिर में जाकर कहते हैं - हे भगवान, मेरा काम कर दे तो मैं 51 रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा। अरे, परमात्मा से भी धंधा?


इसी छल और कपट के कारण परमात्मा बहुत दूर दिखाई देता है। जैसे घने कोहरे में पहाड़ का शिखर। आँखें तो हैं, पर वासना और अहंकार की धूल से भरी हैं, तो दिखेगा कैसे?


मैंने जब सच में परमात्मा के मार्ग पर चलना शुरू किया, तो मेरे अपने लोग ही मुझे पागल कहने लगे। हँसते थे मुझ पर। कहते थे - अरे ये सब किताबी बातें हैं, दुनिया ऐसी ही चलती है, प्रैक्टिकल बनो।


तब मुझे समझ आया - उन्होंने कभी परमात्मा को महसूस ही नहीं किया। उन्होंने उस शांति को जानी ही नहीं। इसलिए भीतर से सब खाली हैं। बाहर से हँसते हैं, फोटो में स्माइल करते हैं, पर रात को नींद नहीं आती। दिन भर दौड़ते हैं, रात भर बेचैन रहते हैं। यही कलियुग है।


कलियुग की माया - भोग ही सब कुछ
कलियुग ने एक झूठ को सच बना दिया है - भोग ही सुख है।


मैं भी इसी झूठ में फंसा था। मुझे लगता था - नया फोन आ जाए तो खुश हो जाऊंगा, नई बाइक आ जाए तो खुश हो जाऊंगा। आया भी, पर खुशी दो दिन भी नहीं टिकी।


कलियुग की माया यही है। एक इच्छा पूरी होते ही दस नई खड़ी हो जाती हैं। नया घर, नई गाड़ी, नए कपड़े। पर भोग की प्यास ऐसी है जो कभी बुझती ही नहीं। बल्कि और बढ़ती है।


मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिनके पास सब कुछ है, पर फिर भी संतुष्ट नहीं। जीते जी ही वो नर्क में जी रहे हैं - जलन में, ईर्ष्या में, तुलना में। मेरे पास ये क्यों नहीं, उसके पास वो क्यों है? यही तो नर्क है।


मैंने खुद अनुभव किया है कि जब मैं भोगों के पीछे भागा, तो मेरे मन में अशांति और बढ़ी। टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया - ये सब कलियुग के नए हथियार हैं। हर 5 मिनट में एक नया विज्ञापन कहता है - ये खरीद लो तो खुश हो जाओगे। पर खरीदने के बाद पता चलता है कि खुशी तो कहीं और ही है।


दुख - परमात्मा का बुलावा, मेरा अनुभव


मैंने अपने जीवन में एक बात पक्की देखी है। जब तक जीवन में सब ठीक चलता है, हम परमात्मा को याद भी नहीं करते।


जब मेरी जेब में पैसा था, सब दोस्त साथ थे, तब मैंने कभी भगवान को दिल से याद नहीं किया। पर जब जीवन में गहरा दुख आया, जब सारे सहारे टूट गए, जब पैसा भी काम नहीं आया, रिश्ते भी काम नहीं आए, तब पहली बार मेरा सिर झुका।


और तभी मैं परमात्मा के करीब गया।


सच कहूँ तो दुख ही वो द्वार है जो परमात्मा की ओर खुलता है। बिना दुख के तो हम माया के नशे में ही रहते हैं। सुख में हम अहंकारी हो जाते हैं, लगता है सब मैंने किया है। पर दुख में अहंकार टूटता है। पता चलता है कि हम कितने असहाय हैं।


और उसी असहाय क्षण में अगर तुम परमात्मा को पुकार लो, तो जीवन बदल जाता है। इसलिए मेरे गुरु कहते थे - दुख परमात्मा का प्रसाद है। पहले मुझे ये बात अजीब लगती थी, अब अनुभव से कहता हूँ - बिल्कुल सच है। जब मेरा व्यापार डूबा, जब मेरा सबसे प्यारा दोस्त छोड़ गया, तब मुझे पहली बार लगा कि कोई है जो कभी नहीं छोड़ता। वही परमात्मा है।


धन, पद और अहंकार का धोखा


कलियुग में जिसके पास धन है, बड़ा पद है, समाज में नाम है, वो सोचता है कि उसने सब कुछ पा लिया। मैं भी यही सोचता था।


पर सत्य उल्टा है। जितना तुम बाहर से भरते जाते हो, उतना भीतर से खाली होते जाते हो। मैंने बड़े-बड़े महलों में रहने वाले लोगों को देखा है, रात को नींद की गोली लेकर सोते हैं। एसी कमरा है, पर मन में आग लगी है। यही कलियुग का प्रमाण है।


जिसने अपना पूरा जीवन सिर्फ धन जमा करने में निकाल दिया, उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। सुबह से शाम तक बस पैसा, पैसा। और तो और, मंदिर में भी जाकर बस यही मांगते हैं - धंधा बढ़ा दे, तिजोरी भर दे। परमात्मा को भी नौकर बना दिया।


हम परमात्मा से प्रेम नहीं करते, हम परमात्मा से सौदा करते हैं। और सौदे में परमात्मा कभी नहीं मिलता। मैंने देखा है - लोग भगवान को रिश्वत देते हैं। अगर तुम मेरी ये इच्छा पूरी कर दोगे तो मैं सोने का छत्र चढ़ाऊंगा। अरे, परमात्मा को तुम्हारे सोने की जरूरत नहीं, उसे तुम्हारे सच्चे मन की जरूरत है।


कलियुग के रिश्ते और समाज का डर


कलियुग में रिश्ते भी स्वार्थ पर टिके हैं। मैंने ये बहुत करीब से देखा है। यहाँ प्रेम भी मतलब से होता है। हर रिश्ते के पीछे एक गणित है - मुझे क्या मिलेगा? निस्वार्थ प्रेम तो रेगिस्तान में पानी जैसा हो गया है।


और सबसे बड़ी बीमारी - समाज क्या कहेगा? इसी डर से हम सत्य को दबा देते हैं। माँ-बाप भी अपने बच्चे को स्वतंत्र नहीं होने देते। वे भी कहते हैं - बेटा वही कर जो समाज सही मानता है - नौकरी, शादी, पैसा। बच्चे के भीतर जो परमात्मा है, जो स्वतंत्र चेतना है, उसे ही मार देते हैं और उसे समाज की एक मशीन बना देते हैं।


मैंने इस डर को भी जिया है। समाज में इज्जत बनी रहे, इसलिए कई बार सच नहीं बोला। पर बाद में पछताया। क्योंकि इज्जत तो कभी बनती ही नहीं। आज जिस समाज के लिए तुम सच दबाते हो, कल वही समाज तुम्हारी पीठ पीछे हंसेगा।


मंदिरों में भी परमात्मा कहाँ?


एक दिन मैं मंदिर गया। सोचा परमात्मा मिलेगा। वहाँ भी दुकानदारी मिली। पंडित जी डरा रहे थे - ये पूजा नहीं करवाई तो ये हो जाएगा। हर चीज का रेट लगा था। वहाँ भी परमात्मा के नाम पर मेरे अहंकार को ही पूजा जा रहा था।


तब मुझे समझ आया - कलियुग तो परमात्मा की ही माया है। वो खुद ही इस रूप में हमें परख रहा है। वो देखना चाहता है कि इस घने अंधकार में भी कौन दिया जलाए रखता है।


कलियुग एक परीक्षा है। जैसे सोने को आग में तपाया जाता है, वैसे ही आत्मा को कलियुग में तपा कर देखा जाता है कि कौन खरा है।


तो फिर कलियुग है क्या? मेरी अंतिम समझ


मैंने जो समझा, वो ये है -


सत्युग में लोगों का ध्यान केवल परमात्मा पर था। संसार उन्हें सपने जैसा लगता था, धुंधला। और परमात्मा सत्य लगता था।


कलियुग में ठीक उल्टा हो गया है। यहाँ संसार सत्य लगता है, बिल्कुल ठोस। और परमात्मा धुंधला लगता है, जैसे कोई कल्पना हो।


बस इसी उल्टे देखने का नाम ही कलियुग है।


और जब ये उल्टा देखना सीधा हो जाता है, जब संसार धुंधला और परमात्मा सत्य लगने लगता है, तो समझो तुम्हारे भीतर सत्युग शुरू हो गया।


मैंने अपने भीतर ये क्रांति देखी है। जिस दिन से मैंने संसार को माया और परमात्मा को सत्य मानना शुरू किया, उसी दिन से मेरे भीतर का शोर शांत हो गया। बाहर अभी भी कलियुग है, पर मेरे भीतर अब सत्युग है।


युग बाहर नहीं, युग भीतर है। तुम बदल गए तो युग बदल गया।


*- अवधूत अंगिरस*


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