मन स्वयं का सबसे बड़ा शत्रु
जिसने मन को समझ लिया, उसने शांति को प्राप्त कर लिया
प्रस्तावना
जीवन में हम सब शांति की तलाश में हैं। कोई धन में शांति ढूंढता है, कोई बड़े घर में, कोई पद-प्रतिष्ठा में। लेकिन सब कुछ पा लेने के बाद भी मन अशांत ही रहता है। इसका कारण बहुत सीधा है - हम शांति को बाहर ढूंढ रहे हैं, जबकि शांति का निवास भीतर है, हमारे मन में।
जिसने अपने मन को समझ लिया, वह समझो जीवन के सबसे बड़े रहस्य को समझ गया। क्योंकि पूरी दुनिया हमारे मन का ही विस्तार है। जैसा हमारा मन होगा, वैसा ही हमें संसार दिखाई देगा।
मन ही बंधन है, मन ही मोक्ष है
हमारे शास्त्रों में एक बहुत गहरा सूत्र कहा गया है -
मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।
अर्थात मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
मन से बड़ा कोई मित्र नहीं और मन से बड़ा कोई शत्रु भी नहीं। बाहर का कोई
दुश्मन आपका उतना नुकसान नहीं कर सकता, जितना आपका अपना अनियंत्रित मन कर सकता है। अगर मन शुद्ध, स्थिर और शांत है, तो वही आपको ईश्वर तक, मुक्ति तक ले जाता है। और अगर वही मन अशुद्ध, चंचल और भटका हुआ है, तो वही आपको जीवन भर संसार के जाल में उलझाए रखता है।
मन का स्वभाव ही ऐसा है। जब तक हम उसे अनुशासित करना नहीं सीखते, तब तक हम उसके गुलाम बनकर जीते हैं। वह जैसा कहता है, हम वैसा ही करते हैं। वह कहता है - यह खाओ, वहां जाओ, यह पा लो, उससे बदला ले लो। और हम बिना सोचे-समझे उसकी इंद्रियों के पीछे दौड़ते रहते हैं। यह दौड़ कभी खत्म ही नहीं होती, और अंत में थकान और अशांति के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता।
आज का मनुष्य किससे दुखी है?
अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि आज का व्यक्ति अपनी असली समस्या से कम, अपने मन से ज्यादा दुखी है।
परिस्थिति छोटी होती है, पर मन उसे बड़ा बना देता है। उसके पास जो है, उससे वह संतुष्ट नहीं है। एक इच्छा पूरी होती है तो मन तुरंत दूसरी इच्छा खड़ी कर देता है। दूसरी पूरी हुई तो तीसरी। यह तृष्णा कभी खत्म ही नहीं होती। हमारे ऋषियों ने बिल्कुल ठीक कहा है - जैसे अग्नि में घी डालने से आग बुझती नहीं, और भड़कती है, वैसे ही भोगों को भोगने से मन की इच्छा शांत नहीं होती, बल्कि और बढ़ती है।
आज मनुष्य के दुख का सबसे बड़ा कारण तुलना है। वह यह नहीं देखता कि मेरे पास क्या है। उसका पूरा ध्यान इस बात पर लगा रहता है कि दूसरों के पास क्या है। मेरे पड़ोसी के पास बड़ी गाड़ी है, मेरे मित्र के पास बड़ा घर है, मेरे रिश्तेदार का बेटा मुझसे ज्यादा कमा रहा है। इसी तुलना में वह अपने जीवन की असली खुशियों को भूल जाता है। वह भूल जाता है कि उसके पास स्वस्थ शरीर है, प्रेम करने वाला परिवार है, सिर पर छत है, खाने को भोजन है। इन सबके लिए वह कभी ईश्वर को धन्यवाद नहीं देता। और जहाँ धन्यवाद नहीं है, वहाँ शांति कैसे होगी?
मन की तीन सबसे बड़ी चालें
मन हमें तीन तरीकों से फंसाता है।
1. छोटी बात को बड़ा बना देना: मन का स्वभाव है कि वह चींटी को हाथी बना देता है। किसी ने अनजाने में कुछ कह दिया, बस मन ने उसे पकड़ लिया। अब वही बात दिन भर मन में घूमेगी, रात की नींद उड़ा देगी, अगले दिन का व्यवहार बिगाड़ देगी। हकीकत में वह बात दो मिनट की थी, पर मन ने उसे 24 घंटे का दुख बना दिया। इसलिए कहा गया है कि मन को नकारात्मकता में रस आता है। अच्छी बातें उसे जल्दी याद नहीं रहतीं, पर बुरी बात वह तुरंत पकड़ लेता है।
2. हीनभावना पैदा करना: यह मन ही है जो हमें हीनभावना का शिकार बनाता है। वह बार-बार कहता है - तुम सुंदर नहीं हो, तुम बुद्धिमान नहीं हो, तुम दूसरों से कम हो, तुम्हारे पास पैसा नहीं है। और हम उसकी बात मानकर सच में खुद को कम समझने लगते हैं। जबकि सत्य यह है कि ईश्वर ने हर व्यक्ति को किसी न किसी विशेष गुण के साथ भेजा है। मन वह विशेषता देखने ही नहीं देता, वह सिर्फ कमी दिखाता है।
3. भ्रम में रखना: इस मन ने ही इस असत्य संसार को सत्य मान लिया है। इसे इसी में रस आता है। अगर आप कभी भगवान का नाम लेना चाहो, ध्यान करना चाहो, तो यही मन हजार सवाल खड़े कर देगा। यह कौन सा भगवान? क्या सच में ईश्वर है? यह सब ढोंग है। यह आपके विश्वास को तोड़ने की पूरी कोशिश करेगा। क्योंकि मन जानता है, जिस दिन आप विचारों से मुक्त हो गए, उस दिन आप परमात्मा स्वरूप हो जाओगे और मन की सत्ता खत्म हो जाएगी।
फिर मन से मुक्ति कैसे मिले?
अर्जुन ने भी यही प्रश्न भगवान श्रीकृष्ण से किया था। गीता में अर्जुन कहते हैं -
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
![]() |
| चंचल मन |
हे कृष्ण! यह मन बड़ा ही चंचल, मथ डालने वाला, बलवान और दृढ़ है। इसे वश में करना मुझे हवा को वश में करने जैसा कठिन लगता है।
अर्जुन की बात बिल्कुल सच्ची है। मन को रोकना आसान नहीं है। पर श्रीकृष्ण ने इसका समाधान भी दिया। उन्होंने कहा - हे अर्जुन, निःसंदेह मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है, पर अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।
तो मन को मारना नहीं है, मन को समझना और साधना है। जैसे एक जंगली घोड़े को मारते नहीं, उसे प्यार से, धीरे-धीरे प्रशिक्षित करके सधाया जाता है, वैसे ही मन को भी साधा जाता है। इसके लिए तीन साधन सबसे जरूरी हैं -
1. अनुशासन - Discipline: मन को खुला छोड़ दिया तो वह भटकेगा ही। उसे एक नियम, एक दिनचर्या चाहिए। सुबह उठने का समय निश्चित हो, खाने का समय निश्चित हो, सोने का समय निश्चित हो। जब शरीर अनुशासन में आता है, तो मन भी धीरे-धीरे अनुशासन में आने लगता है। दिन में 10 मिनट भी अगर आप बिना मोबाइल के, शांत बैठने का अभ्यास करें, तो यह मन के लिए बहुत बड़ी ट्रेनिंग है।
2. साक्षी भाव - Witness Mode: मन से लड़ो मत, उसे देखो। जब कोई नकारात्मक विचार आए, तो उससे यह मत कहो कि मत आओ। बस उसे देखो, जैसे आप सड़क पर खड़ी गाड़ियों को देख रहे हैं। गाड़ियां आ रही हैं, जा रही हैं, आप सिर्फ देख रहे हैं। विचार आएगा और चला जाएगा। आप उसके साथ बहोगे नहीं। धीरे-धीरे आप समझ जाओगे कि आप मन नहीं हो, आप मन को देखने वाले हो। यही सबसे बड़ी मुक्ति है।
3. संतोष - Contentment: मन की दौड़ का अंत संतोष से ही होता है। जो है, उसमें खुश होना सीखना पड़ेगा। रोज रात को सोने से पहले 5 चीजें लिखिए जिनके लिए आप ईश्वर के आभारी हैं। यह छोटा सा अभ्यास आपके मन की दिशा को तुलना से हटाकर कृतज्ञता की ओर ले आएगा। और जहाँ कृतज्ञता है, वहीं शांति है।
अंतिम बात
मन ने हमें जो सुख दिए हैं, वे भी क्षणिक हैं। जिस चीज में आज मजा आ रहा है, कल वही चीज उबाऊ लगने लगती है। फिर मन कुछ नया ढूंढता है। यह चक्र चलता ही रहता है। इसलिए मन को मारना नहीं, बल्कि उसकी इस आदत को समझना आवश्यक है।
याद रखिए, जब तक मन शुद्ध नहीं होगा, तब तक आप अवसाद, चिंता और बेचैनी से मुक्त नहीं हो सकते। शुद्धि का अर्थ है - विचारों का कम होना, सकारात्मकता का बढ़ना और साक्षी भाव का आना।
जिस दिन आपने अपने मन को पकड़ना सीख लिया, उसे देखना सीख लिया, उसे समझा लिया, उसी दिन आपने दुनिया को जीत लिया। क्योंकि संसार बाहर नहीं है, संसार आपके मन में है। मन शांत हुआ तो सारा संसार शांत हो गया।
इस मन ने ही संसार को सत्य का मान लिया है और उसमें ही उसका रस है ।अगर कोई भगवान का नाम लेना चाहे तो मन उसको कही ऐसे सवाल देता है जो भगवान के नाम के ऊपर उसके विश्वास को तोड़ते है।मन के विचारों को अगर किसी प्रकार रोक दिया जाए तब व्यक्ति स्वयं परमात्मा स्वरूप ही हो जाएगा।मन ने जो हमें सुख दिया वो भी आगे दुख में परिवर्तित हो जाते या हमें उबाऊ लगने लगते है।जिस काम में मन को मजा था अब मन को उसमें कोई रुचि नहीं अब उसे कुछ और चाहिए ।ये मन का चक्कर ही चलता रहता है।इस मन को मार डालना ही आवश्यक है।
इसका उपाय हम आगे के ब्लॉग में जानेंगे




टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें