समाज झूठ की भीड़ ।अवधूत सत्य का नाम
मनुष्य जीवन की क्षणभंगुरता और माया का अंतिम सत्य
मनुष्य जीवन में बहुत थोड़ा ही समय है। यह एक ऐसा सत्य है जिसे हम सब जानते हैं, पर मानते नहीं। 100 साल की कही जाने वाली आयु में भी 10-15% लोग ही इस सीमा तक पहुँच पाते हैं। अधिकांश लोग तो इससे पहले ही काल के गाल में समा जाते हैं। फिर भी आश्चर्य देखिए, इतने छोटे से जीवन में भी मनुष्य माया में ऐसा उलझा रहता है कि मृत्यु के अंतिम क्षण तक भी उसे परमात्मा याद नहीं आता। यह संसार स्वार्थ में टिका हुआ है।यह सब को सब अपने प्रयोजन से ही प्रिय होता है।
शरीर शिथिल हो जाता है, सांसें उखड़ने लगती हैं, अपने पराये हो जाते हैं, पर मन फिर भी संसार की ओर ही भागता है। यह कौन सी डोर है जो मृत्यु की चौखट पर भी संसार से बंधी रहती है? इसी डोर का नाम है - माया।
संसार के साधनों के पीछे भागता मन
मनुष्य के जीवन में परमात्मा का उतना महत्व कभी नहीं बन पाता, जितना संसार के साधनों का है। सुबह से शाम तक की जो भागदौड़ है, वह एक मकान, एक गाड़ी, एक पद, बच्चों की नौकरी के लिए है। वही तीव्रता, वही प्यास परमात्मा के लिए कभी नहीं दिखती।
वह प्रार्थना जरूर करता है, मंदिर भी जाता है, अगरबत्ती भी जलाता है। लेकिन उसकी प्रार्थना में भी संसार ही होता है। वह परमात्मा से परमात्मा को नहीं मांगता, वह परमात्मा से संसार के सुखों को ही मांगता है। हे प्रभु, मेरा बेटा पास हो जाये, मेरा व्यापार बढ़ जाये, मेरी बीमारी ठीक हो जाये। परमात्मा उसके लिए सुख पाने का एक साधन मात्र बन कर रह गया है, लक्ष्य नहीं।
क्यों? क्योंकि उसे संसार में ही सुख दिखता है। उसे लगता है सुख धन में है, मान-सम्मान में है, परिवार के नाम में है।
जीवन गुजारा जा सकता है। परिवार के लिए समाज के लिए अपने झूठे अहंकार के लिए वास्तव में परमात्मा के सहारे गुजारा जीवन ही परमात्मा को दी गई एक अमूल्य उपहार जो केवल मनुष्य ही दे सकता है
समाज की भीड़ और परमात्मा का एकांत
मनुष्य स्वयं को कहीं न कहीं समाज के अनुसार ढालना चाहता है। समाज की भीड़ में उसका कुछ मान-सम्मान हो, उसके परिवार का नाम हो, लोग उसे सफल कहें। और समाज का नियम बड़ा सीधा है - जहां धन है, समाज उसी तरफ जाता है। निर्धन के सत्य को कोई नहीं सुनता, धनवान के झूठ की भी जय-जयकार होती है।
इसीलिए सामाजिक जीवन में परमात्मा केवल मंदिर, कर्मकांडों और तीर्थ यात्राओं तक ही सीमित रह गया है। एक औपचारिकता, एक दिखावा। वास्तव में परमात्मा को भुला देना ही आज के समाज का चाल-चलन बन गया है। परमात्मा पाखण्ड जानता है । निश्चित ही वहा सर्वत्र मौजूद है।
भीड़ को मंदिर जाना है, फोटो खिंचवानी है, प्रसाद का दिखावा करना है। लेकिन परमात्मा के मार्ग पर चलने के लिए भीड़ नहीं चाहिए। उसके लिए तो अकेले चलने का साहस चाहिए। भीड़ तो हमेशा संसार की ओर ले जाती है। सत्य का मार्ग तो सदैव एकांत का मार्ग है।जिसने भी परमात्मा को जाना पाया कि वहा मंदिर में नहीं मिलता
समाज को सत्य से क्या लेना-देना?
समाज को सत्य से कुछ फर्क नहीं पड़ता। और सत्य को समाज से कोई रुचि नहीं है। क्योंकि समाज झूठ का जमघट है। जहां केवल परमात्मा को भुलाने का ही काम होता है। वहां हर बात में तुलना है, ईर्ष्या है, दिखावा है, और अहंकार है।
जिसे समाज की इस भीड़ से मुक्ति नहीं चाहिए, वह परमात्मा का विचार कर ही नहीं सकता। परमात्मा का विचार वहीं शुरू होता है जहां समाज की दौड़ खत्म होती है। जब तक मन कह रहा है "लोग क्या कहेंगे", तब तक परमात्मा दूर है। जिस दिन मन ने कह दिया "लोग चाहे जो कहें, मुझे सत्य चाहिए", उसी दिन से खोज शुरू होती है।
इसीलिए तो अवधूत समाज से अलग दिखता है। वह पागल लगता है, क्योंकि वह समाज के बनाए नियमों को नहीं मानता।
माया इतनी जटिल क्यों है?
समाज के लोगों को तो परमात्मा की माया ही दिखेगी, परमात्मा नहीं दिखेगा। वास्तव में परमात्मा की माया इतनी जटिल है कि स्वयं चाहे कोई कितना ही सामर्थ्यवान हो, कितना ही बुद्धिमान हो, वह अपने बल से इस माया से नहीं छूट पाता।
बड़े-बड़े ज्ञानी, बड़े-बड़े योद्धा इसी माया में उलझ कर रह गए। यह माया किसी को धन के रूप में पकड़ती है, किसी को पुत्र-मोह के रूप में, किसी को मान-सम्मान के रूप में। इसका रूप हर व्यक्ति के लिए अलग है, पर इसकी जंजीर सबके लिए एक जैसी मजबूत है।
इसे छुड़ाने में केवल परमात्मा ही समर्थ है। मनुष्य के अपने प्रयास से यह पर्दा नहीं हटता।
कौन चल सकता है परमात्मा के मार्ग पर?
मानुष जीवन में कभी भी परमात्मा का उतना महत्व नहीं है ।जितना संसार के साधनों का व्यक्ति के जीवन में कभी साधनों के लिए जो भागदौड़ है ।वो परमात्मा के लिए नहीं हो पाती।वह परमात्मा से प्रार्थना जरूर करता है।लेकिन उस व्यक्ति को संसार में ही सुख लगता है ।जिसके कारण वह परमात्मा से संसार के सुखों को ही मांगता है।वह स्वयं को कही न कही समाज के अनुसार ढालना चाहता है।समाज की भीड़ में उसका कुछ मान सम्मान हो उसके परिवार का नाम हो।जिसमें धन है समाज उसी तरफ ही जाता है।सामाजिक जीवन में परमात्मा केवल मन्दिर ,कर्मकाण्डों और तीर्थ यात्राओं में ही नज़र आता है।वास्तव में परमात्मा को भुला देना ही आज के समाज का चाल चलन है ।उन्हें भीड़ में मंदिर जाना है लेकिन परमात्मा के मार्ग में चलने के लिए भीड़ नहीं अकेले चलने का साहस होना चाहिए
समाज को सत्य से कुछ फर्क नही पड़ता।उन्हें निकालने में परमात्मा कोई रुचि नहीं है।क्योंकि समाज झूठ का जमघट है।जहां केवल परमात्मा को भुलाने का ही काम होता है।जिसे समाज नहीं चाहिए जिसे समाज में रहन - सहन से मुक्ति चाहिए वही व्यक्ति परमात्मा का विचार कर सकता है।
समाज के तो परमात्मा की माया ही दिखेगी ।वास्तव में परमात्मा की माया इतनी जटिल है कि स्वयं चाहे वो कितना ही सामर्थ्य रखता हो इस माया से नहीं छूट पाता ।इसे छुड़ाने में परमात्मा ही समर्थ है।जिसने परमात्मा को प्राप्त करने पर ज्यादा ध्यान दिया और उसके मन में संसार के सुखों को लेकर वैराग्य जन्म ले चुका हो।वही परमब्रह्म परमात्मा के मार्ग में चलने का साहस रख सकता है।समाज के बंधन केवल सांसारिक के लिए है अवधूत के लिए नहीं
जिसने परमात्मा को प्राप्त करने पर ही अपना पूरा ध्यान लगा दिया हो। जिसके मन में संसार के सुखों को लेकर वैराग्य जन्म ले चुका हो। जो समझ गया हो कि संसार के सुख, सुख नहीं, केवल दुख का ही दूसरा रूप हैं। वही परमब्रह्म परमात्मा के मार्ग में चलने का साहस रख सकता है।
वैराग्य का अर्थ संसार को छोड़कर जंगल चले जाना नहीं है। वैराग्य का अर्थ है संसार में रहते हुए भी यह जान लेना कि यह सब नश्वर है। कमल के पत्ते की तरह - पानी में रहकर भी पानी से अलग।
समाज के बंधन केवल सांसारिक लोगों के लिए हैं। अवधूत के लिए कोई बंधन नहीं। वह समाज में रहता भी है तो समाज से मुक्त रहता है। क्योंकि वह जान गया है कि यह जीवन बहुत थोड़ा है, और इस थोड़े से जीवन को माया में गंवाना सबसे बड़ी मूर्खता है।
इसलिए हे मनुष्य, अभी भी समय है। जब तक श्वास है, तब तक परमात्मा को याद कर ले।
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