परमात्मा के सबसे प्रिय होते हैं इन 5 स्वभाव के व्यक्ति
परमात्मा के सबसे प्रिय व्यक्तियों के स्वभाव
पिता परमात्मा को अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। कोई उसे ईश्वर कहता है, कोई खुदा, कोई गॉड। वह अदृश्य है, लेकिन वही सम्पूर्ण जगत का आधार और संचालक है।
![]() |
| अंतर्मुखी व्यक्ति |
सवाल यह है कि उस परमात्मा की प्राप्ति किसे होती है? वह कैसे और किन उपायों से शीघ्र प्राप्त होता है? शास्त्र कहते हैं, परमात्मा न तो दूर है, न किसी ब्रह्मांड के कोने में छिपा है। वह तो हमारे भीतर, हमारी आत्मा में निवास करता है।
परमात्मा की लालसा रखने वाले व्यक्ति में कौन से गुण होने चाहिए, जो परमात्मा को ही उसके पीछे लगा दें? शास्त्रों के अनुसार ऐसे 5 आवश्यक और अटल स्वभाव वाले हैं, जिनका सच्चे मन से अगर वो परमात्मा को चाहे तो इस स्वभाव का कोई भी व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त कर इस संसार के जन्म-मरण के दुखों से हमेशा के लिए मुक्त हो सकता है।
आइए जानते हैं, वे 5 दिव्य गुप्त स्वभाव वाले कौन से हैं।
1.अंतर्मुखी स्वभाव का व्यक्ति
कलियुग में छल और कपट सबसे ज्यादा चलता है। ऐसे समय में जो व्यक्ति तेज-तर्रार है, बहुत ज्यादा बोलता है, हर जगह जल्दी से दोस्ती बना लेता है, उसी को समाज में अच्छा और होशियार माना जाता है।
सच तो यह है कि आज के समाज को सत्य से नहीं, बल्कि झूठ और दिखावे से ही प्रभावित किया जा सकता है।
लेकिन इस कलियुग में जो व्यक्ति अंतर्मुखी है, जो अपने आप में ही मग्न रहता है, उसे दूसरों से कोई लेना-देना नहीं होता। वह दूसरों की बातों में ज्यादा नहीं उलझता और केवल काम की बात होने पर ही बोलता है।
ऐसे व्यक्ति के मित्र भी दो-तीन ही होते हैं, या उसे मित्र बनाना पसंद ही नहीं आता। वह दूसरों की चुगली नहीं करता और न ही अपना काम निकालने के लिए किसी का इस्तेमाल करना जानता है। इसी वजह से समाज की नजरों में वह सीधा या घमंडी कहलाता है।
परन्तु यदि ऐसे अंतर्मुखी व्यक्ति के मन में परमात्मा की चाह जाग जाए, तो वह परमात्मा के मार्ग पर चलने और उसे प्राप्त करने में सबसे अधिक समर्थ होता है, क्योंकि संसार से अलग होना ही परमात्मा के करीब होना है।
2.साफ दिल का नेक व्यक्ति
आज के इस दौर में जहाँ हर कोई एक-दूसरे को अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करना जानता है, वहाँ अगर कोई व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करता है, तो वह सच में बहुत खास होता है।
ऐसा साफ दिल का नेक व्यक्ति कभी यह नहीं सोचता कि बदले में उसे क्या मिलेगा। वह तो बस इतना ध्यान रखता है कि उसकी वजह से किसी को दुख न पहुँचे, किसी का दिल न दुखे।
कहा जाता है कि परमात्मा उसी को सब कुछ देता है जो दूसरों के साथ बाँटना जानता है। जो हर जगह खुद से पहले दूसरों को आगे रखता है। जिसके मन में किसी के लिए भी नफरत, ईर्ष्या या द्वेष नहीं होता।
ऐसे ही पवित्र मन वाले व्यक्ति को परमात्मा के रास्ते पर चलने की हिम्मत खुद परमात्मा देता है। क्योंकि परमात्मा जानता है कि इस कलियुग में जहाँ पाखंड और दिखावे की भीड़ लगी है, वहाँ सिर्फ ऐसा ही सच्चा और नेक दिल इंसान उस तक पहुँचने का हुनर रखता है।
यही साफ दिल वाला व्यक्ति अपना जीवन परमात्मा को समर्पित कर पाता है, जबकि बाकी लोग तो सिर्फ अपने अहंकार को भरने में ही लगे रहते हैं और इसी वजह से वे परमात्मा को कभी पा नहीं पाते
![]() |
| साफ नेक दिल का व्यक्ति - जिसे परमात्मा खुद चुनता है |
3. मेहनत करने वाले व्यक्ति
जिसे केवल अपने हाथ-पैरों पर भरोसा होता है, वही वास्तव में स्वयं का निर्माण करना जानता है।
ऐसा व्यक्ति साधनों को लेकर शिकायत नहीं करता। उसे जैसा मिले, उसी में से रास्ता निकाल लेता है और उसी को आगे बढ़ाना जानता है। भले ही आज वह पीछे दिखे, पर वह अपनी मेहनत से ही धीरे-धीरे आगे बढ़ता जाता है। उसे पता है कि मेहनत का फल एक दिन अवश्य मिलेगा, इसलिए वह रुके बिना लगा रहता है।
वहाँ मेहनती व्यक्ति ही कुछ कर पाता है, जो अपने लक्ष्य के लिए पागलों की तरह अपने काम में डूबा रहता है। जब उसका लक्ष्य छोटा न रहकर स्वयं परमात्मा बन जाए, तब वह उसे पाने के लिए खुद को किस हद तक जला देगा, किस तरह तपेगा, यह तो केवल परमात्मा ही जानता है।
वास्तव में जिसे अपने भाग्य को लेकर कोई सवाल न हो, जो रोज़ अपनी मेहनत के दम पर ही सब कुछ पाने का हौसला रखता हो, वही सच्चा मेहनती है। वही व्यक्ति परमात्मा के मार्ग में भी पूरी जी-जान से, जीतोड़ पुरुषार्थ कर सकता है।
जिसने आज संसार के कामों में पूरी तन्मयता से मेहनत करना सीख लिया है, कल वही उसी तन्मयता और लगन से परमात्मा के कार्यों में भी लग सकता है।
4.जिसे कोई नहीं चाहता
बहुत से लोग किसी न किसी वजह से पसंद किए जाते हैं, उनमें कोई न कोई खूबी होती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनमें दुनिया को कुछ खास नजर नहीं आता।
ऐसे लोग अक्सर दिन भर खुद को ही कोसते रहते हैं कि मैं जीवन में कभी कुछ नहीं कर सकता। जो व्यक्ति हमेशा दूसरों से प्रताड़ित किया जाता है, जिसका हर जगह मजाक बनाया जाता है, जिसे हमेशा नीचे दिखाया जाता है, जिसमें सिर्फ कमियां ही देखी जाती हैं, जिसे लगता है कि वह किसी चीज के लायक ही नहीं है।
ऐसा व्यक्ति अगर परमात्मा की तरफ दौड़े, तो परमात्मा भी उसकी तरफ बड़ी तेजी से दौड़ता है। संसार से मिला यही बैर, यही तिरस्कार, उसे परमात्मा से प्रेम करना सिखा देता है।
इसलिए ऐसे लोगों को बिना देर किए परमात्मा की शरण में चले जाना चाहिए। वही उनका उद्धार करेगा। और जिस-जिस ने उनसे बैर रखा है, स्वयं परमात्मा ही उनसे बैर रखेगा, वही उनका हिसाब करेगा।
5.संसार में जिनका मन नहीं लगता
आज के दौर में जहाँ लोग हँसते-खेलते अपना जीवन जी रहे हैं, ऐसे समय में भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका मन संसार में लगता ही नहीं। उन्हें हमेशा एक अजीब सा खालीपन घेरे रहता है।
चाहे कितना भी घूम लो, खेल लो, मजे कर लो, वे इस सब से कोसों दूर रहते हैं। उन्हें जीवन में सुख-सुविधाएं भी मिल जाएं, तब भी उनके मन में एक उदासी बनी रहती है। चाहे वे अपने सारे लक्ष्य हासिल कर लें, जो मन में आए वो कर लें, लेकिन उनकी अंतरात्मा की जो प्यास है, वो कभी बुझती ही नहीं।
वे आम लोगों की तरह जीवन नहीं जी पाते, क्योंकि उन्हें दुनिया ने नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा ने चुना होता है। ये चुने हुए लोग ही वास्तव में परमात्मा के सबसे प्रिय होते हैं।
परमात्मा उन्हें ऐसा बना देता है, भले ही उनमें पहले कोई योग्यता न भी हो, कि वे उसकी कृपा को प्राप्त कर सकें। वह उनके मन को ऐसा कर देता है कि परमात्मा के अलावा और किसी चीज की इच्छा ही न जगे।
परमात्मा उन्हें जीवन के सबसे कठिन मार्गों से भी बड़ी आसानी से निकाल लाता है। वह उन्हें संसार का ऐसा सच्चा दर्शन करवाता है कि जो मन पहले ही संसार में नहीं लगता था, वह और भी सख्त हो जाता है। अंत में उन्हें केवल परमात्मा ही अपना लगता है, और वही उनका सब कुछ बन जाता है।
![]() |
| परमात्मा भीतर हीं बैठा है |
अंत में
संसार तो हमेशा से ऐसा ही रहा है और आगे भी ऐसा ही रहेगा। यहाँ ज्यादातर लोग एक जैसे ही हैं। उन्हें न तो परमात्मा से कुछ लेना है, न देना। वे बस परमात्मा की माया में आराम से, सुख-चैन से अपना जीवन जी रहे हैं। कभी-कभार उन्हें परमात्मा की याद आ भी जाए, तो वे अपने-अपने धर्म के अनुसार ही उस परमात्मा को देखते हैं। कोई मंदिर चला जाता है, कोई मस्जिद, कोई चर्च। अपने-अपने तरीके से परमात्मा को याद करने चले जाते हैं।
लेकिन सच तो यह है कि परमात्मा कहीं मंदिर, मस्जिद या चर्च में नहीं बैठा है। वह तो स्वयं व्यक्ति के अंदर ही बैठा हुआ है। पर व्यक्ति ही नादानी में उसे बाहर खोजता रहता है, बाहर भटकता रहता है।
परमात्मा का प्रिय होने के लिए सबसे पहली शर्त ही यही है कि संसार द्वारा नकार दिया जाना। दुनिया आपको भले ही नकार दे, लेकिन वही नकारा जाना आपको परमात्मा के करीब ले जाता है।
जितने भी परमात्मा के प्रिय लोगों के स्वभाव होते हैं - जैसे विनम्रता, करुणा, वैराग्य, सच्चाई - वो सब हमारे अंदर पहले से ही मौजूद हैं। बस हमें उनकी याद नहीं है, हमने उन्हें कभी जगाया ही नहीं।
हमें समस्या यह है कि हमें परमात्मा का प्रिय नहीं होना, हमें संसार का प्रिय होना है। हम चाहते हैं कि दुनिया हमें पसंद करे, लोग हमारी तारीफ करें। इसलिए हममें वो दिव्य स्वभाव कभी उत्पन्न ही नहीं होते।
जिस दिन हम परमात्मा को सच में गंभीरता से लेंगे, जिस दिन हम यह सोचेंगे कि वास्तव में यह दुनिया तो ऐसी ही रहने वाली है। हमारी तरह पहले भी हजारों आए, आगे भी आते रहेंगे और जाते रहेंगे। यह संसार कभी खत्म नहीं होगा, लेकिन हमारा समय खत्म हो जाएगा।
इसलिए हमें संसार के पीछे नहीं, परमात्मा के पीछे जाना है। हमें उस परमात्मा को ही प्रभावित करना है, उसी को रिझाना है।
और जिस दिन यह भाव हमारे अंदर सच्चे मन से आ गया, उसी दिन हम परमात्मा के प्रिय हो जाएंगे।
क्या आप भी चाहते हैं कि आप परमात्मा के प्रिय बनें?





टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें