*शुद्ध चैतन्य स्वरूप में स्थित आत्मज्ञानी का लक्षण*
शुद्ध चैतन्य स्वरूप परमात्मा में स्थित आत्मज्ञानी के लिए न तो परमात्मा के बारे में कोई प्रमाण है और न ही वह परमात्मा को बाहर कहीं देखता है। उसका मौन ही उसका उत्तर है और उसका जीवन ही परमात्मा के होने का प्रमाण है।
आम व्यक्ति परमात्मा को सिद्ध करने के लिए तर्क देता है, शास्त्रों के प्रमाण देता है, पर आत्मज्ञानी जानता है कि जो सबका साक्षी है, उसे किसी प्रमाण की क्या आवश्यकता? जैसे आँख को देखने के लिए किसी दूसरी आँख की जरूरत नहीं, जैसे दीपक को दिखाने के लिए किसी दूसरे दीपक की जरूरत नहीं, वह स्वयं प्रकाश है, वैसे ही परमात्मा स्वयं प्रकाश है। आत्मज्ञानी उसे बाहर नहीं खोजता, वह तो स्वयं उसी स्वरूप में स्थित हो जाता है। इसलिए वह चुप हो जाता है। उसका मौन ही सबसे बड़ा उत्तर है। लोग उससे पूछते हैं परमात्मा कहाँ है? तो वह बोलता नहीं, क्योंकि बोलना भी उस एक को दो कर देगा। उसका शांत, निर्विकार जीवन ही इस बात का परिणाम और प्रमाण है कि परमात्मा है।
यह संसार आम व्यक्ति के जैसे आत्मज्ञानी को प्रतीत नहीं होता। आम आदमी को संसार बहुत ठोस, बहुत सच्चा लगता है - यह मेरा घर है, यह मेरा परिवार है, यह मेरा दुश्मन है। पर आत्मज्ञानी को यह सब एक लंबे स्वप्न जैसा लगता है। जैसे जागने के बाद स्वप्न झूठा लगने लगता है, वैसे ही ज्ञान होने के बाद संसार झूठा लगने लगता है। इसलिए वह किसी से भी मोह नहीं रखता है और न ही द्वेष रखता है। जिसके लिए संसार ही असत्य है, वह वहाँ किसी से मोह या द्वेष क्यों करेगा? मोह और द्वेष तो तब होते हैं जब हम संसार को सत्य मानते हैं। उसके लिए तो संसार असत्य ही है।
*मैं अन्य हूँ और यह अन्य है, इस प्रकार की वासना उन्हीं अज्ञानी जीवों को होती है, जिन्होंने आत्मज्ञान को बहुत दूर फेंक दिया है, तत्त्वज्ञानियों को ऐसी वासना नहीं होती।*
यह वशिष्ठ जी का बहुत गहरा श्लोक है। जब तक हम सोचते हैं कि मैं अलग हूँ और यह संसार अलग है, मैं अलग हूँ और वह व्यक्ति अलग है, तब तक हम अज्ञानी हैं। यह भेद की वासना ही सारे झगड़ों की जड़ है। मेरे और तेरे की भावना से ही लड़ाई, ईर्ष्या, द्वेष पैदा होता है। जिसने आत्मज्ञान को दूर फेंक दिया है, वही इस भेद में जीता है। पर आत्मज्ञानी तो स्वयं को अनंत आत्मा, परमात्मा से एक ही जानता है। वह परमात्मा से भिन्न कुछ है, इस दृष्टि से देखता ही नहीं।
जैसे तिलों के अंतर्गत और तिलों से निकाला हुआ तेल भिन्न नहीं है, तेल तिल में ही छिपा था, वैसे ही आत्मा और नारायण भिन्न नहीं हैं। जैसे कपास और वस्त्र भिन्न नहीं हैं, वस्त्र कपास का ही रूप है, वैसे ही आत्मा और नारायण भिन्न नहीं हैं। और जैसे फूलों का सार सुगंध है, फूल नष्ट हो जाता है पर सुगंध रहती है, वैसे ही जीवों का परमार्थ सार परमात्मा ही है। शरीर नष्ट हो जाएगा, पर भीतर बैठा परमात्मा कभी नष्ट नहीं होगा। यही अद्वैत का सत्य है।
*अत्यन्त परिपूर्ण परमार्थ सत्य चिदात्मा जो इस दृश्य की भावना करता है, वह कुछ भी सत्य नहीं है। इसलिए उस दृश्य का दर्शन भी है ही नहीं। इसलिए यह स्वप्रकाश चिन्मात्र दर्शन ही सम्यक दर्शन है।*
इसका अर्थ बहुत सूक्ष्म है। जो यह सोचता है कि यह दुनिया सत्य है, यह दृश्य सत्य है, वह सत्य को नहीं देख रहा। क्योंकि जो परमार्थ सत्य है, जो शुद्ध चैतन्य आत्मा है, उसमें यह दृश्य है ही नहीं। जैसे रस्सी में साँप नहीं है, साँप केवल भ्रम है, वैसे ही आत्मा में यह संसार नहीं है, यह केवल मन की कल्पना है। इसलिए ज्ञानी के लिए दृश्य का दर्शन ही नहीं होता। वह दृश्य को देखकर भी नहीं देखता। वह केवल उस चिन्मात्र, उस शुद्ध प्रकाश को देखता है जो सबको प्रकाशित कर रहा है। वही सम्यक दर्शन है, वही सच्चा देखना है।
*यह सम्पूर्ण जगत आत्मा ही है, इसलिए कौन किस वस्तु की कहाँ पर भावना करे? भावना भी है ही नहीं, इसलिए स्वप्रकाश चिन्मात्र का ही दर्शन सम्यक दर्शन है।*
जब सब कुछ आत्मा ही है, तो मैं किसका चिंतन करूँ? किसको पाने की इच्छा करूँ? जब सोना ही सोना है, तो गहने में क्या अलग देखना? इसलिए आत्मज्ञानी में कोई भावना नहीं बचती, कोई कामना नहीं बचती। वह भावना से शून्य हो जाता है। वह केवल अपने स्वप्रकाश स्वरूप में स्थित रहता है।
*वासना और चित्त नाम के दो शब्द जहाँ परमार्थ सत्य के दर्शन से विलीन हो गये, वह परम पद है।*
वासना और चित्त, ये दो ही तो बंधन हैं। चित्त में वासना उठती है कि मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए। जब परमार्थ सत्य का दर्शन हो जाता है, तो ये दोनों शब्द ही विलीन हो जाते हैं। न चित्त बचता है, न वासना बचती है। जो अवस्था बचती है, वही परम पद है, वही मोक्ष है।
वासना से युक्त चित्त यहाँ पर चित्तरूप से स्थिति को प्राप्त हुआ है। यही चित्त जब वासना से मुक्त हो जाता है, तो वही जीवन्मुक्त आत्मज्ञानी कहा जाता है। जब तक चित्त में वासना है, तब तक वह बद्ध है, संसारी है। और जब वही चित्त वासना से मुक्त हो जाता है, तो वही मुक्त हो जाता है। चित्त कहीं जाना नहीं है, केवल उसकी वासना मिटानी है।
वह कर्म करता हुआ भी कभी उनके फल को नहीं भोगता, वह सदा असंग ही है। जैसे कमल का पत्ता पानी में रहता है पर पानी उसे गीला नहीं कर पाता, वैसे ही आत्मज्ञानी संसार में सारे कर्म करता है - खाना, पीना, चलना, बोलना - पर वह उन कर्मों में लिप्त नहीं होता। उसमें इच्छाएं आती भी हैं, लेकिन परमार्थ स्वरूप में स्थित होने से वह उनमें आसक्त नहीं होता, क्योंकि वह परम स्वरूप ही हो जाता है। इच्छा आती है और चली जाती है, पर वह उसे पकड़ता नहीं। वह जानता है कि मैं इच्छा नहीं, मैं तो उस इच्छा को देखने वाला शुद्ध चैतन्य हूँ। यही जीवन्मुक्ति है।
*वासुदेवः सर्वम्।*
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