*सच्चा आत्मज्ञानी कौन है? - संसार सागर का गोताखोर*
संसार रूपी सागर में एक गोताखोर की तरह उसमें से आत्म-ज्ञान रूपी अमूल्य रत्न निकालने वाला ही सच्चा आत्मज्ञानी है। जैसे सागर की ऊपरी लहरें बहुत शोर मचाती हैं, पर मोती तो गहराई में छिपा होता है, वैसे ही संसार के कोलाहल में सत्य नहीं मिलता। सत्य तो मन की गहराई में, मौन में छिपा है। आत्मज्ञानी वही है जो इस कोलाहल से बाहर निकलकर अपने भीतर गोता लगाता है।
संसार को एक मृगतृष्णा की तरह असत्य जानने वाला और परमात्मा को ही एकमात्र सत्य जानने वाला ही आत्मज्ञानी है। जैसे रेगिस्तान में हिरण को दूर से पानी दिखाई देता है पर वहाँ जाने पर केवल रेत मिलती है, वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति को संसार के भोगों में सुख दिखाई देता है। वह धन, पद, सुंदर शरीर के पीछे भागता है, पर अंत में उसे खालीपन ही मिलता है। आत्मज्ञानी इस मृगतृष्णा को पहचान लेता है। वह जान लेता है कि संसार में सुख है ही नहीं, जो सुख जैसा लगता है वह केवल दुःख का ही दूसरा रूप है। इसलिए वह परमात्मा को ही सत्य मानता है, क्योंकि परमात्मा ही वह है जो कभी बदलता नहीं, कभी नष्ट नहीं होता।
उसकी सारी भोग की वासनाएं या तो पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं, या वह अपनी वासनाओं को लेकर बिल्कुल मृत हो चुका है। आम व्यक्ति जैसे वासनाओं के पीछे पागल होकर दौड़ता है, वह वैसे नहीं दौड़ता। उसके अंदर इच्छा उठती भी है तो वह उसका गुलाम नहीं बनता। इच्छा का मिल जाना या ना मिल जाना, दोनों ही स्थितियों में उसका मन समान रहता है, दुखी नहीं होता। यह समता ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है। जैसा जीवन है, वैसा ही उसे स्वीकार करता है। अनुकूलता में वह उछलता नहीं और प्रतिकूलता में वह रोता नहीं। वह जानता है कि जीवन जैसा परमात्मा ने दिया है, वैसा ही उत्तम है।
वह न तो पंडितों की तरह केवल ज्ञान की बातें करता है, और न ही वह किसी सांसारिक व्यक्ति की तरह संसार की बातों में रस लेता है। आजकल बहुत से लोग शास्त्रों को रटकर ज्ञानी बन जाते हैं, पर उनका जीवन वैसा नहीं होता। वे केवल बोलते हैं। आत्मज्ञानी बोलता कम है, जीता ज्यादा है। उसे संसार की निंदा-चुगली, राजनीति और व्यर्थ की बातों में कोई रस नहीं आता। इसलिए वह सदा मौन ही रहना पसंद करता है। वह व्यर्थ नहीं बोलता। वह काम से ही, जब बहुत जरूरत हो, तभी अपना मुंह खोलता है। उसका मौन ही उसका उपदेश है।
सदा परमात्मा में उसका मन लगा रहता है। उसका मन विचारों को उत्पन्न करता भी है तो वह कभी भी उन्हें स्वयं के ऊपर हावी नहीं होने देता। जैसे आकाश में बादल आते हैं और चले जाते हैं, पर आकाश को गंदा नहीं करते, वैसे ही उसके मन में विचार आते हैं और चले जाते हैं, पर वह उनमें उलझता नहीं। वह विचारों का साक्षी बना रहता है। मैं यह हूँ, मैंने यह किया, मैं इतना बड़ा हूँ, इस तरह वह कभी स्वयं का राग नहीं अलापता। यह अहंकार का राग ही तो सारे दुखों की जड़ है।
वह आत्मज्ञान को अपनी मेहनत या बुद्धि का फल नहीं, बल्कि परमात्मा का प्रसाद ही मानता है। वह जानता है कि उसका जीवन और उसमें प्रकट हुआ यह आत्मज्ञान, यह सब परमात्मा की अहेतुकी कृपा ही है। इसीलिए उसमें अहंकार बिल्कुल नहीं होता। अहंकार न होने से ही वह सभी में परमात्मा का रूप ही देखता है। उसे हर वस्तु परमात्मा की ही माया लगती है। जैसे सुनार को हर गहने में केवल सोना ही दिखता है, चाहे गहने का आकार कुछ भी हो, वैसे ही उसे हर व्यक्ति में, हर प्राणी में केवल परमात्मा ही दिखता है।
इसीलिए उसमें न किसी से घृणा होती है और न किसी में उसका मोह होता है। वह बिल्कुल संसार से असंग ही रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी पानी से अलग रहता है। उसकी रुचि किसी विशेष बात में नहीं होती। वह किसी सुंदर व्यक्ति या वस्तु को देखकर उसकी तरफ खिंचता नहीं है, और न ही वह किसी कुरूप को देखकर उससे दूर भागता है। उसके लिए सुंदर और कुरूप, अच्छा और बुरा, सब समान है। वह सदा समभाव में, एक जैसा रहता है। यही योग वशिष्ठ का सार है।
उसमें किसी चीज को लेकर विस्मय या आश्चर्य नहीं होता। वह न यहाँ जाना चाहता है न वहाँ। आज का मनुष्य हमेशा भाग रहा है - यहाँ से वहाँ, वहाँ से कहीं और। पर आत्मज्ञानी जानता है कि परमात्मा तो हर जगह है, तो भागना किसलिए? वह जहाँ रहता है, वहीं परमात्मा को स्मरण करता है, वहीं उसका तीर्थ बन जाता है। उसमें न धन की आशा है न पद की। वह सदा आशाहीन रहता है, क्योंकि आशा ही दुख है। वह जानता है कि जो कुछ भी मिल जाए, वह एक दिन नष्ट तो हो ही जाएगा, यह बात ही सदा उसकी स्मृति में रहती है। इसलिए वह संग्रह नहीं करता।
वह धनी व्यक्ति को देखकर उसे अधिक मान-सम्मान नहीं देता और गरीब को देखकर उसका अपमान भी नहीं करता, वह दोनों को समान मान-सम्मान ही देता है। क्योंकि वह शरीरों को नहीं, भीतर बैठे परमात्मा को देखता है। उसकी दृष्टि में अमीर और गरीब का भेद ही मिट गया है।
वह परमात्मा को ही सत्य जानता है, संसार उसके लिए कभी हुआ ही नहीं, जैसे जाग जाने पर सपने की दुनिया कभी हुई ही नहीं लगती। वह सदा अपने स्वरूप में स्थित है। उसमें किसी को खुश रखने की या परमात्मा को भी खुश करने की इच्छा नहीं होती, क्योंकि वह जानता है कि परमात्मा को खुश करने की जरूरत ही नहीं, वह तो सदा खुश ही है। संसार उसको असत्य ही प्रतीत होता है। उसने जान लिया कि केवल परमात्मा ही है, इसमें उसका दृढ़ संकल्प होता है, अडिग निष्ठा होती है।
बाहर से देखने पर उसमें उदासी झलकती है, पर अंदर से वह तो सदा शांत, सदा आनंदित है। वह न किसी की याद में जलता है, यदि जलता है तो केवल परमात्मा की याद में ही जलता है। वह हर दिशा में, जड़ और चेतन में केवल परमात्मा को ही देखता है। ऐसी उसकी भावना बन गई है कि उसके रूप में और अनंत सृष्टियों में जितने भी रूप दिखाई दे रहे हैं, वो सब परमात्मा के ही रूप हैं। सदा यही उसकी पूजा है, यही उसकी भक्ति है और हर दिशा में उसका मंदिर है। उसके लिए पूरी सृष्टि ही मंदिर बन गई है।
*अंत में वही एक सत्य शेष रहता है - वासुदेवम् सर्वम्, सब कुछ वासुदेव ही है।*
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