*संसार में परिवर्तन ही नियम है और अहंकार ही बंधन है*
संसार में एक ही नियम अटल है - परिवर्तन। यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है। नदी का पानी, मौसम, शरीर और मन - सब पल-पल बदल रहे हैं। इसी परिवर्तन की धारा में जीव का जीवन बहता है। योग वासिष्ठ कहता है - "अहंकार एव दुःखस्य मूलम्"। दुःख का मूल संसार नहीं, बल्कि इस परिवर्तनशील संसार को अपना और सदा रहने वाला मान लेना है, और इसका कारण केवल अहंकार है।
*1. बाल्यावस्था - निर्भरता और चंचलता का काल*
व्यक्ति जब इस संसार में आता है तो बाल्यावस्था में पूरी तरह मूर्ख और असहाय होता है। वह नित्य रोता-बिलखता रहता है। उसे भूख लगी है, नींद आ रही है, पीड़ा हो रही है - वह बता भी नहीं सकता, केवल रो सकता है। वह माता-पिता पर पूरी तरह निर्भर होता है। उनकी देखभाल से ही वह जीवित रहता है।
इस अवस्था में वह अनाप-शनाप बातें करता है। अकारण ही रोने लगता है और अकारण ही हँसने लगता है। बाल्यकाल में मन दस गुना अधिक चंचल रहता है। वह एक जगह शांत नहीं बैठता। उसका मन तितली की तरह एक विचार से दूसरे विचार पर उड़ता रहता है। योग वासिष्ठ में बाल्यावस्था को अज्ञान की पहली सीढ़ी कहा गया है, जहाँ जीव को अपने स्वरूप का कोई ज्ञान नहीं होता।
पर इस अवस्था में एक सुंदरता भी है - अहंकार अभी बीज रूप में है, अंकुरित नहीं हुआ। बच्चा सब में अपना ही रूप देखता है।
*2. युवावस्था - अहंकार रूपी शत्रु का घोंसला*
युवावस्था में व्यक्ति जब संसार के प्रति जागता है, तो उसके मन में अहंकार रूपी शत्रु चिड़िया की तरह घोंसला बनाकर रहने लगता है। यह जीवन का सबसे खतरनाक मोड़ है।
अब उसे लगता है - मैं कुछ हूँ। मैं सुंदर हूँ, मैं बलवान हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ। उसे समाज में अपनी अकड़ और झूठे अहंकार की पूर्ति करने के लिए जो बन पाए, वह करता है। यौवनावस्था में ही स्त्री, जुआ, कलह आदि व्यसनों को उत्पन्न करने वाले राग, लोभ आदि दोष प्रकट होते हैं। काम, चिंता आदि के वश में होने से पुरुष स्वयं को नष्ट कर डालता है।
योग वासिष्ठ स्पष्ट कहता है - महानरक के समान, सदा भ्रान्ति पैदा करने वाली यौवनावस्था से जिन लोगों का विनाश नहीं हुआ, उनका दूसरे किसी से विनाश नहीं हो सकता। यौवन ही वह आग है जो सारे दोषों को जन्म देती है। व्यक्ति सोचता है वह संसार को जीत रहा है, पर वास्तव में अहंकार उसे जीत रहा होता है।
इस अवस्था में वह जीवन भर दूसरों के सामने अपने को बेहतर साबित करने में लगा रहता है। उसे मान-बड़ाई का चस्का उसके अहंकार से ही लगा है।
*3. वृद्धावस्था - निर्बलता और फिर भी मोह*
काल किसी को नहीं छोड़ता। वही सुंदर शरीर, वही घमंड - सब धीरे-धीरे गलने लगता है। वृद्धावस्था में व्यक्ति पूरी तरह निर्बल हो जाता है। वह रोगों का घर बन जाता है। घुटने दुखते हैं, आँखें धुंधली हो जाती हैं, सुना हुआ शरीर कुरूप शरीर में परिवर्तित हो जाता है।
आश्चर्य देखो - वृद्ध व्यक्ति फिर से एक बालक की तरह अपने परिवार पर ही निर्भर हो जाता है। जो बचपन में माता-पिता पर निर्भर था, वही बुढ़ापे में अपने बच्चों पर निर्भर हो जाता है। जीवन का चक्र पूरा हो जाता है।
जब वृद्धावस्था में उसकी वासनाएँ समाप्त होने लगती हैं, तब उसे परमात्मा की याद आती है। फिर वह भजन करता है, जो उसने जीवन भर कभी किया ही नहीं। लेकिन विडंबना यह है कि जब मौत उसके करीब आती है, तब भी उसके परिवार का मोह नहीं छूटता और अहंकार बना ही रहता है। वह अब भी कहता है - "ये मेरा घर है, ये मेरे बच्चे हैं, मेरी इज्जत है।"
*4. अहंकार का मायाजाल और जीवन का सत्य*
ये संसार हमेशा इसी तरह चलता रहेगा। अहंकार के होने से ही संसार में लोगों को ये जीवन बहुत थोड़ा होकर भी ऐसा लगता है जैसे ये हमेशा से है और हमेशा बना रहेगा।
ये जीवन पल-पल समाप्त होता जा रहा है। घड़ा टपक रहा है, पर व्यक्ति को लगता है घड़ा भरा ही रहेगा। फिर परमात्मा का नाम लेने से ज्यादा उसे समाज में नाम कमाना है। जैसे उसके नाम न हो तो वह संसार में मर जाएगा। अरे, मौत तो फिर भी आने वाली है। नाम रहे या न रहे, शरीर तो जाना ही है।
वह परमात्मा से प्रार्थना भी करता है तो कैसे? कि उसे संसार में सुख मिले और कष्ट न मिले, जैसे सुख-दुख उसे परमात्मा देता हो। परमात्मा को भुलाकर कल खत्म होने वाले संसार में उसकी रुचि इसके अहंकार से ही है। वह जिन वस्तुओं के पीछे भागता है, वह एक दिन मृत्यु छीन ही लेगी।
वह रोता-बिलखता है कि ये उसे प्राप्त न हुआ। लेकिन जो परमात्मा उसे प्राप्त ही है, वह उसे दूर स्वयं धकेल देता है। ये दशा देखो - दुःख मिले तो परमात्मा को दोष देता है, लेकिन सुख में स्वयं को ही परमात्मा मान लेता है। "मैंने किया, मैं करता हूँ" - यही दशा उसके अहंकार का ही परिणाम है।
परब्रह्म परमात्मा जो सबके अंदर है, वह किसी का भी हो सकता है, लेकिन व्यक्ति के अहंकार से दूर चला जाता है। उसे अहंकार ने रोका हुआ है, वरना परमात्मा तो एक पुकार में ही चला आता है। उसे जो कभी भी नहीं भूलता, वह भी उसे कभी नहीं भूलता। पल-पल परमात्मा के स्मरण में जो सुख है, शायद ही व्यक्ति को संसार की किसी वस्तु में प्राप्त हो।
लेकिन व्यक्ति अपने अहंकार को ही सत्य समझता है - मैं ये हूँ, मैं यहाँ रहता हूँ, ये काम करता हूँ, मेरे माता-पिता, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरे भगवान। इस तरह वह परमात्मा को भी अपने अहंकार का शिकार बना देता है और व्यक्ति सदा दुःख में विचरने लगता है।
अहंकार न हो तो दुख कब का विदा हो जाए। परमात्मा को भुला देना ही अहंकार के वश में होते चले जाना है और इसका उलट भी उतना ही सत्य है - परमात्मा का स्मरण ही अहंकार से मुक्ति है।
*अंत में -* जीवन बहुत छोटा है। इसे "मैं" को साबित करने में मत गँवाओ। "मैं" को मिटाने में लगाओ, तभी वह मिलेगा जो कभी मिटता नहीं।
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