स्वयंभू परमात्मा का स्वरूप - जगत है ही नहीं, केवल परमात्मा है*
स्वयंभू परमात्मा न तो किसी कारण से है, न अकारण ही है।
परमात्मा में जगत न तो था, न है, न ही होगा, यही श्रुति की मान्यता है। श्रुति का अर्थ है पूर्व के ज्ञानियों ने जिसे सुनकर, अनुभव करके बताया है।
इसे हम एक दृष्टांत से समझते हैं। समुद्र में जल के बुलबुले उठते हैं। बुलबुला देखने में अलग लगता है, गोल-गोल चमकता है, पर है तो वह समुद्र का जल ही। बुलबुला फूटता है तो कहाँ जाता है? समुद्र में ही मिल जाता है। उसका अलग अस्तित्व कभी था ही नहीं। वह था ही नहीं, केवल प्रतीत हो रहा था।
बिल्कुल वैसे ही समुद्र भी जल ही है। जल के अलावा समुद्र कुछ नहीं है।
वैसे ही ये नाना प्रकार के अनंत ब्रह्मांड, ये सृष्टियाँ, ये जीव, ये पहाड़, ये नदियाँ, ये सब परमात्मा से भिन्न नहीं हैं, स्वयं परमात्मा ही हैं।
*परब्रह्म में जगत कभी उत्पन्न हुआ ही नहीं*
परब्रह्म परमात्मा में ये सब कभी उत्पन्न ही नहीं हुए, न होंगे। ये सब दृश्य जगत जीवों को सत्य लगता है, जो उनके मन की कल्पना मात्र है।
जीव जगत को देखकर परमात्मा को भिन्न जानता है। उसे लगता है परमात्मा कहीं ऊपर आकाश में बैठा है और जगत नीचे है। परन्तु सत्य यह है कि परमात्मा तो जगत के रूप में ही स्वयं को प्रतीत करवाता है। जैसे सोने से बनी अंगूठी सोने से भिन्न नहीं है, सोने का ही एक रूप है। वैसे ही जगत परमात्मा का ही रूप है।
वास्तव में परमात्मा की दृष्टि से देखा जाए तो जगत है ही नहीं। यह सब कभी हुआ ही नहीं। यह केवल मन की कल्पना है, एक स्वप्न है। स्वप्न में आप महल देखते हैं, पर आँख खुलते ही महल कहाँ होता है?
*अज्ञानी और ज्ञानी की दृष्टि में अंतर*
अज्ञानी ही जगत को देखकर सत्य मान लेता है। उसे यह रंग-बिरंगा संसार सच लगता है। उसे लगता है यह घर मेरा है, यह शरीर मेरा है, यह मान-अपमान मेरा है। इसलिए उसमें उसकी वासना बनी रहती है। वासना अर्थात इच्छा, तृष्णा। यही वासना उसे परमात्मा की माया में फंसा कर रखती है। वह जन्म लेता है, मरता है, फिर जन्म लेता है, इसी चक्र में घूमता रहता है।
इसके अन्यथा ज्ञानी जगत को देखकर भी परमात्मा को ही सत्य जानता है। वह बाजार में रहता है, पर बाजार को बाजार नहीं देखता। वह सब में एक ही तत्व देखता है। वह भीड़ में भी अकेले परमात्मा को देखता है। इसलिए वह स्वयं परमात्मा रूप ही हो जाता है। क्योंकि परमात्मा और ज्ञानी की दृष्टि में जगत कभी हुआ ही नहीं। ऐसा ही श्रुति कहती है।
*वासना के अनुसार सृष्टि का खेल*
वासना के अनुसार परब्रह्म में असंख्य जीव उत्पन्न हो चुके हैं, आगे भी होंगे। हर दिशा, प्रत्येक दिशा में समुद्र में जल के बुलबुलों की तरह अनंत ब्रह्मांड उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं। कोई गिनती नहीं है उनकी।
योग वशिष्ठ में इसके लिए बहुत सुंदर श्लोक आता है -
*अन्यान्य विचित्र क्रम से और अन्यान्य विचित्र प्रकार से जीवों की विचित्र सृष्टियाँ आविर्भूत होती हैं और तिरोहित होती हैं॥३६॥*
इसका अर्थ है - अलग-अलग विचित्र क्रम से, अलग-अलग विचित्र प्रकार से, जीवों की विचित्र सृष्टियाँ प्रकट होती हैं और लुप्त हो जाती हैं। जैसे आकाश में बादल आते हैं, अलग-अलग आकार लेते हैं और चले जाते हैं, वैसे ही चेतना के आकाश में ये सृष्टियाँ आती-जाती रहती हैं। उनका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है।
*वह परमात्मा कैसा है?*
अब प्रश्न उठता है कि वह स्वयंभू परमात्मा कैसा है?
परब्रह्म परमात्मा का न आदि है, न मध्य है, न अंत है। वहाँ न स्थिति है, न फैल रहा है। न वह सूक्ष्म है, न वह विराट है। न उसमें अंधकार है, न प्रकाश है। न जल है, न हवा है, न अग्नि है, न पृथ्वी है, न आकाश है, न ही उसमें दिशाएँ ही हैं।
वह न सृष्टि की इच्छा करता है, फिर सृष्टि का विनाश कैसे होगा उसमें? जब इच्छा ही नहीं है तो बनाना-बिगाड़ना कहाँ से आएगा? उसमें न अनंत जीव हैं, न अनंत ब्रह्मांड। इससे वह अनुभव में नहीं आते। अनुभव तो उसका होता है जो दो हो। यहाँ तो एक ही है, तो अनुभव कौन करेगा और किसका करेगा?
वह स्वयं में स्वयं पूर्ण है। स्वयं ही है। और ऐसा परमात्मा है जिसे बुद्धि से जाना नहीं जाता, न ही शब्दों से कहा जा सकता है। बुद्धि तो उसके अंदर की एक छोटी सी तरंग है, तरंग समुद्र को कैसे जान लेगी? शब्द तो वहाँ पहुँचते ही नहीं। ऐसा उपनिषद् का सार है
*अंतिम सत्य*
ऐसा हमने उनसे सुना है, जिन्हें उसका अनुभव हुआ था। ऐसा ही श्रुति कहती है। श्रुति का अर्थ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि आत्मज्ञानी से परमात्मा को सुनना है।
इसलिए अंतिम बात यह है कि - जगत को सत्य मत मानो। जगत को देखकर परमात्मा को याद रखो। हर चेहरे में, हर पत्ते में, हर कण में वही एक है। जब यह दृष्टि पक्की हो जाएगी, तो मन से मुक्ति अपने आप मिल जाएगी। क्योंकि मन ही जगत को सच मानता है। जब मन ने जगत को सच मानना छोड़ दिया, तो मन ही नहीं बचा, और जहाँ मन नहीं, वहाँ केवल *वासुदेवम सर्वम - सब कुछ वासुदेव ही है
।*
*जय श्री दत्तात्रेय! जय वासुदेवम सर्वम!*
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