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पुरूषार्थ से परमपद पार्ट 2

 भाग्यवादी नहीं, पुरुषार्थी बनो - क्योंकि परमात्मा स्वयं तुम्हारे रूप में बैठा है









भाग्य में विश्वास करने वाला व्यक्ति अनजाने में ही अपने जीवन को नरक की तरफ ले जाता है। जो व्यक्ति हर बात पर यह कहता है कि "सब कुछ भाग्य है, किस्मत में जो लिखा है वही होगा", वह वास्तव में अपने हाथों से अपने जीवन की डोर को काट देता है। ऐसा व्यक्ति सदा उन पुरुषों के अधीन होता है जो पुरुषार्थी हैं, जो कर्म में विश्वास रखते हैं। भाग्यवादी व्यक्ति इस लोक में भी अपमान सहता है और परलोक में भी उसकी कोई गति नहीं होती।


दूसरों को सुखी, संपन्न और सफल देखकर अपने भाग्य को दोष देने वाला व्यक्ति सबसे बड़ी भूल करता है। वह यह नहीं जानता कि वह केवल अपने भाग्य को नहीं, बल्कि अपने भीतर छुपे हुए परमात्मा को ही असमर्थ और कमजोर समझ रहा है। जब तुम कहते हो "मैं नहीं कर सकता, मेरी किस्मत ही खराब है", तो तुम उस ईश्वर का अपमान करते हो जिसने तुम्हें यह मनुष्य जीवन दिया है। यह तुम्हारे अज्ञान को ही दिखाता है।


जिसने जीवन को केवल अपने अहंकार की दृष्टि से देखा, वो कभी यह नहीं जान पाता कि परमात्मा तो सर्वसमर्थ है। अहंकारी व्यक्ति सोचता है कि "मैं कर रहा हूँ", और जब वह असफल होता है तो कहता है "मेरा भाग्य खराब है"। दोनों ही स्थितियों में वह बंधा हुआ है। ऐसे व्यक्ति के मन में फिर पुरुषार्थ करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। वह आलसी, दुखी और परावलंबी बन जाता है।


लेकिन सत्य को वो ही जान पाता है जिसने यह जान लिया कि परमात्मा स्वयं मेरे रूप में है। मेरे भीतर जो चेतना है, जो शक्ति है, वह कोई और नहीं, स्वयं परमात्मा ही है और वो स्वयं मेरा सहारा बनने को हर क्षण तत्पर है। जब यह बोध हो जाता है, तो व्यक्ति फिर कर्म से भागता नहीं है। वो अपने कर्म में पूरी निष्ठा से लगा रहता है। उसे फल की चिंता नहीं सताती।


और कर्म करते-करते एक दिन वह इस गहरे रहस्य को जान लेता है कि "मैं स्वयं कुछ नहीं करता, सब परमात्मा द्वारा ही हो रहा है"। मैं तो केवल एक निमित्त हूँ, एक यंत्र हूँ। कर्ता तो वही है। यही भाव जब हृदय में उतर आता है, तो यही मुक्ति का सबसे बड़ा उपाय बन जाता है। फिर वो व्यक्ति कर्म करते हुए भी मुक्त ही हो जाता है। वह बंधन में नहीं पड़ता।


इसी सत्य को हमारे शास्त्रों में बहुत सुंदर कहा गया है:







*_न दैवमपि सञ्चित्य त्यजेदुद्योगमात्मनः ।

अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति ।।_*


इसका अर्थ है - दैव यानी भाग्य का विचार करके व्यक्ति को कार्य-संपादन का अपना प्रयास कभी भी त्याग नहीं देना चाहिए। भला समुचित प्रयास के बिना कौन तिलों से तेल प्राप्त कर सकता है? अगर तिलों को बिना पेरें ही छोड़ दिया जाए और सोचा जाए कि भाग्य से ही तेल निकल आएगा, तो क्या कभी तेल मिलेगा? कभी नहीं।


हितोपदेश के रचनाकार के मतानुसार भी पुरुषार्थ यानी उद्यम के बिना वांछित फल नहीं मिल सकता है। यह सृष्टि का अटल नियम है।


अगर व्यक्ति अपनी वर्तमान परिस्थितियों को देखकर यह सोचने लगे कि "मैं गरीब हूँ, मैं अनाथ हूँ, मैं लाचार हूँ, कोई भी मेरी मदद नहीं करता, मेरी किस्मत ही फूटी है", तो वह वास्तव में स्वयं परमात्मा के दिये हुए इस अनमोल जीवन का अपमान कर रहा है।


जो हो चुका है, उस अतीत को तो बदला नहीं जा सकता। लेकिन भविष्य में क्या होगा, यह किसने जाना है? भविष्य कोई लिखी हुई किताब नहीं है, वह तो आज के पुरुषार्थ से ही बनता है। व्यक्ति अपने पुरुषार्थ द्वारा ही अपने भविष्य का निर्माण करता है।


इसलिए जो व्यक्ति विषम से विषम परिस्थितियों में भी, दुःख और अभाव में भी, परमात्मा के दिये हुए इस जीवन को परमात्मा का दिया एक अनमोल रत्न मानता है और हर श्वास के लिए उसका आभारी रहता है, वही वास्तव में परमात्मा को प्राप्त करने का सच्चा पुरुषार्थ रखता है। अन्य कोई नहीं। शिकायत करने वाला नहीं, बल्कि धन्यवाद करने वाला ही ईश्वर तक पहुँचता है।

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