*वैराग्य का जन्म - शरीर के मोह का नाश*
शरीर को देखना और आत्मा को पहचानना
इस शरीर की रचना किस प्रकार होती है, ये कहाँ से आता है और किस प्रकार चला जाता है, कोई नहीं जानता। एक दिन प्रत्येक व्यक्ति अचानक स्वयं को इस शरीर में पाता है और इसमें लगाव के कारण वह स्वयं को शरीर ही समझ लेता है। यही अज्ञान उसके जीवन के दुखों का पहला कारण बन जाता है।
उसके सारे क्रियाकलाप इस शरीर के द्वारा ही होते हैं। वह मुंह से बोलता है, कानों से सुनता है, आँखों से देखता है, हाथों से कार्य करता है, पैरों से चलता है, मन से सोचता है। इसी क्रिया के कारण वह शरीर के मोह में पड़ जाता है, जो निश्चित ही होना चाहिए। धीरे-धीरे ये शरीर ही उसकी पहचान बन जाता है। लोग उसे उसके नाम से नहीं, उसके शरीर से पहचानते हैं और वह चाह कर भी स्वयं को इससे अलग नहीं कर पाता।
*शरीर की पूजा और भ्रम का जाल*
विस्मय की बात तो यह है कि मनुष्य अंत में शरीर का ही पूजन करने लगता है। वह परमात्मा को भी स्वयं जैसा एक शरीर देकर उसकी मूर्तियां बनाने में लगा रहता है। वह सोचता है कि परमात्मा भी उसकी तरह ही देखता, सुनता और चलता होगा। यही सबसे बड़ा भ्रम है।
वह सुंदर शरीर को देखकर मोहित होता है और कुरूप शरीर को देखकर घृणा करता है। वह गोरे रंग से प्रेम करता है और काले रंग से दूरी बनाता है। वह जवान शरीर की पूजा करता है और बूढ़े शरीर का तिरस्कार करता है। यह भेदभाव केवल शरीर के कारण ही तो है। यही मोह उसे सत्य देखने नहीं देता।
शरीर के किसी हिस्से में चोट लगने पर वह कराहता है और शरीर के काटे जाने पर असीम दुःख को प्राप्त करता है। जैसे चोट शरीर पर नहीं, उसकी आत्मा पर लगी हो।
*शरीर का सत्य स्वरूप - एक विचार*
यह शरीर सुंदर हो या कुरूप, लेकिन सत्य तो यही है कि ये एक तरह से गंदगी का घर ही है। इस बात पर विचार करना वैराग्य की पहली सीढ़ी है। मल-मूत्र, पसीना, रक्त, मांस, हड्डी - इन्हीं सब से मिलकर तो यह शरीर बना है। बाहर से हम इसे इत्र से सजाते हैं, परंतु भीतर तो यह अपवित्रता से ही भरा है।
ये शरीर बचपन से बुढ़ापे तक निरंतर बदलता रहता है। बचपन में जितना कोमल होता है, बुढ़ापे में उतना ही जर्जर हो जाता है। आज जो गाल सुंदर लगते हैं, कल वही पिचक जाते हैं। आज जो आँखें तेज हैं, कल वही धुंधली हो जाती हैं। फिर भी मनुष्य इसी बदलते हुए शरीर से मोह रखता है।
ये शरीर रोगों से पल भर में ग्रस्त हो जाता है। इसको सर्दी लगने पर यह ठिठुरता है और गर्मी लगने पर जलन होने लगती है। ये पल भर में ही सुख-दुख में पड़ जाता है। आग इसे जला देती है, पानी इसको डुबा देता है। एक छोटा सा कांटा भी इसे अपार पीड़ा दे सकता है। अनेक प्रकार से इसको कष्ट दिया जा सकता है।
इसको भूख और प्यास निरंतर लगती रहती है। सुबह भोजन किया, शाम को फिर भूख लग गई। यह भूख ही तो मनुष्य को दिन-रात कर्म करने पर मजबूर करती है।
*वासना का अंतहीन चक्र*
ये शरीर संभोग के लिए सदा तत्पर रहता है और इसके क्षणिक सुख के लिए मनुष्य कुछ भी कर लेता है। ये कर्म भी करता है तो इसी विचार से कि मेरी स्त्री हो, मेरा पुरुष हो, कैसे मैं ज्यादा से ज्यादा संभोग कर पाऊं, कैसे मैं सुंदर शरीरों का भोग करूं। वह सोचता है कि इसी में परम सुख है।
फिर ये ऐसा करके अपने जैसे शरीरों को ही उत्पन्न करता है। वह अपने बच्चों में भी अपना ही मोह देखता है। यह चक्र चलता ही रहता है - शरीर से शरीर बनता है। फिर ये सब करके परमात्मा की याद इसे कहाँ से आएगी? जब मन ही शरीर के भोग में लगा है तो आत्मा का चिंतन कैसे होगा?
*मोह का परिणाम और वैराग्य का उदय*
निश्चित ही ये शरीर कुछ समय के लिए ही है और मृत्यु के समय छीन जाता है। चाहे कितना भी सुंदर हो, कितना भी बलशाली हो, एक दिन इसे यहीं छोड़ना पड़ता है। ये शरीर तो नाश हो जाता है, लेकिन इस मोह के कारण उस व्यक्ति की जो आत्मा है, जो स्वयं परमात्मा का ही अंश है, वह भी परमात्मा से दूर हो जाती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - *"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय"* - जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करती है।
जिसने स्वयं को शरीर जाना, वह इससे मोह करता है और वह दुखों में पड़ जाता है। वह मृत्यु से डरता है। और जिसने स्वयं को परमात्मा का अंश जाना, वही परमसुख का हकदार है। वही निर्भय हो जाता है।
यह शरीर से मोह ही है जो व्यक्ति को नारकीय जीवन एक नहीं, बार-बार देता है। और इसको इसके सत्य स्वरूप परब्रह्म परमात्मा से विमुख रखता है। जब इस सत्य का बोध होता है, तभी वैराग्य का जन्म होता है। वैराग्य का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि सत्य को जानकर जीना है।
*जय श्री गुरुदेव दत्त!*
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