काम से जन्मा जीव और काम से मुक्ति कैसे ?*
जीव काम के द्वारा ही जन्म लेता है, उसका सारा जीवन काम का ही रचा होता है। यह अटल सत्य है कि जिस काम-बीज से शरीर बनता है, जीवन भर वही बीज वृक्ष बनकर उसे घेरे रहता है। फिर प्रश्न उठता है कि वह स्वयं काम से जन्म लेकर काम वासना से मुक्त कैसे हो ?
इसलिए वह इसके लिए स्त्री संग में रहता है। वह सोचता है कि यही सुख है, यही जीवन का आधार है। वह स्त्री के लिए धन कमाता है, दिन-रात मेहनत करता है, पसीना बहाता है। उसकी खुशी के लिए साधनों को जमा करने पर ही ध्यान देता है। बड़ा घर, गाड़ी, गहने, कपड़े - सब कुछ इसी मोह में जुटाता है। बदले में उससे संभोग पाता है और उसी को परम सुख मान लेता है।
फिर बच्चे पैदा करता है। फिर उन बच्चों के लिए भी साधनों को जुटाने में लग जाता है। अब उसकी चिंता दोगुनी हो जाती है। पहले स्त्री के लिए, अब बच्चों के लिए। फिर बुढ़ापे में वह बच्चों के बच्चों के साथ समय बिताता है और सोचता है कि यही जीवन की पूर्णता है।
फिर एक दिन मर जाता है। सारा जोड़ा हुआ धन, सारे साधन, सारा परिवार यहीं रह जाता है। फिर वही उसके स्त्री, बच्चे और बच्चों के बच्चे कुछ समय बाद उसको याद करना बंद कर देते हैं। दो-चार दिन रोते हैं, फिर संसार अपनी चाल चलने लगता है। फिर यही उसका बेटा करता है। फिर उसका बेटा, यही सिलसिला चलता रहता है। जीवन को यूं गंवा देता है जैसे यह टाइम पास करने आया हो। 80 साल का जीवन वह ऐसे बिता देता है जैसे कोई किराए के मकान में कुछ दिन रहकर चला गया हो।
वह स्त्री मोह से इस तरह बंधा है कि वह सत्य नहीं देखता। वह यह नहीं देखता कि शरीर का नाश तो होगा ही, यह शरीर तो एक दिन मिट्टी में मिल ही जाएगा। लेकिन जिस शरीर को परमात्मा का मंदिर बनाया जा सकता था, जिस शरीर से ध्यान, जप, तप और मोक्ष पाया जा सकता था, वो तो भोग विलास और स्त्री के साथ संभोग करने में ही लगा रहा।
जिसकी रुचि स्त्री में है, वो परमात्मा में क्या रुचि लेगा ? जिसे संभोग में सुख लगता है वह परमात्मा के परमसुख को क्या प्राप्त करेगा ? यह क्षणिक सुख है, यह टूटने वाला सुख है। परमात्मा का सुख अखंड है, कभी न खत्म होने वाला है।
निश्चय ही देखने पर पता चलता है कि स्त्री का शरीर भी मिट्टी ही है, वह भी गंदगी से भरा है। उससे भी मल मूत्र ही निकलता है, रक्त, पीप, पसीना ही निकलता है। ऊपर से सुंदर दिखने वाली चमड़ी के भीतर वही सब है जो पुरुष के शरीर में है। फिर भी अज्ञानी पुरुष उसको कुत्तों की तरह चाटता है, उसी के पीछे भागता है। ये प्रभु की माया में रत रहता है।
वह नहीं जानता कि स्त्री तो धनरूपी कीचड़ में विचरने वाली, संसाररूपी तालाब में मछलीरूपी पुरुषों को फँसाने के लिए कांटे में लगी हुई आटे की गोली है। जैसे मछली आटे की गोली को देखकर कांटे में फंस जाती है, वैसे ही पुरुष रूप-सौंदर्य को देखकर माया के जाल में फंस जाता है। जिसका मन पुरुषों को फँसाने में ही लगा रहता है वह संसार को जन्म देने वाली माया के हाथ की कठपुतली है। जो पुरुष को जैसे चाहे नचाने के लिए तत्पर रहती है।
ये स्त्री न होती तो संसार कब का विदा हो जाता, ये बंधन कब का टूट जाता। जो पुरुष स्त्री के पीछे भागता है वह नर्क को आमंत्रण देता है। जिस पुरुष को स्त्री अपना दास बना दे वह परमात्मा का दास क्या बनेगा ? वह तो जीवन भर उसी का सेवक बनकर रह जाता है।
निश्चित ही स्त्री समागम में क्षणिक सुख है, इसको कोई नकार नहीं सकता। लेकिन यह भी सत्य है कि स्त्री का शरीर भी एक दिन मुरझा जाएगा, वह हमेशा सुंदर नहीं रहता है। वही शरीर जो जवानी में गोरा और आकर्षक लगता है, वही बुढ़ापे में झुर्रियों से भर जाता है। वह स्त्री का शरीर बुढ़ापे में पुरुषों को दूर भगाने के लिए काफी है। जो युवा अवस्था में पुरुषों को स्वयं के पीछे कुत्तों की तरह भगाती थी, वही बुढ़ापे में अकेली रह जाती है।
इसलिए बुद्धिमान पुरुष को विचार करना चाहिए। वह परमात्मा तो है ही, लेकिन सिर्फ उसी का जो उसको सबसे ऊपर रखे। केवल उसी के पीछे भागे, उसी का दास बनने की इच्छा रखे। काम से मुक्ति का एक ही मार्ग है - काम को परमात्मा की ओर मोड़ देना।
जो स्त्री मिले उसे भी परमात्मा की ओर ले जाये। यदि गृहस्थ में है तो दोनों मिलकर भजन करें, दोनों मिलकर परमात्मा को खोजें। न की उससे संभोग में रत रहे और परमात्मा को भुला दे। स्त्री को भोग की वस्तु नहीं, साधना की संगिनी बनाओ तो यही बंधन मोक्ष का कारण बन जाएगा।


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