*Title:* पुरुषार्थ ही मन से मुक्ति और परमात्मा प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है
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मनुष्य के जीवन में दो ही रास्ते हैं - एक मन के अनुसार चलना और दूसरा उद्देश्य के अनुसार चलना। जो मन के अनुसार चलता है वह जीवन भर भटकता है, और जो उद्देश्य के अनुसार चलता है वही पुरुषार्थी कहलाता है।
पुरुषार्थ क्या है?
पुरुषार्थ का अर्थ है - पुरुष होने का अर्थ, अपने जीवन के उद्देश्य के लिए किया गया अथक प्रयास। शास्त्रों में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। लेकिन इन सभी की नींव एक ही है - निरंतर प्रयास।
जीवों को जन्म-मरण की इस अनंत यात्रा से पार करने में केवल मनुष्य का पुरुषार्थ ही सहारा बनता है। जानवर तो अपने भाग्य और प्रकृति के अनुसार जीते हैं, लेकिन मनुष्य के पास चुनाव है। वह चाहे तो भाग्य को रोता रहे, या चाहे तो पुरुषार्थ से अपना नया भाग्य लिख दे।
भाग्य में विश्वास करने वाला कभी मुक्त नहीं होता
भाग्य में विश्वास करने वाला व्यक्ति कभी भी पुरुषार्थ का सहारा नहीं ले पाता। वह सोचता है - "जो किस्मत में होगा मिल जाएगा।" यही सोच उसे आलसी और कमजोर बना देती है।
याद रखिए, भाग्य भी उसी का साथ देता है जो पुरुषार्थ करता है। खाली बैठे रहने वाले के लिए तो भाग्य भी कुछ नहीं कर सकता। इसलिए हमारे शास्त्र कहते हैं - भाग्यवादी नहीं, कर्मवादी बनो।
मन से मुक्ति का उपाय भी पुरुषार्थ ही है। मन बहुत चंचल है, वह हर क्षण आपको भटकाएगा। आज ये कर लो, कल वो कर लो। इसी भटकाव में पूरा जीवन निकल जाता है। इस मन को जीतने का एक ही उपाय है - एक बड़े उद्देश्य के लिए अपना सब कुछ लगा देना।
एक उद्देश्य में समर्पण ही मन पर विजय है
जब व्यक्ति पूर्ण रूप से एक उद्देश्य की तरफ समर्पित हो जाए, फिर चंचल मन भी आसानी से कुचला जा सकता है।
मान लीजिए एक व्यक्ति ने तय किया कि मुझे परमात्मा को पाना है। अब उसका मन कहेगा - फिल्म देख लो, दोस्तों से बात कर लो, थोड़ा आराम कर लो। लेकिन अगर वह अपने उद्देश्य के प्रति सच्चा है, तो वह मन की नहीं सुनेगा।
जब व्यक्ति मानसिक रूप से एक विचार को पूरी तरह अपना जीवन देने में समर्थ होता है, फिर मन के अन्य विचारों का कोई मूल्य नहीं रह जाता और कर्म भी उसी प्रकार के होते हैं। उसके कर्म, उसके विचार, उसकी पूरी ऊर्जा सिर्फ एक ही दिशा में बहने लगती है।
यही एकाग्रता ही सिद्धि है।
वह व्यक्ति उसके सामने आने वाली मुश्किलों को देखकर घबराता नहीं है। संसार उसका मजाक उड़ाए, लोग उसे छोड़ दें, वहां वो अकेला भी पड़ जाए लेकिन अपने उद्देश्य के लिए आगे बढ़ता रहता है। दुनिया कहेगी - पागल है, लेकिन वही पागलपन एक दिन पूजा बन जाता है।
और एक ऐसी अवस्था आती है जब उसे पूरी तरह बर्बाद हो जाने पर भी वह रुके न, तो स्वयं परमात्मा को उसकी सहायता करने आना पड़ता है। भगवान गीता में कहते हैं - जब भक्त अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर लेता है, तब मैं उसकी मदद के लिए दौड़ पड़ता हूँ।
पुरुषार्थ ही श्रेष्ठ है - इतिहास इसका गवाह है
मन के अनुसार जीवन जीने वाला व्यक्ति कभी पुरुषार्थ के बिना परमात्मा तो क्या, इस संसार में भी कभी कुछ नहीं पा सकता। इसलिए पुरुषार्थ ही श्रेष्ठ है।
इतिहास देख लीजिए, जितने भी महापुरुष हुए हैं, सब पुरुषार्थी थे। भगवान राम ने 14 वर्ष वन में पुरुषार्थ किया, तब जाकर मर्यादा पुरुषोत्तम बने।
देवता भी पुरुषार्थ करने वाले असुरों के सामने नतमस्तक हो गये। यह कोई साधारण बात नहीं है। पौराणिक कथाओं (जैसे शिवपुराण) के अनुसार, जब देवताओं ने असुर शंखचूड़ से अपना राज्य वापस मांगा, तो उसने देने से मना कर दिया।
उसने युद्ध का आह्वान करते हुए कहा था—
*श्लोकांश: "राज्यं दास्ये न देवेभ्यो वीरभोग्या वसुंधरा।"*
*अर्थात्, मैं देवताओं को राज्य नहीं दूंगा क्योंकि यह पृथ्वी वीरों के द्वारा भोगने योग्य है, कायरों के द्वारा नहीं।*
सोचिए, देवता होते हुए भी जब उन्होंने पुरुषार्थ छोड़ दिया, तो एक असुर के सामने हार गए। और एक असुर होकर भी शंखचूड़ ने अपने पुरुषार्थ से तीनों लोकों पर राज किया।
इसलिए याद रखिए, यह वसुंधरा वीरभोग्या है। यह पृथ्वी उसी की है जो मेहनत करता है, जो पुरुषार्थ करता है।
निष्कर्ष
तो यदि आपको मन से मुक्ति चाहिए, यदि आपको परमात्मा तक जाना है, तो भाग्य को दोष देना बंद कर दीजिए। आज से ही एक उद्देश्य चुनिए और उस पर अपना जीवन लगा दीजिए। मन अपने आप शांत हो जाएगा, रास्ते अपने आप खुल जाएंगे और परमात्मा स्वयं आपका हाथ पकड़ लेगा

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