आध्यात्मिक जागृति के चरण
आध्यात्मिक विचारधारा तो बहुत लोगों में होती है, लेकिन उनमें से कुछ ही सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति बन पाते हैं और उससे भी कम लोग आध्यात्मिक जागृति को प्राप्त करते हैं। यह एक दिन का कार्य नहीं है, बल्कि एक लंबी और गहरी यात्रा है। इस यात्रा में हमें कई ऐसे कठिन पड़ावों से गुजरना पड़ता है जो हमारे व्यक्तित्व, अहंकार और पुरानी मान्यताओं को पूरी तरह से झकझोर देते हैं। कई लोग स्वयं को आध्यात्मिक मानते तो हैं, लेकिन इन कठिनाइयों से गुजरते ही उनका सारा शौक निकल जाता है। इन चरणों में वे या तो सत्य से समझौता कर लेते हैं या आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। आइए जानते हैं वो 7 अनिवार्य चरण जिनसे आध्यात्मिक जागृति से पहले हर साधक को गुजरना ही पड़ता है। इन पड़ावों को समझना और स्वीकार करना ही सच्ची साधना की पहली सीढ़ी है। बिना इनके जागृति अधूरी रहती है हमेशा
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| Adhyatmik vyakti aaine me apne aatma swaroop ka darshan karte hue satya ka samna |
आध्यात्मिक जागृति के 7 आवश्यक चरण
1.सत्य का सामना
जीवन में हर किसी के, और खासतौर पर एक आध्यात्मिक व्यक्ति के जीवन में एक ऐसा चरण जरूर आता है जब उसे नंगे सत्य को देखना पड़ता है। उस क्षण उसे अपने सारे स्वार्थ, सारे हिसाब-किताब छोड़ने पड़ते हैं। यह नहीं सोचना कि मेरा इससे क्या फायदा होगा या क्या नुकसान होगा। बस उन सारे सवालों को किनारे रखकर केवल सत्य के साथ खड़ा होना पड़ता है, भले ही उससे वह मुसीबत में पड़ जाए या सब कुछ खो दे।
एक आध्यात्मिक व्यक्ति होने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि उसे सत्य को पूरी तरह स्वीकार करना होता है और झूठ से हर हाल में किनारा करना होता है। उसे अपने जीवन में यह भेदभाव छोड़ना पड़ता है कि यह मेरा अपना है और यह पराया है। उसे केवल अपने विवेक से, पूरी ईमानदारी से सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस दिखाना पड़ता है। इस सच के कारण वह कई दुश्मन बना लेगा, लोग उसके खिलाफ हो जाएंगे, लेकिन अगर वह झूठ से समझौता कर लेगा तो वह सबसे बड़ा धोखा अपनी ही अंतरात्मा को देगा, जो एक साधक कभी नहीं कर सकता। यही सच्ची आध्यात्मिकता की असली परीक्षा और पहचान है हमेशा के लिए।
2.अकेलापन की परीक्षा
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| Sanyasi andhere toofan bhare jangal me akela dhyan karte hue andar ki roshni jalaye hue akelepan ki pariksha |
वहाँ एक आध्यात्मिक व्यक्ति के मन में अगर दूसरों से सहायता लेने या दूसरों द्वारा स्वीकार किए जाने की इच्छा बची हो, तो वह दूसरों के पास ही जाता है। वह सोचता है। लेकिन जब उन्हीं लोगों से उसे धोखा मिलता है, तभी जाकर वह खुद को अकेला कर लेता है। तब उसे एहसास होता है कि जिनके पीछे वह भाग रहा था, वे लोग केवल अपने स्वार्थ के लिए ही उसके साथ थे। जैसे ही उसके पास देने के लिए कुछ नहीं बचेगा, वैसे ही वे लोग भी उसे लात मार देंगे, जिन्हें वह अपना मानता था। जिनसे उसने मदद की उम्मीद की थी, वही सबसे पहले मुंह मोड़ लेंगे। तब उसे समझ आता है कि संसार में जिसे वह अपना कहता था, वह वास्तव में कोई अपना नहीं है। यहीं पर उसका सबसे बड़ा वहम, सबसे बड़ा भ्रम टूट जाता है। यही आध्यात्मिक व्यक्ति के अकेले चलने का पहला सच्चा संकेत है। अब उसे केवल परमात्मा के भरोसे ही चलना होगा, उसी से प्रार्थना करनी होगी, उसी से मदद मांगनी होगी, किसी संसार के जीव से नहीं। यही अकेलापन उसकी आत्मा को ताकतवर बनाएगा और आगे चलकर उसके लिए नए रास्ते खोलेगा।
3.मोह का त्याग
आध्यात्मिक जागृति से पहले साधक को उस हर चीज का सामना करना पड़ता है जिससे उसका लगाव है, जिसमें उसकी गहरी आसक्ति है, यानी जिसे वह छोड़ने से सबसे ज्यादा डरता है। उसे वह सब कुछ प्राप्त करने या खोने की स्थिति से गुजरना ही पड़ता है। ऐसा समय जरूर आएगा जब उसके अपने सारे सहारे, सारी इच्छाएं छूट जाएंगी या पूरी नहीं होंगी। तब उसे खुद को कोसना नहीं है, न ही रोते हुए बैठे रहना है। उसे अपनी यह पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नष्ट करनी होगी कि कोई मेरा है, यह चीज मुझे जरूर मिलेगी, मैं इसके बिना जी नहीं पाऊंगा। यह सोच एक सांसारिक व्यक्ति का जीवन है। अगर उसे भी वैसा ही सामान्य जीवन जीना है तो वह अध्यात्म और सत्य की राह पर न चले। जैसे बाकी सब लोग केवल शरीर के तल पर जी रहे हैं, वैसे ही जीता रहे। लेकिन अगर उसे आत्मा के तल पर जीना है, तो उसे संसार को नहीं बल्कि संसार के मोह को त्यागना होगा। जो मिले उसी में संतुष्ट रहना और जो न मिले उसका विचार तक न करना ही सच्चा वैराग्य है। यही आध्यात्मिक जागृति का तीसरा कठिन पड़ाव कहलाता है साधक के लिए हमेशा कोई इच्छा न होना हीं आवश्यक है
4.बुरे समय में संयम
यदि आप सत्य पर हैं तो इस कलियुग में, झूठ से भरे समाज में आपका जीना बहुत मुश्किल कर दिया जाएगा। लोग आपको तरह-तरह के नामों से पुकारेंगे, आपका मजाक उड़ाएंगे। आपके बारे में तरह-तरह की झूठी अफवाहें फैलाई जाएंगी। आपको बार-बार नीचा दिखाने की, तोड़ने की कोशिश की जाएगी। यह वह समय होता है जब आपको बड़ी सूझ-बूझ और धैर्य से काम लेना होता है। हर उस व्यक्ति के सामने जिसने आपके खिलाफ रहने का मन बना ही लिया है, उसके सामने खुद को सही साबित करने की कोशिश करना सबसे बड़ी मूर्खता होगी। ऐसे समय में आप बस अपने आप में रहें, शांत रहें। किसी से बहस न करें, केवल परमात्मा को ही याद करते रहें, उसी का नाम जपते रहें। आप कभी भी अपने आप को कमतर न आंकें। यह बुरा वक्त है, पर यह भी एक दिन चला जाएगा, जैसे हर रात के बाद सुबह आती है। यह एक कठिन रास्ता है जिस पर आपको बड़े संयम और विश्वास के साथ आगे बढ़ते रहना है। आप कभी हिम्मत मत हारना, क्योंकि एक सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति कभी हार नहीं मानता। अगर आप डटे रहे तो आगे चलकर आपको परमात्मा की प्राप्ति जरूर होगी। बस चलते रहना है, सत्य के साथ, संयम के साथ और परमात्मा के साथ।
5.स्वयं पर विश्वास होना
जिसने भी आपको छला है, धोखा दिया है, उससे लड़कर या उसके जैसा बनकर बदला नहीं लेना है। उसको जवाब देने के लिए नीचे नहीं उतरना है। उसकी हालत पर कभी दया भी नहीं करनी है। उसके कर्म ही उसे दंड देंगे, यह है। आपको तो इस हद तक ऊपर उड़ना है, इतना ऊंचा उठना है कि आपको गिराने वाले लोग आपको नजर भी न आएं। इसके लिए सबसे जरूरी है कि आपको अपने ऊपर विश्वास होना चाहिए। सत्य के मार्ग पर अगर आप अकेले भी पड़ जाएं, तो भी आप अकेले नहीं हैं। स्वयं परमात्मा, जो अन्नत कोटि ब्रह्मांडों का मालिक है, वह आपके साथ खड़ा है। जो परमात्मा पर विश्वास करेगा, वही खुद पर विश्वास कर पाएगा। आप खुद को सबसे बेहतर मानें, आपको लोगों को गलत साबित करने का मौका दिया जाएगा और खुद को सही साबित करने का भी
6. परमात्मा को समर्पण
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| Adhyatmik sadhak khule aasman ke neeche brahmand ki roshni me Parmatma ko samarpan karte hue |
अपने जीवन का सारा नियंत्रण छोड़ दीजिए, क्योंकि आपके साथ स्वयं परमात्मा खड़ा है। अगर आप वास्तव में अध्यात्म की राह पर हैं, तो आपको परमात्मा का पूरा सहयोग जरूर मिलेगा। अपने जीवन में यह मत सोचिए कि ऐसा नहीं हुआ, काश ऐसा हो जाता, यह न होता तो अच्छा होता। इस तरह के विचारों से परमात्मा की व्यवस्था पर शक मत कीजिए। एक सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति को परमात्मा कभी भी अकेला नहीं छोड़ता। आप बस उसी परमात्मा पर अपना ध्यान टिकाए रखिए। संसार में क्या हो रहा है, कौन क्या कर रहा है, इस सबको छोड़ दीजिए। जिसे जो करना है, उसे करने दीजिए। आपको इस आध्यात्मिक यात्रा में केवल परमात्मा में ही अपना ध्यान केंद्रित करना है। आपके करने से कुछ होता तो वह कब का हो गया होता। सच तो यह है कि आपके करने से कुछ भी नहीं होगा, जो करेगा स्वयं परमात्मा ही आपके लिए करेगा। आप बस उस पर पूरा विश्वास रखिए और उससे कहिए, जैसी तेरी मर्जी, मैं तो बस तुझे ही याद करूंगा। इस बात को हमेशा अपने दिमाग में चलाते रहिए कि उसी की मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता, तो वह भला आपको कैसे कुछ होने दे सकता है।
7.बुरी आदतों को त्यागे
जब तक आप पूरी तरह से शुद्ध नहीं हो जाते, तब तक आपमें स्वयं परमात्मा प्रकट नहीं हो सकता। यानी आप अभी भी जीवभाव में ही रहेंगे, आत्मभाव में नहीं आ पाएंगे। सच्ची आध्यात्मिक जागृति तभी होगी जब आप अपने अंदर की सारी कमियों को, सारे दोषों को पूर्ण रूप से खत्म कर देंगे। आपको खुद को सिर्फ शरीर नहीं, बल्कि आत्मा के रूप में जानना होगा। शरीरी जीवन, शरीर के सुखों के पीछे भागना आपके लिए नहीं है। आपको अपना खालीपन और अकेलापन मिटाने के लिए बनी हुई गलत आदतों का पूरी तरह से त्याग करना होगा। तभी आपको पूर्ण रूप से आत्मा के तल पर और परमात्मा के स्वरूप में जीने का अधिकार मिलेगा। इसलिए स्वयं को इंद्रियों के झूठे और स्थाई लगने वाले सुखों से दूर रखिए। उनमें मत उलझिए और केवल परमात्मा के सच्चे सुख पर ध्यान दीजिए, जिसमें कोई भोग-विलास नहीं है, केवल शांति और आनंद है, उसको प्राप्त करने पर ही ध्यान दीजिए हमेशा
निष्कर्ष
आध्यात्मिक जागृति से पहले आने वाले ये सभी चरण हर एक सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए बहुत आवश्यक हैं। इन कठिन रास्तों से गुजरना ही आपको बाकी की भीड़ से अलग करेगा। आज नहीं तो कल, आप खुद से भाग नहीं सकते, आपको खुद का सामना करना ही पड़ेगा। आपमें ये जो आध्यात्मिक जागृति का साहस है, उसी साहस के लिए आपकी कठिन परीक्षा ली जाएगी। आपमें ही वह खास बात है जो परमात्मा चाहता है, इसलिए आपको ही इन सभी चरणों से गुजरना होगा। यह रास्ता सबके लिए नहीं बना है। मेरी इन बातों को वही समझ पाएंगे जो खुद को आत्मा मानते हैं, शरीर नहीं मानते। जो यह जानते हैं कि शरीर तो एक दिन नष्ट हो जाएगा, लेकिन आत्मा तो हमेशा रहेगी, अमर रहेगी। हमें इन शरीरों के बंधन से मुक्ति चाहिए, क्योंकि हम एक आत्मा हैं। इन सब चरणों से गुजरने के बाद ही हम आत्मा के तल पर जी पाएंगे, आत्मा के उद्देश्य के लिए और परमात्मा के उद्देश्य के लिए जी पाएंगे। आपमें भी वही परमात्मा वास करता है जो स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव में है। आप बस इस सत्य को भूल चुके हैं, आपको इसे फिर से याद करना है। आज के इस लेख को यहीं पर विराम देता हूं फिलहाल
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