जीवन को परमात्मा की अमूल्य भेंट समझने वाला ही परमात्मा की शरण ले सकता है
जीवन क्या है? क्या यह सिर्फ खाना, पीना, कमाना और एक दिन इस दुनिया से चले जाना है? नहीं। जीवन परमात्मा द्वारा दी गई एक अमूल्य भेंट है। और जो व्यक्ति इस भेंट की कीमत को समझ लेता है, वही अंत में परमात्मा की शरण में जाता है।
वास्तव में देखा जाए तो जीवन में कभी दुखों में गिरा हुआ व्यक्ति ही परमात्मा की शरण ले पाता है। क्योंकि सुख में तो हम परमात्मा को भूल जाते हैं। जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, तब हमें परमात्मा की याद नहीं आती।
1. जिसे सब कुछ मिल जाता है, उसके लिए संसार ही सत्य है
जिस व्यक्ति को जीवन में सब कुछ आसानी से मिल जाता है - पैसा, घर, परिवार, नौकरी, इज्जत - उसके लिए संसार ही सब कुछ है। उसके लिए यही सत्य है। वह कभी अंदर की ओर नहीं देखता। उसे लगता है कि सुख बाहर की चीजों में है। नई गाड़ी में, बड़े घर में, बैंक बैलेंस में, लोगों की वाह-वाही में।
वह बाहर देखने वाला व्यक्ति सुख भी बाहर ही ढूंढता है। लेकिन यह उसकी सबसे बड़ी भूल है। वह सोचता है कि एक और इच्छा पूरी हो जाए तो उसे शांति मिल जाएगी, लेकिन ऐसा कभी होता नहीं।
जब व्यक्ति को जीवन में कुछ पता नहीं चलता, जब उसके सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, जब वह दुख के सागर में घिर जाता है, तब वह उस तरफ भागता है जहाँ वह शांति पा सके। और शांति बाहर नहीं, अंदर है। तब जाकर वह अंदर की तरफ देखना शुरू करता है। दुख ही वह पहला दरवाजा है जो हमें अंदर की ओर ले जाता है।
2. अंदर की तरफ देखने वाला ही समर्पित हो जाता है
बाहर देखने वाला हमेशा मांगता रहेगा। उसे लगेगा यह मिल जाए तो सुख मिल जाएगा, वह मिल जाए तो शांति मिल जाएगी। उसकी मांग कभी खत्म नहीं होती। लेकिन अंदर की तरफ देखने वाला ही परमात्मा को पूरी तरह से समर्पित हो जाता है।
क्योंकि वह समझ जाता है कि स्वयं में ही परमात्मा है। हमारे अंदर ही उसका वास है। हमें परमात्मा को ढूंढने के लिए हिमालय पर जाने की जरूरत नहीं, वह तो हमारे हृदय में ही बैठा है।
जब तक हम बाहर सुख ढूंढते हैं, तब तक हम भिखारी हैं। जिस दिन हम अंदर देखना शुरू कर देते हैं, उस दिन हम राजा बन जाते हैं। क्योंकि अंदर परमात्मा में असीम सुख का भंडार है। वह सुख ऐसा है जो संसार की किसी भी चीज से नहीं मिल सकता। दुनिया की सबसे महंगी चीज भी वह आनंद नहीं दे सकती जो एक पल परमात्मा की शरण में मिलता है।
बाहर देखने वाला व्यक्ति सुख भी बाहर ही देखता है, इसलिए वह हमेशा दुखी रहता है।
3. संसार का सुख खालीपन देता है
यह सबसे बड़ा सत्य है। संसार का सुख अंत में खालीपन देता है। आज हर व्यक्ति इस खालीपन का शिकार है। चारों तरफ देखो - सबके पास सब कुछ है, फिर भी सब परेशान हैं। किसी को नींद नहीं आती, किसी को शांति नहीं मिलती, किसी का मन अशांत है।
क्यों? क्योंकि जो सुख संसार देता है, वह दुखों में बदल जाता है। आज जो चीज सुख दे रही है, कल वही दुख का कारण बन जाएगी। नया मोबाइल खरीदोगे, 2 दिन खुशी होगी, तीसरे दिन वह पुराना लगने लगेगा। यही संसार का नियम है।
लेकिन परमात्मा की शरण में जो सुख है, वह कभी दुख में नहीं बदलता। वह स्थायी है, अमर है। वह परमसुख और परमशांति देने वाला है। उससे सांसारिक लोग कहेंगे कि तू तो बड़ा दुखी होना चाहिए क्योंकि तुझे संसार में कुछ भी न मिला। न बड़ा घर, न पैसा। लेकिन वही व्यक्ति अंदर से सबसे ज्यादा सुखी होता है। क्योंकि उसने वह पा लिया जो पैसों से नहीं मिलता।
4. हमारी आत्मा को परमात्मा की जरूरत है
हमारी आत्मा को संसार की नहीं, परमात्मा की जरूरत है। उसको वही प्यारा है। उस आत्मा को परमात्मा से प्रेम है और परमात्मा को सभी आत्माओं से। यह रिश्ता शरीर और मन से परे है।
लेकिन शरीर और मन तो संसार में ही सुख देखता है। वह परमात्मा के जीवन में सवाल करता है। उसके पास क्या नहीं है, उसे देखता है। जब सब कुछ मिल भी जाए, एक दिन वह जानता है कि सब कुछ मिलते हुए भी नहीं मिला। केवल परमात्मा की शरण में रहने वाला जानता है कि सुख तो केवल परमात्मा की शरण में है।
जिसने कभी स्वयं के अंदर सुख नहीं देखा, वह परमात्मा की शरण क्या लेगा। क्योंकि स्वयं में तो परमात्मा ही है।
5. कलियुग में विनाश की राह
वास्तव में यही कलियुग में विनाश की राह है कि सुख को बाहर देखना और परमात्मा के अलावा हर किसी से सुख पाने की आशा रखना। हम इंसानों से उम्मीद रखते हैं कि वे हमें सुख देंगे, पैसों से उम्मीद रखते हैं कि वह शांति देगा।
नहीं मिल सकता सुख बिना परमात्मा की शरण लिए, बिना उसमें विश्वास किए। बिना परमात्मा के जीवन व्यतीत करना तो जीवन को व्यर्थ करना है।
इसलिए अपने जीवन को परमात्मा की अमूल्य भेंट समझो। इस शरीर को एक मंदिर समझो जिसमें परमात्मा बैठा है। जब यह समझ आ जाएगी, तो आप दौड़ना बंद कर देंगे और उसकी शरण में चले जाएंगे। और जहाँ शरण है, वहीं असली जीवन है। वहीं परम सुख है।
मनुष्य का जीवन या बहुत बड़ा अवसर
पृथ्वी लोक में अनन्त जीव हैं, परन्तु मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीव है...
पृथ्वी लोक में अनन्त जीव हैं। चींटी से लेकर हाथी तक, जल में रहने वाली मछली से लेकर आकाश में उड़ने वाले गरुड़ तक। सभी में जीवन है, सभी में भूख है, सभी में भय है।
परन्तु एक ही भेद है जो मनुष्य को इन सबसे अलग करता है। वह भेद है - *अपने मूल स्वभाव से परे सोचने की चेतना।*
भूख लगना, प्यास लगना, सोना, संभोग, अपनी रक्षा करना, मल-मूत्र त्यागना... ये सब कार्य तो जानवर भी करते हैं, और मनुष्य से बेहतर करते हैं। एक शेर ज्यादा ताकत से शिकार करता है, एक पक्षी मनुष्य से ज्यादा अच्छी नींद सो लेता है।
तो फिर मनुष्य का जीवन यदि इन्हीं कार्यों तक सीमित रह जाए, तो उसका जीवन भी जानवरों जैसा ही हुआ। शरीर से मनुष्य, परन्तु जीवन से पशु। फर्क सिर्फ इतना है कि जानवर यह सब मजबूरी में करता है, मनुष्य इसे चुनाव समझ कर करता है।
मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा अवसर
मनुष्य जीवन आज भी बदला जा सकता है, यदि उसमें थोड़ी भी समझ शेष है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य योनि 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मिलती है। यह कोई सजा नहीं, यह एक अवसर है।
यदि यह जीवन व्यर्थ चला गया - केवल कमाने, खाने, बच्चे पैदा करने और मर जाने में - तो उसके बाद फिर कई करोड़ों योनियों में भटकना पड़ता है। फिर वही भूख, वही नींद, वही भय, पर बिना उस चेतना के जो प्रश्न पूछ सके।
और यदि इसी जीवन को ठीक से देख लिया जाए तो परमात्मा तो है ही। प्रश्न यह नहीं है कि परमात्मा है या नहीं, प्रश्न यह है कि वह कहाँ है? कैसा है?
वह प्यास जो कभी बुझती नहीं
यदि व्यक्ति के मन में ये सवाल ही न उठें तो उसके भीतर घटी वह चेतना व्यर्थ चली जाती है।
ये जगत कहाँ से आया? मैं कौन हूँ? यह जीवन क्या है? मृत्यु के बाद क्या होगा?
जो चेतना हर श्वास में है, हर धड़कन में है, हर दुःख और हर सुख के अनुभव में परमात्मा के होने का प्रमाण दे रही है, हम उसी को अनसुना कर देते हैं।
यही तो उलझन है। परमात्मा है या नहीं है? जीवन तो है, यह संसार तो है। फिर भी मनुष्य के भीतर एक ऐसी प्यास है जो कभी फलती-फूलती नहीं, जो कभी बुझती नहीं। वह प्यास है - उस कारण को जानने की, जिसके होने से मेरा होना है, इस संसार का होना है।
मृत्यु घटती है। क्यों घटती है? उसके बाद क्या होगा? यह शरीर स्वयं ही बच्चे से जवान और जवान से बूढ़े में परिवर्तित हो जाता है। इसमें हमारा क्या योगदान है? यह संसार तो हमारे बिना भी था और हमारे बिना भी ऐसा ही रहने वाला है।
तो फिर इस जीवन में पाकर भी क्या पा लेंगे, जो मृत्यु नहीं छुड़ा सकती? धन? पद? रिश्ते? मृत्यु एक क्षण में सब छुड़ा देती है।
प्रश्न पूछने वाले को उत्तर मिल ही जाता है
जिसने ये सवाल उठाये, आज नहीं तो कल उसे जवाब मिल ही जायेगा। यह सृष्टि का नियम है।
लेकिन यदि सवाल ही नहीं किए, तो हमें एक दिन वैसे ही मर जाना है जैसे एक जानवर मरता है। बिना जाने, बिना समझे।
मनुष्य की बात ही यही है कि वह जिस चीज़ के पीछे पड़ जाए और अपने मन में यह संकल्प कर ले कि "मैं इसे प्राप्त करूँगा" या "मैं इसे जानूँगा", फिर सारा अस्तित्व ही उसके साथ हो लेता है। पूरी कायनात उसकी मदद में लग जाती है।
मन की शक्तिया
आप एक कदम परमात्मा की ओर बढ़ाओ, परमात्मा दस कदम आपकी ओर बढ़ाता है। यह कोई कहानी नहीं, यह चेतना का विज्ञान है।
वहाँ आप आगे बड़े कदम बढ़ाएँ। परमात्मा मिले न मिले, परम सुख मिले न मिले, अमरता मिले न मिले, परन्तु आपकी सारी चेष्टाएँ व्यर्थ नहीं जाएंगी। क्योंकि आपने अपना जीवन, स्वयं की आत्मा को, स्वयं की चेतना को, स्वयं के लिए खर्च किया है। उस चीज़ के लिए खर्च किया है जिसे मृत्यु कभी नहीं छीन सकती।
आपने स्वयं को धोखा नहीं दिया। आप व्यर्थ के मार्ग से, संसार के उस मार्ग से मुक्त हो चुके जहाँ सारी दुनिया पागल बनी हुई है। जहाँ लोग चींटियों की तरह एक रेखा में, एक के पीछे एक, मृत्यु के मुख तक चले जा रहे हैं।
आज एक शपथ लो
आज ये शपथ लो कि स्वयं को जानकर ही मृत्यु को स्वीकार करेंगे।
जिस दिन आपने यह संकल्प ले लिया, उसी दिन से सूर्य ही आपके जीवन का सवेरा बन जायेगा। अंधेरा बाहर नहीं, भीतर था। और भीतर ही प्रकाश जलाना है।
आपके मार्ग में आई रुकावटें अब आपको नहीं, स्वयं ब्रह्मांड को ही रोकने की असफल कोशिश करेंगी। क्योंकि जब एक मनुष्य जागता है, तो पूरा ब्रह्मांड उसके साथ जागता है।
याद रखो, मनुष्य जीवन आपका है। आपने ही इसको सफल बनाना है। कोई दूसरा आकर इसे सफल नहीं करेगा। कोई गुरु, कोई ग्रंथ, कोई मंदिर आपको मुक्ति नहीं दे सकता, जब तक आप स्वयं मुक्त होने का निर्णय न ले लें।
यह जीवन पशु की तरह जीने के लिए नहीं, परमात्मा को जानने के लिए मिला है। और जो जान लेता है, वह मरता नहीं, वह अमर हो जाता है।




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