मन ही दुःख का कारण है - मन पर विजय कैसे पाएं?

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मन ही दुःख का कारण 



जो मन से प्रेरित होकर सारे कार्य करता है, वह जीवन भर कभी दुखों से मुक्त नहीं हो सकता।


मन से ही दुःख का प्रवाह है। यही सत्य है जिसे हमारे ऋषियों ने, संतों ने हजारों साल पहले जान लिया था। आज का मनुष्य बाहर के संसार में सुख ढूंढ रहा है, पर उसे पता ही नहीं कि दुःख बाहर नहीं, उसके अपने मन के अंदर है।


मन की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है? वह वर्तमान में स्थित न होकर कभी भूतकाल की बातों में फंसा रहता है, कभी भविष्य की कपोल कल्पनाओं में उलझा रहता है। जो हो गया उसके लिए रोता है, और जो अभी हुआ ही नहीं उसके लिए चिंता करता है। इसी भूत और भविष्य के बीच वह अपने वर्तमान को, जो कि परमात्मा का सबसे बड़ा प्रसाद है, उसे नष्ट कर देता है।


यह मन वर्तमान में एक पल भी टिकना नहीं चाहता। यह इसका स्वभाव है। यह स्वयं को कुछ न कुछ पाने की आस में ही भटकाता रहता है। इसके अंदर दिन-रात एक ही आवाज चलती है - "ये नहीं है, वो मिल जाए, उसके पास ये है, वो ऐसा है, मैं क्यों नहीं, काश ऐसा हो।" 


जरा सोच कर देखो, क्या ये बातें सत्य हैं? ये सभी बातें जो व्यक्ति के मन में आती है, निश्चित ही मन की तरह मिथ्या है। जैसे सपने में देखा हुआ महल सत्य नहीं होता, वैसे ही मन के सुख-दुख भी केवल कल्पनाओं में सत्य हैं। वास्तव में न तो मन का कोई स्वतंत्र अस्तित्व है, न ही उसकी मनगढ़ंत बातों का। इस पूरे ब्रह्मांड में अगर कोई सत्य है, तो वह है चैतन्य स्वरूप परमब्रह्म ही एकमात्र सत्य है।


मन नहीं है तो दुःख किसको हो?


यह बहुत गहरा प्रश्न है। अगर हम गहराई से देखें तो मन है ही नहीं। वह केवल विचारों का एक समूह है। अगर मन नहीं है, तो दुःख किसको हो? और मन नहीं तो सुख किसको हो? जब सुख-दुःख दोनों ही नहीं रहते, तब जो अवस्था बचती है, वही सुख-दुख से परे परमसुख है। जहां केवल परमब्रह्म परमात्मा ही है। वही हमारा असली स्वरूप है।


जहां मन सुख देखता है, वहां कुछ समय बाद नष्ट होने वाला ही है। यह संसार का नियम है। मन द्वारा इंद्रियों के सुख में रस आना, उसे सुख प्राप्त होने पर दुख में परिवर्तित कर देता है। आज जिस मीठे को खाकर मन खुश होता है, कल वही अधिक खाने पर बीमारी बनकर दुख देता है। आज जिस व्यक्ति से मन सुख की आशा रखता है, कल वही व्यक्ति दुख का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। फिर मन अन्य में सुख देखता है, वह भी दुख में परिवर्तित होने वाला है। यह चक्र कभी खत्म नहीं होता।


इसलिए संत कहते हैं - मन का सुख न मिले तो अच्छा है, क्योंकि वह भी दुख ही है। यह बात सुनने में अजीब लगेगी, पर यही परम सत्य है।


मूर्ख व्यक्ति ही मन के कहने पर चलता है।


मूर्ख व्यक्ति मन के कहने पर ही दुखों से मुक्त नहीं हो पाता। वह अपने ही मन के जाल में फंसा रहता है। वह दुखों को बड़ा करके अपने आप को इस तरह घेर लेता है कि न वो इससे मुक्त ही होना चाहता है। उसे अपने दुखों से ही प्रेम हो जाता है।


जिन लोगों ने अपने मन पर विजय प्राप्त नहीं की, उनके लिए सब जगहों में दुख ही दुख भरा हुआ है। चाहे आप उन्हें महल में रख दो, सोने की थाली में भोजन दे दो, पर उनका मन वहां भी दुख ढूंढ लेगा। क्योंकि दुख महल में नहीं, मन में है।

मन से मुक्ति 

और जिन्होंने अपने कल्पित मन और उससे उपजे असत्य विचारों को सत्य मान लिया, फिर ब्रह्मा भी उसे उपदेश करे, वह दुखों से मुक्त नहीं हो सकता। यह इतना कठोर सत्य है।


इसे एक उदाहरण से समझो। जैसे एक छोटा बालक अंधेरे में परछाई को देखकर भूत समझ लेता है ,कल्पित भूत को सत्य मान लेता है और डर के मारे रोने लगता है। वहां भूत है ही नहीं, पर बालक के लिए वह सत्य है। वैसे ही मूर्ख व्यक्ति कल्पित मन और उसके दुखों को सत्य मान लेता है और जीवन भर रोता रहता है।


जिन्होंने अपने मन में ही सुख जाना, वह अंत में निश्चित ही दुखों में गिर जाएगा। वह मन के भोगरूपी कीचड़ में गिरा पड़ा रहेगा। इस कीचड़ से बाहर निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है।


तो फिर करना क्या चाहिए?


इस मायिक जगत में सुखी-दुखी होना उचित नहीं है। यह ज्ञानी का लक्षण है। जब जैसा मिले, समता में ही रहे। न जाने कि सुख मिल रहा है, न जाने कि दुख मिल रहा है। केवल यह जाने कि हमें सुख-दुख होते ही नहीं। ये संसार मन में है, मन में ही रहने दे। आप इस मन के नहीं, आप तो परमात्मा के ही अंश हैं। इसलिए आप परमात्मा में ही स्थित रहें।

मन से मुक्ति पार्ट2

परमात्मा की माया में रत न रहें। यह जानें कि दिखने वाला संसार असत्य ही है। परमात्मा स्वयं ही अनंत रूपों में दिखाई पड़ रहा है। वही सबका चेतन है और इस प्रकार का है कि वह सुखों-दुखों को भोगता ही नहीं। हम उसी परमात्मा का स्वरूप हैं।


यह संसार तो छूट जाता है। शरीर छूट जाता है, रिश्ते छूट जाते हैं, धन-दौलत छूट जाती है। लेकिन परमात्मा तो हमेशा बना रहेगा। वह कभी नहीं छूटता। इसलिए हम उसी का विचार करें। हम उसी का नाम लें, उसी का स्मरण करें। फिर जो हो जाए, उससे निराश न हों। कुछ मिलने की आशा का त्याग कर दें।






मन ही संसार है 


जो मिला है, वो स्वयं परमात्मा है। अब और क्या मिलने से हमें कभी दुख न होगा? जो मिला है उसे दुख नहीं होता, हमें उसी में ही स्थित रहना है। वही स्वयं परमात्मा है। उसी में स्थित हो जाना ही मोक्ष है, वही परम आनंद है।


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