कलियुग क्या है? इस युग में 75% पाप क्यों है और इससे बचने का उपाय क्या है?

 शास्त्रों में हमें चार युगों का वर्णन मिलता है। ये चारों युग मिलकर एक काल-चक्र को पूरा करते हैं और यह चक्र ऐसे ही अनंत काल तक चलता रहता है। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है, वैसे ही ये चार युग भी बार-बार आते और जाते रहते हैं।


आइए इन चार युगों को विस्तार से समझते हैं।







1. सतयुग - धर्म का स्वर्णिम काल


सतयुग को सभी युगों में श्रेष्ठ माना गया है। इस युग में मानव सभ्यता पूर्ण रूप से धर्म के मार्ग पर थी। हर व्यक्ति के हृदय में दया, सत्य, तप और पवित्रता थी।


इसकी आयु 17,28,000 वर्ष बताई गई है। इस युग में पुण्य 100% और पाप 0% था। मतलब अधर्म का नामोनिशान नहीं था। मनुष्य की आयु हजारों वर्षों की होती थी और वह अपनी आत्मा के ज्ञान में स्थित रहता था। इसी युग में भगवान के मत्स्य, कूर्म, वराह और नृसिंह अवतार हुए।


2. त्रेतायुग - देवता और दानव एक ही पृथ्वी पर


दूसरा युग है त्रेतायुग। इस युग में धीरे-धीरे धर्म का एक पैर कम हो गया। इस युग में देवता और दानव स्वभाव के लोग एक ही पृथ्वी पर रहने लगे।


इसकी आयु 12,96,000 वर्ष है। इस युग में पुण्य 75% और पाप 25% हो गया। मनुष्य में अहंकार और स्वार्थ का जन्म होने लगा। इसी युग में भगवान श्री राम का अवतार हुआ था, जिन्होंने मर्यादा का पाठ पढ़ाकर धर्म की पुनः स्थापना की।


3. द्वापरयुग - देवता और दानव एक ही परिवार में


तीसरा युग है द्वापरयुग। इस युग में धर्म का एक और पैर टूट गया। अब तो देवता और दानव स्वभाव के लोग एक ही परिवार में रहने लगे। एक ही घर में एक भाई देवता जैसा और दूसरा दानव जैसा।


इसकी आयु लगभग 8,64,000 वर्ष बताई जाती है। इस युग में पुण्य 50% और पाप 50% हो गया। महाभारत का युद्ध इसी युग की सबसे बड़ी घटना है, जहां एक ही परिवार के अंदर धर्म और अधर्म का युद्ध हुआ। इसी युग के अंत में भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया।


4. अंतिम युग - कलियुग, जिसमें हम जी रहे हैं


और फिर आता है अंतिम युग, कलियुग। जिस युग में हम और आप आज जी रहे हैं।


इस युग की विशेषता सबसे अलग है। सतयुग में देवता और दानव अलग-अलग लोकों में थे, त्रेता में एक ही पृथ्वी पर आ गए, द्वापर में एक ही परिवार में आ गए, और कलियुग में तो वे सभी मानव के अंदर ही सूक्ष्म रूप में रहने लगे हैं।


एक ही व्यक्ति के अंदर कभी देवता जाग जाता है तो कभी दानव। सुबह वह मंदिर में दान करता है और शाम को किसी को धोखा दे देता है। यही कलियुग है।


इसकी आयु लगभग 4,32,000 वर्ष है और अभी तो इसका पहला चरण ही चल रहा है। इस युग में पुण्य 25% और पाप 75% है।


कलियुग की सबसे विचित्र बात


कलियुग की सबसे विचित्र और निकृष्ट बात यही है कि यह युग भगवान का भजन करने वालों को दुःख और भगवान से मुंह मोड़ने वालों को सुख देता हुआ दिखाई देता है। जितना ज्यादा आप परमात्मा के करीब जाएंगे, उतनी ही ज्यादा परीक्षाएं आएंगी। और जितना आप उससे दूर रहेंगे, संसार आपको उतना ही सुखी दिखाएगा।


आज के समय में मानव को उसकी आत्मा से दूर करने के लिए सारी व्यवस्था की हुई है। व्यक्ति चाहे भी तो इससे आजाद नहीं हो सकता। हर एक व्यक्ति ही कलियुग की माया का मोहरा है। वह पूर्ण रूप से कलियुग की माया में जकड़ा हुआ है।


उसके लिए परमात्मा केवल मंदिरों तक सीमित है। मंदिर के अंदर वह हाथ जोड़ता है, और मंदिर के बाहर आते ही वैसा ही जीवन जीता है जो उसे परमात्मा से दूर ले जाने वाला है।

Parmatma ka swaroop 


पाप क्या है, पुण्य क्या है - सब जानते हैं


पाप क्या है, पुण्य क्या है, ये सभी जानते हैं। लेकिन ये बातें केवल किताबों और प्रवचनों में ही सीमित रह गई हैं। व्यक्ति का अहंकार इन बातों को सत्य नहीं मानता। उसकी गति केवल संसार के सुख में ही लगी रहती है।







उसके लिए वह धन कमाता है, स्वयं को दूसरों से बड़ा दिखाने के लिए सारे क्रियाकलाप करता है। उसमें जो यह मिथ्या अहंकार जन्मा है, वह कलियुग में ही हो सकता है। कलियुगी व्यक्ति हर किसी को धन से आंकता है। परमात्मा की बातें नहीं की जातीं, केवल संसार की व्यर्थ की बातों में ही सबका रस लगा रहता है।

Ahnkar se mukti 

तो फिर उपाय क्या है?


परमात्मा कभी कहीं नहीं गया। वह आज भी प्रत्येक व्यक्ति के भीतर और बाहर मौजूद ही है। बस इतने बड़े कलियुग की व्यवस्था में वह बहुत दूर लगता है। कलियुग का प्रभाव इस हद तक है कि सबको परमात्मा ऐसा लगता है जैसे है ही नहीं।


जिसने कलियुग की माया को गहराई से सोचा, वह जानेगा कि सब कुछ ढोंग है। हर व्यक्ति परमात्मा को भूला चुका है। उसके मन में धन की ही प्राथमिकता है, परमात्मा उसकी लिस्ट में कहीं नहीं आता।


ये पा लूं, ये कर लूं, ये मिल जाए - सब उसके मन में कलियुग का ही प्रभाव है जो कभी खत्म होने वाला नहीं है।


यह प्रभाव तभी खत्म होगा जब व्यक्ति इन सब बातों को व्यर्थ समझे और परमात्मा को ही अपनी प्राथमिकता में रखे। चाहे धन मिले या न मिले, मान-सम्मान मिले या न मिले, कुछ भी न मिले, लेकिन परमात्मा को वह कभी नहीं भूलने वाला। केवल परमात्मा के मार्ग पर ही चलने लगे, बाकी सब कुछ छूट जाए।


यही कलियुग के असर का खत्म होना और परमात्मा के असर का शुरू होना है। क्योंकि तीनों कालों में परमात्मा ही सत्य है, बाकी सब कुछ समय के लिए ही सत्य लगता है। यह सब नाश होने वाला है, लेकिन परमात्मा तो हमेशा रहने वाला है। हमें उसी के पीछे भागना है, न कि कलियुग की माया के पीछे।


*जैसा कलियुग, वैसे ही कलयुगी।



यह कोई सिद्धांत नहीं, केवल एक विचार है। इस विचार को समझना बहुत जरूरी है कि आज कोई भी इन सब से बचना नहीं चाहता। सब इसी में घुलना-मिलना चाहते हैं। सब एक गर्त में अंधों की तरह गिरते जा रहे हैं।



न किसी ने पूछा कि यहाँ कलयुगी जीव कहाँ चले जा रहे हैं, न किसी ने जाना कि आगे तो मृत्यु ही सत्य है। बस एक ही सोच है - जैसे संसार चलता आ रहा है, वैसे ही हमें भी करते रहना है। यही तो कलियुग है।



यही कलियुग की माया है और कलयुगी की मनोदशा है। इस माया ने सबका मन इसी में लगाए रखा है। इसमें से अगर एक-दो व्यक्ति बाहर निकलना भी चाहें, तो भी वे निकल नहीं पाते। वे भीड़ में ही फंसे रह जाते हैं। चारों तरफ कलयुगी लोग, चारों तरफ कलियुग की माया, जो इस तरह मदहोश किए हुए है कि कोई सत्य देखना ही नहीं चाहता। जैसे हमने पिछले ब्लॉग में जाना था।

Kaliyug kya hai











कलियुग - एक विशाल समुद्र



इस कलियुग को एक बहुत बड़े समुद्र के रूप में समझो। इस समुद्र में भयंकर लहरें हैं - वासना की, लोभ की, अहंकार की, क्रोध की। हर लहर तुम्हें डुबाने के लिए तैयार है।



और इस भयंकर समुद्र में परमात्म मार्ग का राही अपनी छोटी सी कश्ती को पार कराने में लगा हुआ है। वह इस कलियुग के समुद्र में कहीं सत्य रूपी किनारा ढूंढता है, जिससे वह इस समुद्र में डूबने से बच जाए।



सोचो, करोड़ों लोगों में से एक ही इस परमात्म मार्ग का राही होता है। यह भीड़ का मार्ग नहीं है, यह अकेले चलने का मार्ग है। जब तक वह जीता है, हर एक श्वास में वह परमात्मा का स्मरण करता है। हर एक पल वह उसी सत्य में जीता है कि कब वह परमात्मा के स्वरूप में लीन हो जाए।



परमात्मा के राही की पहचान क्या है?



जिसे संसार की मोह-माया ने नकार दिया, जिसका कलियुग की माया ने तिरस्कार किया, जिसने कभी परमात्मा के अलावा अन्य किसी की तलाश नहीं की, वही है परमात्म मार्ग का राही।



उसकी पहचान बड़ी सरल है। वह जहाँ-जहाँ गया, वहाँ स्वयं परमात्मा ही गया। जहाँ-जहाँ उसने अपने आप को मुसीबत में पाया, स्वयं परमात्मा ही उसका मददगार बना। क्योंकि उसने अपना सारा भार परमात्मा पर छोड़ दिया है।













वह परमात्म मार्ग का राही इस कलियुग में आज भी है। वह कलियुग की माया को खुली चुनौती देने वाला है। वह अन्य कलयुगियों की तरह जीवन नहीं जीता। वह तो संसार में रहकर भी उससे असंग ही है। जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से अलग रहता है, वैसे ही वह राही इस संसार में रहता है।



वह कलयुगियों को समुद्र में डूबते हुए देखता है, पर उन्हें बचाने के लिए दौड़ता नहीं है। वह जानता है कि स्वयं का उद्धार केवल स्वयं ही किया जाता है। कोई दूसरा तुम्हें नहीं बचा सकता। गुरु केवल मार्ग दिखा सकता है, चलना तो तुम्हें ही पड़ेगा।



भीड़ क्यों डूबना पसंद करती है?


क्योंकि भीड़ को डूबने में ही मज़ा आता है। सत्य कड़वा लगता है। माया मीठी लगती है।



कलियुग में झूठी प्रशंसा, झूठे रिश्ते, झूठी सफलता - सब मीठी लगती है। और सत्य? सत्य यह है कि तुम अकेले आए हो, अकेले जाओगे। सत्य यह है कि यह शरीर नश्वर है। यह सत्य कोई सुनना नहीं चाहता।



इसीलिए लोग आंखें बंद करके उस गर्त में गिरते जा रहे हैं। उन्हें लगता है कि सब जा रहे हैं तो हम भी चले जाते हैं। यही सबसे बड़ा भ्रम है।



तो फिर बचने का उपाय क्या है?



उपाय बहुत सरल है, पर कठिन भी।



पहला उपाय है - *जाग जाओ।* यह समझो कि तुम एक समुद्र में हो और डूब रहे हो। जब तक तुम्हें यह एहसास नहीं होगा कि तुम डूब रहे हो, तुम किनारा कैसे ढूंढोगे?



दूसरा उपाय है - *भीड़ से अलग होना सीखो।* भीड़ जो कर रही है, उसे आंख बंद करके मत करो। पूछो - मैं यह क्यों कर रहा हूँ? क्या इससे मुझे परमात्मा मिलेगा या यह मुझे और गहरे गर्त में ले जाएगा?












और तीसरा और अंतिम उपाय है - *हर श्वास में स्मरण।* परमात्म मार्ग के राही की तरह बनो। उठते-बैठते, चलते-फिरते, काम करते हुए भी अंदर एक जाप चलता रहे। वह जाप तुम्हें इस माया के सागर में तैरना सिखा देगा।



अंत में एक सवाल तुमसे


तो आप किस राह में हैं? परमात्मा की या संसार की?



जो आप पढ़ रहे हैं, वह आपको परमात्मा की राह में ले जाने वाला है। अब आपका चुनाव ही आपको तय करेगा। आपका चुनाव ही आपको परमात्मा की राह का राही और इस कलियुग की माया में परमात्मा का साथी बनाएगा।







याद रखना, चुनाव तुम्हारा है। डूबना भी तुम्हारा चुनाव है और तै

र कर किनारे तक जाना भी तुम्हारा ही चुनाव है।



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॥ वासुदेवं सर्वम् ॥


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