कर्म ही जीवन है: आज के कर्म से ही कल का भाग्य बनता है*

 मानव कर्मों में ही लगे रहते हैं। कर्मों से ही जन्म-मरण होता है। अच्छे कर्मों का अच्छा फल और बुरे कर्मों का बुरा फल मिलता है।


इसी कर्मजाल से ही व्यक्ति सुख-दुःख को भोगता है। सुख कोई बाहर से नहीं आता, वह हमारे ही किए गए शुभ कर्मों का प्रसाद है। दुःख भी कोई दुश्मन नहीं देता, वह हमारे ही अशुभ कर्मों का परिणाम है।


कर्म के बिना संसार नहीं चल सकता





सोचो अगर व्यक्ति कर्म करना ही बंद कर दे तो क्या होगा? किसान हल चलाना बंद कर दे तो अन्न कैसे उगेगा? मजदूर घर बनाना बंद कर दे तो हम रहेंगे कहाँ? वैज्ञानिक प्रयास करना बंद कर दे तो नए आविष्कार कैसे होंगे?


आज तक दुनिया में जितने भी आविष्कार हुए हैं, वे एक दिन में नहीं हुए। हजारों बार असफल होने के बाद, लगातार कर्मों से ही वे सफल हुए। जो आधुनिक दुनिया हम आज देख रहे हैं, जिसमें मोबाइल है, इंटरनेट है, हवाई जहाज है, यह सब हजारों साल के मानव कर्मों का ही फल है।


व्यक्ति कर्म न करे तो संसार नहीं चलता। संपूर्ण मानव कर्मों से शुभ-अशुभ फल प्राप्त करते हैं। इसलिए कर्म करना मजबूरी नहीं, प्रकृति का नियम है।


दो रास्ते: एक परमात्मा की ओर, दूसरा संसार की ओर


कर्म तो सभी करते हैं, लेकिन कर्म की दिशा ही जीवन की दशा तय करती है। जिसने कर्मों को सही मार्ग में किया वही कर्मों से परमात्मा तक पहुँच गया। जिसने कर्मों को गलत मार्ग में किया उसका जीवन परमात्मा से बहुत दूर चला गया।


हमारे जीवन में कई बार हमें फैसले करने पड़ते हैं कि अच्छे कर्मों की ओर जाएं या गलत कर्मों की ओर। हमारे फैसले में ही हमारे जीवन का कारण है।


इसको एक उदाहरण से समझो।


एक लड़के के पास ऊर्जा है, शक्ति है, समय है। अब उसके पास दो विकल्प हैं। पहला विकल्प है कि वह अपनी ऊर्जा और शक्ति को अपने परिवार वालों के लिए पैसे कमाने में, अपनी पढ़ाई में, अपने शरीर को मजबूत बनाने में लगाए। दूसरा विकल्प है कि वह उन्हीं परिवार वालों से पैसे लेकर मौज-मस्ती, घूमने-फिरने, नशे में अपनी ऊर्जा को बर्बाद कर दे।


दोनों ही लड़के कर्म कर रहे हैं। एक मेहनत का कर्म कर रहा है, दूसरा मौज-मस्ती का। लेकिन इनमें हमें दोनों का फल भोगना पड़ेगा।


अच्छे फैसले करने वाला लड़का कल के दिन उसका जीवन एक सफल जीवन होगा। समाज में उसकी इज्जत होगी, परिवार में उसका सम्मान होगा। लेकिन बुरे फैसले करने वाला लड़का अपने जीवन में असफलता का दाग लगाएगा जो बुढ़ापे तक वह मिटा नहीं पाएगा। बुढ़ापे में जब उसके पास न पैसा होगा, न सेहत, न इज्जत, तब उसे अपने किए हुए कर्मों पर पछतावा होगा।


आज का कर्म, कल का भाग्य


इसलिए कहा जाता है - आज के कर्मों से ही कल के भाग्य का निर्माण होता है।


भाग्य कोई पहले से लिखी हुई किताब नहीं है। भाग्य तो रोज लिखा जाता है, हमारे कर्मों की कलम से। मानव कर्मों से नहीं छूट सकता, उसे इस जीवन में आकर कर्म तो करने ही होंगे। लेकिन फैसला उसका है, वह उसको परमात्मा के मार्ग में ले आए या संसार के रास्ते में।






परमात्मा के मार्ग में किए गए कर्मों से व्यक्ति का जीवन सफल हो जाता है। व्यक्ति की आज की स्थिति जैसी भी हो, उसे जिंदगी में कभी हताश नहीं होना चाहिए। वह परमात्मा जब तक सांस में है, तब तक वह स्वयं तुम्हारे लिए सब कर्मों को कर देगा। बस शर्त है परमात्मा को समर्पण और आपका परमात्मा के लिए उठाया एक कदम।


तुम एक कदम परमात्मा की तरफ बढ़ाओ, परमात्मा दस कदम तुम्हारी तरफ बढ़ाएगा।


गीता का संदेश


इसी बात को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन से कितने सरल शब्दों में कहा है:


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।






भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य का नियंत्रण केवल अपने प्रयासों और कर्तव्यों (कर्म) पर होता है। परिणाम या फल क्या मिलेगा, यह हमारे हाथ में नहीं होता है। इसलिए फल की चिंता किए बिना अपना काम करना चाहिए।


कर्म का फल ही हेतु बनकर कर्म न करो और न ही अकर्मण्यता में आसक्त होओ।


अंत में बस यही कहूंगा - कर्म से मत भागो। कर्म को ही अपनी पूजा बना लो। क्योंकि तुम्हारा कर्म ही तुम्हारी पहचान है और तुम्हारा कर्म ही तुम्हारा भाग्य है।

कर्मों के चार प्रकार - जिनसे कोई भी नहीं बच सकता











संसार बिना कर्मों से नहीं चल सकता। कर्म ही इस सृष्टि का आधार है। संसार में जो भी परिणाम हमें प्राप्त होते हैं, वे सब कर्मों से ही प्राप्त होते हैं। हर एक व्यक्ति सुबह से शाम तक कर्मों को करने में ही लगा रहता है। कोई शरीर से कर्म कर रहा है, कोई मन से सोच रहा है, तो कोई वाणी से बोल रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये कर्म जाते कहाँ हैं? 




शास्त्रों के अनुसार हमारे सारे कर्म एक बैंक बैलेंस की तरह जमा होते रहते हैं। इसी को समझने के लिए हमारे ऋषियों ने कर्म को चार भागों में बाँटा है। अगर आप इन चारों को समझ गए, तो जीवन का आधा दुःख खत्म हो जाएगा।




1. संचित कर्म - कर्मों का गोदाम



संचित कर्म हमारे पिछले सभी जन्मों और इस जन्म के किए गए अच्छे-बुरे कर्मों का विशाल संग्रह है। जो भी कर्म हमारे द्वारा जाने-अनजाने में पिछले जन्मों या इस जन्म में किए जाते हैं और जिसका फल अभी तक हमें प्राप्त नहीं हुआ है, वह सब संचित कर्म में जमा हो जाता है।




इसे ऐसे समझो जैसे एक बहुत बड़ा गोदाम हो जिसमें तुम्हारे अनंत जन्मों के कर्मों की बोरियाँ भरी पड़ी हैं। हमें याद भी नहीं कि हमने पिछले जन्म में क्या किया था, लेकिन उसका हिसाब प्रकृति के पास पूरा है। यही कारण है कि दो बच्चे एक ही घर में पैदा होते हैं, एक सुखी रहता है और एक दुखी। यह संचित कर्मों का ही खेल है। यह गोदाम इतना बड़ा है कि इसे एक जीवन में भोगना संभव नहीं है।




2. प्रारब्ध कर्म - जो भोगना ही पड़ेगा



प्रारब्ध कर्म संचित कर्मों का ही वह हिस्सा है जो इस जन्म में फल देने के लिए तैयार हो चुका है। ये हमारे सामने सुख-दुख, गरीबी-अमीरी, स्वास्थ्य-रोग और परिवार के रूप में परिणाम बनकर आ चुके हैं।




इन कर्मों के ऊपर किसी भी व्यक्ति की इच्छा नहीं चलती। इसे आपको भोगना ही पड़ेगा। जैसे तीर कमान से निकल चुका है, अब उसे वापस नहीं बुलाया जा सकता। आपका जन्म कहाँ होगा, आपके माता-पिता कौन होंगे, आपको कौन सी बीमारी लगेगी - यह सब प्रारब्ध है।ऐसे कर्मों में पछताने में कोई फायदा नहीं है।




इसीलिए ज्ञानी लोग प्रारब्ध पर रोते नहीं हैं। वे जानते हैं कि यह तो पिछले हिसाब की वसूली है। इसे हँसते-हँसते भोग लो तो नया कर्म नहीं बनेगा, रो-रो कर भोगोगे तो मन में फिर से नया अहंकार पैदा हो जाएगा।वास्तव में जिसने परमात्मा को धन्यवाद देने की कला सीख ली वही प्रारब्ध कर्मों को बिना किसी पीड़ा के सह सकता है।




3. क्रियमाण कर्म - जहाँ आप मालिक हैं



ये ऐसे कर्म हैं जिन्हें व्यक्ति वर्तमान काल में कर रहा है। इसे ही शास्त्रों में क्रियमाण कर्म कहा गया है। तुम इसे कीर्तिमान कर्म भी कह सकते हो।




यही एकमात्र कर्म है जो पूरी तरह तुम्हारी इच्छा और तुम्हारे पुरुषार्थ पर निर्भर करता है। प्रारब्ध को तुम नहीं बदल सकते, संचित को तुम अभी नहीं देख सकते, लेकिन क्रियमाण तुम्हारे हाथ में है।




यही कर्म तुम्हारी कल की स्थिति को बदलने में सक्षम है। अगर व्यक्ति आज सही कर्म करे - सत्य बोले, किसी की मदद करे, अपने अहंकार को छोड़े - तो इसका परिणाम भविष्य में सुख के रूप में आएगा। लेकिन अगर व्यक्ति आज भी गलत कर्म करे - झूठ, छल, हिंसा - तो इसका परिणाम दुख के रूप में प्राप्त होगा ही।




इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति हर पल यह ध्यान रखता है कि वह अभी क्या कर रहा है। क्योंकि यही आज का कर्म कल का प्रारब्ध बनेगा।




4. आगामी कर्म - भविष्य का बीज*



आगामी कर्म वे कर्म हैं जो क्रियमाण कर्मों से उत्पन्न होते हैं। वर्तमान के कर्मों का फल जो भविष्य में मिलने वाला है, वही आगामी कर्म है।




आज तुमने जो बोया है, कल वही काटना पड़ेगा। भविष्य में जो भी परिस्थितियाँ व्यक्ति के सामने आएँगी, वह आज के किए गए कर्मों का ही फल है। अगर तुम आज किसी को दुख देते हो, तो यह बीज आगामी बनकर तुम्हारे संचित में जमा हो जाएगा और समय आने पर प्रारब्ध बनकर तुम्हें दुख देगा।




तो फिर मुक्ति कैसे मिले?



संसार में जितने भी लोग परमात्मा को प्राप्त हुए हैं, जैसे कबीर, नानक, बुद्ध, वे कर्मों के जाल से पार हो गए। उन्होंने परमात्मा के कर्म के सिद्धांत को कहीं न कहीं तोड़ डाला। वे कर्म तो करते थे, लेकिन कर्ता नहीं बनते थे।


ऐसे ही व्यक्ति अवधूत कहे जा सकते है


बिना अवधूत हुए कर्मों से पार नहीं जा सकते। जितने भी कर्म हैं, वे व्यक्ति के अहंकार के कारण बंधन बनते हैं, क्योंकि व्यक्ति सोचता है कि 'मैं करता हूँ'। इसी 'मैं' के कारण उसे सुख-दुख भोगना पड़ता है।




अगर संसार को छोड़ भी दिया जाए तो संसार के बाद भी ये अहंकार वश किए गए कर्म ही व्यक्ति को स्वर्ग के भोग और नर्क की यातनाएँ दिलाते हैं। स्वर्ग भी एक भोग है और नर्क भी एक भोग है, दोनों ही कर्मों का फल है।स्वर्ग में सुख तो है लेकिन सुखों के बाद दुखों में भी आना पड़ता है।अहंकार तो सुख दुख में ही घुमाता है।










अहंकार से मुक्ति


जो कर्म से मुक्ति चाहते हैं, उन्हें 'मैं' का जो अहंकार है उसको कहीं न कहीं छोड़ना पड़ेगा। जब तक 'मैं कर रहा हूँ' है, तब तक कर्म बंधेगा। और जब यह बोध हो जाए कि 'परमात्मा ही सब करा रहा है, मैं तो केवल एक माध्यम हूँ', उसी क्षण कर्म अकर्म बन जाता है।


और व्यक्ति अवधूत की तरह कर्महीन हो जाता है


करोड़ों लोग पृथ्वी पर मरते हैं, लेकिन जो व्यक्ति अहंकार छोड़ पाता है, वो जानता है कि मृत्यु तो घटती ही नहीं। शरीर मरता है, अहंकार मरता है, कर्म मरते हैं, लेकिन जो भीतर साक्षी है, वह कभी नहीं मरता। वास्तव में वही


 अवधूत है। वही परमात्मा का स्वरूप ही है।


उसी के लिए कर्मों को करते रहे न जाने की मै करता हु ।तू ही करता है ।मै कैसे कर सकता हु ।मै तो स्वयं सांस भी नहीं चलाता 


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भाइयो, आज की पोस्ट कैसी लगी? 🙏


आज मैंने कर्म पर लिखा है - कैसे हमारे आज के कर्म ही कल का भाग्य बनाते हैं।


आप सब एक बार पोस्ट ज़रूर पढ़ें और अपने कर्मों को परमात्मा के मार्ग में लगाएं।

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