सर्वत्र परब्रह्म है - माया से मुक्ति का एकमात्र उपाय

 सर्वत्र परब्रह्म है - इसी एक भावना में परमशांति है







संसार का सबसे बड़ा रहस्य क्या है? लोग कहते हैं धन पाना, पद पाना, स्वर्ग पाना। पर शास्त्र कहते हैं - सत्य को जान लेना। और सत्य क्या है? *सर्वत्र परब्रह्म है।*


जो दिख रहा है, जो नहीं दिख रहा, जो जाना जा चुका है, जो आगे जाना जाएगा और जो कभी नहीं जाना जा सकेगा - वह सब रूपों में केवल एक ही तत्व है - परब्रह्म परमात्मा।


परब्रह्म को सत्य जानने वाला माया के चंगुल में क्यों नहीं फंसता?


माया का खेल क्या है? माया द्वैत में फंसाती है। यह मेरा है, यह तेरा है, यह अच्छा है, यह बुरा है, यह सफलता है, यह असफलता है।

परब्रह्म की माया 

जब तक व्यक्ति संसार को सत्य मानता है, तब तक वह माया के जाल में है। क्योंकि संसार प्रतिक्षण बदल रहा है। आज जो सुख है कल दुःख बन जाएगा। आज जो अपना है कल पराया हो जाएगा।


परंतु जिस क्षण व्यक्ति ने जान लिया कि *संसार तीनों कालों में - भूत, वर्तमान, भविष्य में - न है, न था, न होगा।* जो है, वह केवल परमात्मा है जो अपनी ही माया द्वारा इस प्रकार का भास रहा है, उसी क्षण माया का जादू टूट जाता है।


जैसे रस्सी में सांप का भ्रम। जब तक अंधेरा है, रस्सी सांप लगती है और भय पैदा करती है। जिस क्षण प्रकाश हुआ और जाना कि यह तो रस्सी ही है, सांप तो कभी था ही नहीं, उसी क्षण सारा भय समाप्त।


वैसे ही जिसने जाना कि सर्वत्र परब्रह्म ही है, संसार तो केवल भास रहा है, उसके लिए माया रहती ही नहीं। माया उसको कैसे बांधे? माया तो उसी को बांधती है जो माया को सत्य मानता है।

Aatmyani ka bhav

सर्वत्र परब्रह्म को जानने वाला नीच योनियों में क्यों नहीं जाता?


गीता कहती है - यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। अंत में जैसी भावना वैसी गति।


जो जीवन भर शरीर को, धन को, वासना को, क्रोध को सत्य मानता है, मरते समय उसकी बुद्धि वहीं फंसी रहती है, और वही भावना उसे नीच योनियों में ले जाती है।


पर जिसने अभ्यास कर लिया कि सर्वत्र परब्रह्म है, उसकी बुद्धि ब्रह्माकार हो जाती है। वह उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते एक ही भाव में रहता है - सब परमात्मा है।


ऐसे व्यक्ति का पतन कैसे हो सकता है? वह तो जीते जी मुक्त है। शरीर छूटने पर वह शरीर नहीं छोड़ता, वह तो केवल परब्रह्म में लीन होता है। उसके लिए न स्वर्ग है न नरक, वह तो परमधाम का अधिकारी है।


मैं भी परब्रह्म हूँ - इस बोध से कमजोर भी महाशक्तिशाली बन जाता है


यह संसार का सबसे बड़ा मंत्र है - *अहं ब्रह्मास्मि।*


जिसने जान लिया कि मैं यह हाड़-मांस का पुतला नहीं, मैं भी वही परब्रह्म हूँ, वह असहाय होते हुए भी महासहाय हो जाता है। कमजोर होते हुए भी महाशक्तिशाली हो जाता है।


क्यों? क्योंकि अब तक वह अपनी छोटी शक्ति से लड़ रहा था। अब अनंत कोटि ब्रह्माण्ड का मालिक उसके साथ है, उसके पक्ष में है।






एक मात्र परब्रह्म परमात्मा की भावना रखने वाला संसार में किसी भी अवस्था में हो - वह निर्धन हो, अपमानित हो, रोगी हो - वह जानता है कि उसे परमशांति मिल चुकी है। उसे अब न किसी को पाने की इच्छा है, न त्यागने की। क्योंकि पाने और त्यागने को दूसरा कोई बचा ही नहीं, सब अपना ही स्वरूप है।


वह नरक में भी स्वर्ग में है


जिसकी भावना में यह बात दृढ़ हो चुकी है कि सर्वत्र परमात्मा है, वह चाहे नरक की जिंदगी जी रहा हो, वह वास्तव में स्वर्ग में ही है।


इंद्र को भी ऐसा सुख प्राप्त नहीं है, जैसा सुख सर्वत्र परब्रह्म की भावना रखने वाले को है। इंद्र का सुख भोगों पर टिका है, भोग मिटते ही सुख मिट जाता है। पर ब्रह्म-भावना वाले का सुख स्वयं पर टिका है, वह कभी मिटता ही नहीं।


उसके लिए एक पल भी यह भावना न बने कि संसार सत्य है। विपरीत परिस्थितियों में भी उसकी एक ही लौ चलती रहती है - परब्रह्म परमात्मा ही सत्य है। उसे किसी अन्य की जरूरत नहीं है। स्वयं अनंत कोटि ब्रह्मांड का मालिक उसकी ओर ध्यान लगाकर बैठा है।


क्या चाहिए और? जब सारी सृष्टि का मालिक तेरी ओर देख रहा हो, तो संसार के छोटे-मोटे सुख-दुख क्या करेंगे?


संसार नहीं है, जो हो रहा है होने दे


साधना क्या है? साधना यह नहीं कि संसार को ठीक कर दो। साधना यह है कि ध्यान में एक ही बात दृढ़ हो - *सर्वत्र परब्रह्म है, मैं भी नहीं हूँ।*








न धन चाहिए, न मान चाहिए, न ऐश्वर्य चाहिए, न पद चाहिए, न काम चाहिए, न इंद्रियों का कोई सुख चाहिए, न राज्य चाहिए। देवताओं को भी ऐसी परमशांति प्राप्त नहीं है, जैसी उस परमात्मा की सर्वत्र भावना रखने वाले को प्राप्त है, जिसने कभी संसार की माया को मन से स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि यही माना कि सर्वत्र परमात्मा है।


यह भावना कठिन क्यों है?


निःसंदेह परमात्मा की भावना रखना अत्यंत कठिन है। क्योंकि संसार उसको भुलाने में लग जाएगा। माया उसके द्वार पर बार-बार प्रहार करेगी। कलियुग उसको शत्रु मानेगा। संसार में जो कुछ वह चाहेगा, वह नहीं मिलेगा। सर्वत्र परब्रह्म है, यह मानने वाला अकेला पड़ जाएगा। लोग उसे पागल कहेंगे, साधु कहेंगे, नासमझ कहेंगे।


परंतु यही उसकी परीक्षा है। और इसी अकेलेपन में सबसे बड़ा रहस्य छुपा है - जब पूरा संसार उसे छोड़ देता है, तब स्वयं अनंत कोटि ब्रह्मांड का मालिक ही उसकी ओर ध्यान लगाकर बैठ जाता है।


तो छोड़ दो चिंता। संसार नहीं है। जो हो रहा है, होने दो। तुम बस एक ही भाव में स्थित रहो - सर्वत्र परब्रह्म है।


इसी एक भाव में सारे वेदों का सार, सारी  साधनाओं का फल और सारी मुक्ति का द्वार छुपा है।

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