शास्त्रों के अनुसार मोक्ष क्या है
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| Ancient Indian sage meditating in forest experiencing Moksha according to Upanishads, realizing Atman is Brahman, world appearing as dream, glowing Om symbol in sky, spiritual enlightenment concept |
हमने कुछ चुनिंदा सन्यासियों से मोक्ष के बारे में बात की, जो समाज से दूर जंगल और पहाड़ों में अकेले रहते हैं। उन सभी ने लगभग एक ही बात कही - मोक्ष कहीं भविष्य में मिलने वाली चीज नहीं है, वो तो अभी है, इसी क्षण में है। लेकिन आम लोग इसे ऐसे देखते हैं जैसे कोई बहुत बड़ी, असंभव सी चीज हो जिसे पाने के लिए कई जन्म लगेंगे।
सच तो यह है कि जीव अनेक कल्पों तक शरीर बदलता रहता है। कभी मनुष्य, कभी कुछ और। इस जन्म-मरण के चक्कर से जब छुटकारा मिल जाता है, तभी उसे मोक्ष कहा जाता है। इसीलिए भारतीय दर्शन में कहा गया है कि मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही है। मनुष्य योनि मिलना ही इस बात का संकेत है कि अब मोक्ष की संभावना बन गई है।
मोक्ष शब्द संस्कृत के 'मुच्' धातु से आया है, जिसका सीधा अर्थ है - बंधन से छूट जाना। यह मरने के बाद मिलने वाली कोई अवस्था नहीं है, बल्कि जीते-जी अनुभव की जाने वाली परम शांति है।
बड़े-बड़े सिद्ध ऋषि-मुनियों ने मोक्ष को परमात्मा को पा लेना नहीं कहा, बल्कि स्वयं का परमात्मा जैसा हो जाना कहा है। जब व्यक्ति उस अवस्था में पहुँचता है, तो फिर यह सवाल ही खत्म हो जाता है कि मैं ये हु और मुझे ये पाना है। वहाँ सिर्फ परमात्मा ही शेष रह जाता है, जो अपने आप में पूर्ण है। वहाँ न कोई इच्छा रहती है, न कोई अहंकार, बस शुद्ध शांति रहती है।
आइए जानते है कि उपनिषद की क्या मान्यताएं है
उपनिषदों ने मोक्ष का जो अर्थ बताया है, वह सबसे सीधा और सच्चा लगता है। उपनिषद कहते हैं कि मोक्ष कहीं दूर नहीं है।
जब तक मनुष्य खुद को सिर्फ शरीर समझकर जीता है, तब तक वह अपने पुराने संस्कारों में ही उलझा रहता है। उसे यह शरीर ही सत्य लगता है और यह दुनिया भी सत्य लगती है। यही उसकी सबसे बड़ी भूल है। परमब्रह्म की माया इतनी जटिल है कि इसे समझना आसान नहीं है।
जो व्यक्ति खुद को सिर्फ शरीर मानता है, वह इस माया से कभी बाहर नहीं निकल पाता। इससे वही निकल सकता है जो खुद को परमात्मा के रूप में देखना शुरू कर दे। यहाँ परमात्मा का मतलब किसी शरीर वाले भगवान से नहीं है। इसका मतलब उस अनंत चेतना से है जो हर जगह, हर समय मौजूद है। वह ऐसी सत्ता है जिसे शब्दों में ठीक-ठीक बताना मुश्किल है।
खुद को उसी चेतना के रूप में जान लेना ही असली मोक्ष है। जब किसी व्यक्ति के अंदर यह पक्का विश्वास बैठ जाता है कि मैं यह शरीर नहीं हूँ, मैं तो अनंत आत्मा हूँ, और उसका यह विश्वास इतना अटूट हो जाता है कि उसे यही एकमात्र सत्य लगने लगे, तब उसके लिए सब कुछ बदल जाता है।
फिर उसे यह सारा संसार एक सपने जैसा लगने लगता है। वह संसार में रहता तो है, पर उसमें उलझता नहीं। यही अवस्था है जहाँ व्यक्ति जीते-जी मोक्ष में ही होता है।
ईशावास्य उपनिषद में एक बहुत गहरा वचन आता है - ईशावास्यम् इदं सर्वम्, मतलब इस जगत में जो कुछ भी है, सब जगह वही परमात्मा है।
इसी का अगला मंत्र है - यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः, तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।
इसका सीधा अर्थ है कि जब ज्ञानी व्यक्ति को यह समझ आ जाती है कि यह पूरा चराचर जगत आत्मा ही है, परमात्मा ही है, तो फिर उसके लिए मोह और शोक बचता ही नहीं है।
जब तक आदमी इस जगत को ही सच्चा समझता है, तब तक वह मोह और शोक में फंसा रहता है, यही बंधन है। और जिस दिन उसे परमात्मा ही सच्चा दिखने लगता है, उसी दिन वह मोह-शोक से छूट जाता है, यही असली मोक्ष है।
छांदोग्य उपनिषद में उद्दालक और उसके बेटे श्वेतकेतु की एक बहुत सुंदर कथा आती है।
श्वेतकेतु सारे वेद, शास्त्र पढ़कर घर लौटा। पढ़ाई का उसे बड़ा अहंकार हो गया था। पिता उद्दालक ने देखा तो पूछा, बेटा क्या तूने उसको जाना है, जिसको जानने से अनसुना भी सुना हुआ हो जाता है, अनसोचा भी सोचा हुआ हो जाता है और अनजाना भी जाना हुआ हो जाता है?
यह सुनकर श्वेतकेतु एकदम चुप हो गया। उसे इसका जवाब नहीं आता था।
तब पिता ने उसे बहुत सरल उदाहरण से समझाया। बोले, जैसे मिट्टी से बनने वाली सुराही, घड़ा, कुल्हड़ देखने में अलग-अलग लगते हैं, पर असल में सब मिट्टी ही हैं। लोहे से बनी तलवार, चाकू, कील सब अलग दिखते हैं, पर हैं तो लोहा ही। सोने के हार, कंगन, अंगूठी अलग-अलग हैं, पर हैं तो सोना ही।
वैसे ही इस दुनिया में जो कुछ भी दिख रहा है, वह सब एक ही सत्य से बना है। बाकी सब तो सिर्फ नाम और रूप का खेल है, वाणी का विकार है।
फिर उद्दालक ने कहा, देखो एक छोटे से बीज से एक बड़ा पेड़ बनता है। उस पेड़ पर हजारों बीज लगते हैं और उन हजारों बीजों से हजारों पेड़ बन जाते हैं। यह सिलसिला अनंत तक खत्म नहीं होता। वैसे ही एक ही अद्वितीय सत्य परमात्मा से ही अनंत ब्रह्मांड बने हैं।
और बेटा, वह अद्वितीय सत्य कोई और नहीं, तुम ही हो। तुम ही वह हो। ऐसा जान लेना ही मोक्ष है।
मोक्ष को उपलब्ध होना ही परमात्मा होना है ऐसा नहीं है मोक्ष तो है ही नहीं बंधन ही नहीं है जिसमें बंधन की सम्भावना हो वो परमात्मा नहीं हो सकता जब स्वयं परमात्मा ही है फिर मोक्ष सिर्फ काल्पनिक हो जाता है
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| Katha Upanishad story of young Nachiketa standing before Yamraj Lord of Death, Yamraj offering gold palaces and treasures, Nachiketa rejecting worldly pleasures asking for Brahma Gyan, Indian mythological art |
कठ उपनिषद में नचिकेता और यमराज का संवाद बहुत प्रसिद्ध है। यमराज नचिकेता के सामने दो रास्ते रखते हैं - एक श्रेय और दूसरा प्रेय।
श्रेय वो रास्ता है जो कल्याण करता है, भले ही शुरू में कठिन लगे। और प्रेय वो रास्ता है जो सुनने में मीठा लगता है, इंद्रियों को अच्छा लगता है, पर आखिर में बांध लेता है।
यमराज नचिकेता को परखने के लिए तरह-तरह के लालच देते हैं। वे कहते हैं, तुम सारे भू-मंडल का राज्य ले लो, सोने-चांदी के महल ले लो, ऐसी सुंदर स्त्रियाँ ले लो जो पृथ्वी पर कहीं नहीं मिलतीं, सैकड़ों साल की उम्र ले लो, जो भी भोग चाहिए मांग लो। पर नचिकेता इन सबको ठुकरा देता है। वह कहता है, ये सब चीजें तो आज हैं, कल नहीं रहेंगी। इनसे मेरी प्यास नहीं बुझेगी। मुझे तो वह ज्ञान चाहिए जो मृत्यु के पार है, जहाँ केवल परमात्मा ही शेष रहता है।
नचिकेता की इस बात से यमराज बहुत प्रसन्न होते हैं। वे समझ जाते हैं कि यह बच्चा सच में ब्रह्मज्ञान का अधिकारी है। तब वे उसे आत्मा का ज्ञान देते हैं।
इस कथा से हमें सिर्फ परमात्मा का ज्ञान ही नहीं मिलता, बल्कि एक और बड़ी बात सीखने को मिलती है - त्याग की शक्ति। परमात्मा को जानने के लिए इंद्रियों के भोगों को छोड़ने की हिम्मत चाहिए। जब तक हम आँख, कान, नाक, जीभ के सुखों के पीछे भागते रहेंगे, तब तक हम वहीं अटके रहेंगे। जहाँ इंद्रियाँ हैं, वहाँ परमात्मा नहीं टिकता। जहाँ मन हर समय भटक रहा है, वहाँ शांति नहीं आ सकती।
दरअसल मोक्ष उसी के लिए है जो बंधन में है। जो भोगों में फंसा है, वही तो छूटना चाहेगा। उपाय तभी तक करना पड़ता है, जब तक संसार के सुखों में रस आता है। जब तक संसार में रस है, तब तक आदमी बंधन में है, क्योंकि उसकी नजर में संसार ही सत्य है।
जिस दिन संसार के सुख फीके लगने लगते हैं, उसी दिन परमात्मा का रस मिलना शुरू होता है। जो जान जाता है कि परमात्मा ही सत्य है, वह फिर संसार के छोटे-मोटे सुखों में रस कैसे ले सकता है? यह तो बड़ा आश्चर्य होगा।
जिसने परमात्मा को सत्य जान लिया, वह संसार में सुख नहीं ढूंढता, वह तो खुद ही परम सुख बन जाता है। वह हर जगह उसी को देखता है। उसका जीना ही मोक्ष हो जाता है। वह मुक्त होकर भी इसी दुनिया में रहता है, पर दुनिया उसे बांध नहीं पाती। यही कठ उपनिषद का असली सार है।
अवधूत परम्परा का मत
भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि मोक्ष की जरूरत जीव को ही है, परमात्मा को नहीं। क्योंकि बंधन में जीव है, परमात्मा तो कभी बंधन में आता ही नहीं।
जीव को मोक्ष के लिए उपाय करने पड़ते हैं - जैसे योग, ध्यान, तप, नाम जप, सत्संग। अगर इन उपायों से मोक्ष मिलता है तो जीव को ये जरूर करने चाहिए। पर यहाँ एक बात समझनी है कि जीव और परमात्मा में फर्क क्या है। परमात्मा का बंधन असंभव है, वह तो सदा मुक्त ही है।
कई लोग सोचते हैं कि अच्छे कर्म, दान, परोपकार, करुणा करने से मोक्ष मिल जाएगा। पर मोक्ष इन सबसे भी नहीं मिलता। ये अच्छे कर्म पुण्य तो देते हैं, पर मोक्ष नहीं। और यह भी नहीं है कि मोक्ष किसी खास व्यक्ति को ही मिलेगा। इसमें कोई भेदभाव नहीं है। इसमें एक चाण्डाल भी उतना ही हकदार है जितना कोई पंडित।
असली बंधन क्या है? खुद को शरीर मान लेना ही बंधन है। और असली मोक्ष क्या है? खुद को परमात्मा का स्वरूप जान लेना ही मोक्ष है। इसे कोई भी अपने पुरुषार्थ से पा सकता है, क्योंकि परमात्मा में कोई भेद नहीं है।
कई बार शास्त्र पढ़ने वाला भी शास्त्रों में ही बंध जाता है। किताबें रट लेता है, पर मुक्त नहीं होता। मुक्त वही होता है जिसके अंदर परमात्मा के लिए सच्चा प्रेम जाग गया हो। इसलिए असली सवाल ज्ञान का नहीं, प्रेम का है। ज्ञान तो सिर में रहता है, प्रेम दिल में उतर जाता है।
हमने अपने अनुभव से भी यही जाना है, संतों के वचन भी यही कहते हैं और ऋषियों का प्रमाण भी यही है। मोक्ष तो जीव के लिए है। जो खुद को परमात्मा ही जान लेता है, उसके लिए कोई मोक्ष नहीं, वह तो सदा से मोक्ष में ही है।
परमात्मा का स्वरूप है वो परमसुख में ही है वो मोक्ष में ही है
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