शास्त्रों से परमात्मा नहीं मिलता

 शास्त्रों को पढ़ने से जीवन में परमात्मा घटित नहीं होता 



।शास्त्रों में मिलने  वाला ज्ञान तब तक कुछ काम नहीं आता ।जब तक उस ज्ञान में संदेह हो । शास्त्र सम्मत बुद्धि होने से व्यक्ति पंडित की तरह मंत्रों को बोल तो सकता है।लेकिन उस मंत्र का अर्थ उसके अंदर प्रकट होने में जो भाव चाहिए उसका अभाव ही उसमें परमात्तत्व से दूर ही रखता है।गीता ,वेद , उपनिषद का ज्ञान तभी पूर्ण रूप से समझ आता है।जब व्यक्ति को अन्य विचारों में उतना रस न हो जितना सत्य को जानने में । आधुनिक समाज में सत्य को लेकर जो प्यास है ।उसमें जो कमी है उसके चलते कर्मकांड ,धार्मिक अनुष्ठानों,पाखण्डी बाबाओ में लोगों की ज्यादा रुचि है।शास्त्रों में सत्य नहीं है ।वह केवल सत्य को दिखाने का एक मार्ग है।जिसमें हर कोई नहीं चल पाता ।जिन्होंने भी शास्त्रों को लिखा वह सत्य को उपलब्ध हुए व्यक्ति थे ।जिनमें परमात्मा को जानने की जो आग थी वह शास्त्रों को पढ़ने वाले में नहीं है।वहा परमात्मा की बाते करता है।लेकिन उसमें उसे आज भी वह आग नहीं जो उसका जीवन परमात्मा को प्राप्त करने में लगा दे 

गीता पढ़ने वाला कृष्ण की तरह अपने जीवन में कभी धर्म के मार्ग में चलने का साहस नहीं कर पाया।अष्टावक्र गीता पढ़ने वाला आज भी अपने समाज को ही सत्य मानने में और उस समाज के अनुसार अपने जीवन को जीता है।वेदों को पढ़ने वाला आज अपने जीवन में कभी मन्त्र पड़ने के अलावा अपने जीवन में अकेले चलने का साहस खो चुका है।उपनिषद भी जिसने पढ़े वह भी परमात्मा ही सर्वत्र है ऐसे भावना करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।



 यह एक बहुत बड़ा भ्रम है जो आज के पंडित और पढ़े-लिखे समाज में फैला हुआ है। हम सोचते हैं कि गीता पढ़ ली, वेद पढ़ लिए, उपनिषद कंठस्थ कर लिए तो हम ज्ञानी हो गए। लेकिन शास्त्रों में मिलने वाला ज्ञान तब तक कुछ काम नहीं आता, जब तक उस ज्ञान में संदेह जीवित है।


जब तक भीतर संदेह है, तब तक शास्त्र का ज्ञान सिर्फ बोझ है। वह तुम्हें और अहंकारी बना देता है। तुम दूसरों को समझाने लगते हो, लेकिन स्वयं उस ज्ञान को जी नहीं पाते।


शास्त्र सम्मत बुद्धि होने से व्यक्ति पंडित की तरह मंत्रों को तो बोल सकता है। वह संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण एकदम शुद्ध करेगा। गीता के अध्याय उसे याद होंगे। लेकिन उस मंत्र का अर्थ उसके अंदर प्रकट होने में जो भाव चाहिए, उसका अभाव ही उसे परम तत्व से दूर रखता है। मंत्र तो केवल शब्द हैं, असली बात तो भाव की है। भाव नहीं है तो मंत्र लाश की तरह है।


गीता, वेद, उपनिषद का ज्ञान तभी पूर्ण रूप से समझ आता है, जब व्यक्ति को अन्य विचारों में उतना रस न हो जितना सत्य को जानने में हो। जब तुम्हें संसार की बातों में, निंदा में, मनोरंजन में रस आ रहा है, तो तुम गीता को कैसे समझोगे? गीता को समझने के लिए वैराग्य चाहिए। वेद को समझने के लिए एकांत में चलने का साहस चाहिए।


आधुनिक समाज और सत्य की प्यास


आधुनिक समाज में सत्य को लेकर जो प्यास होनी चाहिए, उसमें बहुत कमी है। लोग सत्य को जानना ही नहीं चाहते। लोग चाहते हैं कि कोई बाबा आकर कह दे कि 100 रुपये की पूजा करवा लो और तुम्हारे सारे पाप कट जाएंगे। इसीलिए आज कर्मकांड, धार्मिक अनुष्ठानों, और पाखंडी बाबाओं में लोगों की ज्यादा रुचि है।


लोगों को लगता है कि अगरबत्ती घुमा दी, घंटी बजा दी, तो परमात्मा प्रसन्न हो गया। लेकिन परमात्मा इतना सस्ता नहीं है। परमात्मा को पाने के लिए तो खुद को ही मिटाना पड़ता है।


शास्त्रों में सत्य नहीं है। यह बात बहुत गहरी है। शास्त्र केवल सत्य को दिखाने का एक मार्ग हैं, एक इशारा हैं। जैसे उंगली चांद की तरफ इशारा करती है, लेकिन उंगली चांद नहीं है। वैसे ही वेद और गीता उस परमात्मा की तरफ इशारा करते हैं, लेकिन वे स्वयं परमात्मा नहीं हैं। और इस इशारे को हर कोई नहीं समझ पाता। सब उंगली को ही पकड़ कर बैठ जाते हैं, चांद तक कोई देखता ही नहीं।


जिन्होंने भी शास्त्रों को लिखा था, वे सत्य को उपलब्ध हुए व्यक्ति थे। वाल्मीकि, वेदव्यास, कृष्ण, अष्टावक्र - ये सब ज्ञानी नहीं थे, ये सत्य को जीने वाले थे। जिनमें परमात्मा को जानने की जो आग थी, जो विरह था, वह आग आज शास्त्रों को पढ़ने वाले में नहीं है। आज का पंडित परमात्मा की बातें तो करता है, बड़े-बड़े प्रवचन देता है, लेकिन उसमें आज भी वह आग नहीं है जो उसका पूरा जीवन परमात्मा को प्राप्त करने में लगा दे।


शास्त्र पढ़ने वालों की वास्तविकता


गीता पढ़ने वाला व्यक्ति आज कृष्ण की तरह अपने जीवन में कभी धर्म के मार्ग पर चलने का साहस नहीं कर पाया। गीता में कृष्ण कहते हैं - युद्ध कर। धर्म के लिए खड़ा हो। लेकिन गीता पढ़ने वाला आज अधर्म देखकर भी चुप रहता है। उसे डर लगता है कि समाज क्या कहेगा।


अष्टावक्र गीता पढ़ने वाला आज भी अपने समाज को ही सत्य मानने में लगा है। अष्टावक्र कहते हैं - तू मुक्त है, तू साक्षी है। लेकिन वह व्यक्ति आज भी अपनी जाति, अपने परिवार, अपने समाज के अनुसार ही अपने जीवन को जीता है। वह मुक्ति की बात करता है, लेकिन मुक्ति को जीता नहीं है।


वेदों को पढ़ने वाला आज अपने जीवन में मंत्र पढ़ने के अलावा अकेले चलने का साहस खो चुका है। वेद कहते हैं - एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति। अकेले चलो। लेकिन वेद पढ़ने वाला भीड़ में ही सुरक्षित महसूस करता है।


उपनिषद भी जिसने पढ़े, वह भी 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' - परमात्मा ही सर्वत्र है, ऐसी भावना करने में स्वयं को असमर्थ पाता है। वह मंदिर में तो परमात्मा देख लेता है, लेकिन अपने दुश्मन में परमात्मा नहीं देख पाता। अपने नौकर में परमात्मा नहीं देख पाता।


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फिर परमात्मा को प्राप्त करने में शास्त्रों को नहीं पढ़ा जाता ।उसकी कोई आवश्यकता नहीं है।जितना ज्ञान शास्त्रों में है  उतना अगर व्यक्ति के जीवन में स्वयं अनुभव में आए तो हो व्यक्ति अवधूत अवस्था को प्राप्त करने वाला होता है।जिसमें अज्ञान का बोध हों ओर उसमें अहंकार न हो न ही वो सांसारिक हो यानि जिसमें संसार में सुख प्राप्ति ही कोई इच्छा हो और जिसके सारे कर्म केवल परमात्मा को ही समर्पित हो और परमात्मा को प्राप्त करने के मार्ग में हो वही शास्त्रों से ऊपर उठ जाता है ।सारे शास्त्र उसमें स्वयं ही परमात्मा की कृपा से प्रकट हो जाते है।


तो फिर परमात्मा को प्राप्त करने के लिए क्या करें?


आत्मज्ञानी का भाव


परमात्मा को पाने का मार्ग




परमात्मा को प्राप्त करने के लिए शास्त्रों को नहीं पढ़ा जाता। उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। यह सुनने में अजीब लगेगा, लेकिन यही सत्य है। शास्त्र जरूरी नहीं हैं, अनुभव जरूरी है।






अवधूत की पहचान क्या है? पहला - जिसमें अज्ञान का बोध हो। उसे पता चल गया हो कि मैं कुछ नहीं जानता। पंडित कहता है मैं सब जानता हूं, अवधूत कहता है मैं कुछ नहीं जानता।




दूसरा - उसमें अहंकार न हो। ज्ञान का अहंकार सबसे खतरनाक अहंकार है।




तीसरा - वह सांसारिक न हो। यानी जिसमें संसार में सुख प्राप्ति की कोई इच्छा न बची हो। वह संसार में रहता है, लेकिन संसार उसके अंदर नहीं रहता।






और चौथा - जिसके सारे कर्म केवल परमात्मा को ही समर्पित हों और परमात्मा को प्राप्त करने के मार्ग में हों। वह खाना भी खाए तो परमात्मा के लिए, वह बोले तो परमात्मा के लिए।



आत्मज्ञानी कैसे होता है

वही व्यक्ति शास्त्रों से ऊपर उठ जाता है। और आश्चर्य की बात यह है कि जब वह शास्त्रों से ऊपर उठ जाता है, तो सारे शास्त्र उसमें स्वयं ही परमात्मा की कृपा से प्रकट हो जाते हैं। उसे गीता पढ़ने की जरूरत नहीं, गीता उसके भीतर से बहने लगती है। उसे वेद याद करने की जरूरत नहीं, वेद उसकी वाणी बन जाते हैं।




इसलिए पढ़ो मत, जियो। शास्त्रों को रटो मत, अनुभव करो। परमात्मा


 किताबों में नहीं, तुम्हारे भीतर बैठा है।




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