अवधूत कौन हैं - अवधूत की संपूर्ण व्याख्या

अवधूत - आत्मा का वह परम स्वरूप जो संसार से परे है








अवधूत ही वह व्यक्ति है जिसे आत्मज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी और तत्वज्ञानी के रूप में भी कहा जा सकता है। अवधूत कोई साधारण साधु, संत या योगी नहीं, वह तो चेतना की वह अंतिम अवस्था है जहाँ व्यक्ति का अहंकार पूरी तरह से गल जाता है और वह स्वयं ब्रह्म में लीन हो जाता है। जब कोई व्यक्ति अवधूत अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तो उसके लिए संसार का ह्रास हो जाता है। संसार तो रहता है, लोग रहते हैं, कार्य रहते हैं, पर उसके भीतर संसार के प्रति जो आसक्ति थी, वह समाप्त हो जाती है और वो चैतन्य स्वरूप परमात्मा में विद्यमान हो जाता है।उसके लिए परमात्मा ही  सत्य और सर्वत्र है

परमात्मा हीं सर्वत्र है

अवधूत का न तो कोई अपना है और न पराया। उसके लिए अपना-पराया का भेद मिट चुका होता है। जैसे आकाश के लिए यह नहीं कहा जा सकता कि यह इस घर का है और उस घर का नहीं, वैसे ही अवधूत की चेतना सबमें समान रूप से व्याप्त है। उसे न किसी से मोह है, न किसी से उसे कुछ पाने की आशा है। मोह और आशा दोनों ही मन के बंधन हैं, और अवधूत का मन तो कब का परमात्मा में विलीन हो चुका है। फिर वह किससे मोह करेगा और किससे आशा रखेगा? अवधूत न तो ज्ञानी या न अज्ञानी वहा इन दोनों से परे है।वहा स्वयं में ही सुख जानता है।उसे संसार में सुख नहीं दिखता ।वहा आपको हाड मास का शरीर दिख सकता है लेकिन उसमें शरीर का कोई भाव नहीं वहा स्वयं शरीर नहीं अन्नत आत्मा ही जानता है।इसलिए वो ध्यान भी नहीं करता।


वह न तो किसी से प्रेम करता है न ही किसी से घृणा। यहाँ प्रेम का अर्थ सांसारिक राग-द्वेष वाला प्रेम नहीं, बल्कि समता का भाव है। वह सबमें उसी एक परमात्मा को देखता है, इसलिए घृणा का तो प्रश्न ही नहीं उठता और आसक्ति वाला प्रेम भी नहीं बचता। उसमें किसी को लेकर कोई विचार नहीं चलता। वह न किसी प्रकार की आपत्ति करता है, न किसी का विरोध। न वह किसी से सहमत है और न असहमत। सहमति-असहमति भी मन के खेल हैं। अवधूत तो मौन में ही स्वयं को सहज कर पाता है। उसका मौन बाहर का नहीं, भीतर का मौन है। जहाँ विचारों का कोलाहल शांत हो गया हो।

वह भविष्य में क्या होगा इस बात की चिंता से परे है।वहा परमात्मा को प्राप्त है इसलिए किसी प्रकार की सांसारिक इच्छा से परे है।

उसे न तो संसार से कोई मतलब है, न वह संसार की बातों में रुचि रखता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह संसार से भाग जाता है। वह संसार में ही रहता है, पर संसार उसमें नहीं रहता। जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से अलिप्त रहता है, वैसे ही अवधूत। वह तो बस जो सामने आ जाता है, उसे ही कर लेता है। जहाँ जो होता है, अवधूत उन सबमें अपने कर्म को ही करता जाता है, बिना किसी कर्ता भाव के। उसके लिए छोटा-बड़ा, ऊँचा-नीचा कोई कार्य नहीं। शौचालय साफ करना हो या यज्ञ कराना हो, दोनों में उसकी सम दृष्टि है।

आत्मज्ञानी का भाव

अवधूत का न तो मन है, न कोई शरीर है, इस भाव में। शरीर तो दिखता है, पर वह शरीर को "मैं" नहीं मानता। उसे संसार में लोगों द्वारा दिखाई पड़ने और लोगों से मान-सम्मान की कोई इच्छा नहीं है। मान-अपमान, निंदा-स्तुति उसके लिए हवा के झोंकों जैसे हैं, आते हैं और चले जाते हैं। उसका मन संसार में लगता ही नहीं, उसका मन केवल परमात्मा को ही समर्पित है। वह कोई भी कार्य कर ले, उसमें उसका अहंकार बाधा नहीं देता। वह "मैंने किया" इस भाव से कोई कार्य नहीं करता। वह तो निमित्त मात्र बनकर कार्य करता है।


अवधूत दुखों में भी कभी स्वयं को दीन-हीन नहीं पाता, न ही वह किसी के सामने याचना करता है, न वह किसी से मदद की आशा रखता है। क्योंकि वह जानता है कि निश्चित ही परमात्मा ही उसका एकमात्र मददगार है। संसार के लोग तो माध्यम बन सकते हैं, पर करने वाला तो वही एक है। इसलिए वह न किसी के आगे हाथ फैलाता है, न किसी से कोई शिकायत।


यदि अवधूत पिछले जन्मों के बुरे कर्मों का फल प्राप्त भी करता है, तो अहंभाव के विलीन हो जाने से उनका फल बड़ा हल्का लगता है। यह अवधूत की महिमा है। कहते हैं कि यदि सामान्य व्यक्ति पर पत्थर की बोरी गिरने वाली हो, तो अवधूत पर वही बोरी गिरे तो उसका भार रुई की बोरी जितना ही प्रतीत होता है। ऐसा इसलिए नहीं कि कर्म का फल बदल जाता है, बल्कि इसलिए कि भोगने वाला "मैं" ही नहीं बचा। जब भोक्ता ही नहीं, तो दुख किसे होगा?

अवधूत पाप भी कर ले लेकिन पाप में जो रस है अहंभाव न होने से उसमें पाप भी पुण्य हो जाता है।यानि वो चोरी भी कर ले उसमें वो मै का भाव है अवधूत का न होने से स्वयं परमात्मा ही है जिससे उसे दुख प्राप्त नहीं होता 

कर्म सिद्धांत अवधूत पर असर नहीं करता। कर्म सिद्धांत तो मन और अहंकार के लिए है। जहाँ "मैं कर्ता हूँ" का भाव है, वहीं कर्म बंधन बनता है। अवधूत में यह भाव ही नहीं है, इसलिए कर्म उसके लिए बंधन नहीं, लीला बन जाता है। वह कर्म करता हुआ भी अकर्मा है।


इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है - "अवधूत: निंदातीत:।" वह निंदा से परे है, स्तुति से परे है, विधि-निषेध से परे है। वह स्वयं में ही पूर्ण है, आप्तकाम है। ऐसा अवधूत ही सच्चा गुरु है, सच्चा ब्रह्मज्ञानी है।

अवधूत में किसी प्रकार का न  अपराधबोध है न उसमें किसी से स्वयं को बेहतर मानने अहंकार।अवधूत स्वयं को देखकर क्या नहीं है या क्या पाया जा सकता है इस तरह के बंधन से पार है वहा स्वयं को समाज से हटकर अपने आप को अकेले कर देता है उसे मित्र बनाने में कोई रुचि नहीं है निश्चय ही परमात्मा ही उसका मित्र है। वहा माता पिता की आराधना नहीं करता है ।वहा केवल सत्य मार्ग में ही चलता है ।उसे धन पद महंगी वस्तुओं का कोई पता नहीं अथवा उनके चले जाने पर भी वो दुख को नहीं पाता




अवधूत न कोई अवतार है न कोई भक्त न वो एक दार्शनिक है न वो संत ।न ही वो किसी सम्प्रदाय या किसी भगवान को ही पुजता है उसमें धर्मों का आभाव है उसके लिए न धर्म है न अधर्म अवधूत सब केवल परमात्मा की माया जानता है


अवधूत परमात्मा रूप ही है उससे

पहले न तो कोई है न उसके बाद है वहीं सृष्टिकर्ता है वही सृष्टि का विनाश करने वाला।इसलिए अवधूत तो एक परमात्मा  का  संसार को दिया गया प्रसाद ही है

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट