दुख ही तो है जो परमात्मा से मिलाता है - जीवन का सबसे बड़ा सत्य
दुख ही तो है जो परमात्मा से मिलाता है - जीवन का सबसे बड़ा सत्य
जीवन में कई सवाल होते हैं। ये सवाल तब और बढ़ जाते हैं जब व्यक्ति को अपने सामने कुछ भी दिखाई नहीं देता। एकदम भविष्य अंधकारमय नजर आता है। व्यक्ति परेशानी में देखता है कि कौन अपना है और कौन पराया है।
जब व्यक्ति के पास कुछ नहीं होता, तब उसे असली सच्चाई दिखाई देती है। तब वह देखता है कि लोगों ने तो उसे सिर्फ इस वजह से चाहा था कि उससे बदले में क्या मिलेगा।
सुख में हम परमात्मा को भूल क्यों जाते हैं?
सुख में तो दूसरे लोग आस-पास भीड़ बनाकर खड़े रहते हैं। सुख में व्यक्ति परमात्मा को नहीं देख पाता। सुख में व्यक्ति का अहंकार पोषित होता है। वहाँ सुख में सबसे पहले परमात्मा को ही भूल जाता है।
हम सोचते हैं कि ये सुख, ये पैसा, ये इज्जत सब मेरी मेहनत से है। यहीं से अहंकार जन्म लेता है और यहीं से हम परमात्मा से दूर हो जाते हैं। अवधूत गीता में कहा गया है कि जब तक मन में "मैं कर रहा हूँ" का भाव है, तब तक परमात्मा का अनुभव नहीं हो सकता।
*और जब दुखों का पहाड़ गिरता है तब क्या होता है?*
और जब व्यक्ति पर दुखों का पहाड़ गिरता है, तब उसकी आँखें खुलती हैं। वहाँ वह देखता है कि परमात्मा तो उसके पास ही था, लेकिन उसने ही उसे भुला दिया था।
वहाँ वह देखता है कि संसार आज तक किसी का हुआ ही नहीं है। यहाँ आस-पास सब मतलब की यारी चलती है। केवल परमात्मा ही है जो हमारा उद्धार चाहता है।
उस परमात्मा की कृपा तो हर समय बरस ही रही थी, लेकिन व्यक्ति उस कृपा के नीचे संसार के सुखों का छाता लेकर खड़ा था। जिससे उसकी कृपा की बूंदें उसकी आत्मा में नहीं बरस रही थीं।
दुखों में ही सुखों का वह छाता छूटता है। तब व्यक्ति देखता है कि परमात्मा तो कितना कृपालु है, वह कितना बड़ा दया करने वाला है। व्यक्ति के सारे पापों को उसने गिना ही नहीं, बल्कि जिसने भी उसकी शरण ली, उसने उसको अपना लिया।
सच तो यह है कि संसार में दुख न हो तो लोग परमात्मा का नाम तक न लें।
दुख में ही आत्मा निखरती है
दुख में ही व्यक्ति की आत्मा निखरती है। वहाँ वह देखता है कि शरीर तो एक दिन छूटने वाला है। आत्मा जो उस परमात्मा का अंश है, उसी के लिए अब व्यक्ति के सारे कर्म होते हैं।
सुख में हम शरीर के लिए जीते हैं - अच्छा खाना, अच्छे कपड़े, अच्छा घर। लेकिन दुख में हम आत्मा के लिए जीना सीख जाते हैं।
वहाँ दुख में ही परमात्मा की शरण ली जा सकती है, सुख में नहीं। क्योंकि सुख में तो मन बाहर भागता है और दुख में मन अंदर की ओर मुड़ता है।
जितने ज्यादा दुख व्यक्ति के जीवन में आते हैं, वह उतना ही ज्यादा परमात्मा के करीब और संसार से दूर होता जाता है। दुख में सब कुछ छूट जाए तो भी व्यक्ति जानता है कि परमात्मा तो है। जिसने उसे कभी नहीं छोड़ा, बल्कि परमात्मा को तो उसने ही छोड़ दिया था। वहाँ दुख में व्यक्ति परमात्मा को भूल ही नहीं पाता।
हे मेरे दुख, तेरा धन्यवाद
इसीलिए ज्ञानी जन कहते हैं - "हाय दुख, जिसने मुझे परमात्मा की शरण दे दी। हाय मेरे दुख, तू न होता तो मैं संसार की माया का दास बन जाता और परमात्मा को याद तक न करता।"
कहते हैं कि परमात्मा तुम्हें दुख इसीलिए देता है क्योंकि वह चाहता है कि तुम उस परमात्मा की शरण लो। वह तुम्हें जगाना चाहता है। वह देख रहा है कि तुम सुखों के खिलौनों में खो गए हो।
संसार तो एक दिन मिट जाएगा, यह शरीर मिट जाएगा, यह पैसा, यह रिश्ते सब मिट जाएंगे, लेकिन परमात्मा तो मिटने से रहा। वह तो अविनाशी है।
दुख को धन्यवाद देने की कला
जिस व्यक्ति को दुख में भी परमात्मा को धन्यवाद देने की कला आ गई, उसने ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया।
जब अगली बार जीवन में दुख आए तो रोना मत, शिकायत मत करना। बस हाथ जोड़कर कहना - "हे परमात्मा, धन्यवाद, आपने मुझे याद किया, आपने मुझे अपनी शरण में बुलाया।"
क्योंकि दुख सजा नहीं है, दु
ख तो परमात्मा का बुलावा है।
भोग से योग की ओर - एक विचार
संसार के भोगों में मन का लगना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि परमात्मा अभी हमसे दूर है। संसार के जितने भी भोग हैं, वे सब जीव को परमात्मा से दूर ले जाने वाले ही हैं। जब तक मन इन्द्रियों के विषयों में उलझा रहेगा, तब तक परमात्मा की ओर बढ़ना संभव नहीं हो सकता।
भोग क्यों दुख देते हैं ?
भाई एक बात बताऊं, मैं भी पहले सोचता था भोग में ही मजा है। अच्छा खाना, घूमना, नया फोन। पर हुआ क्या, जब सब मिल गया तो भी मन खाली।
क्यों? क्योंकि भोग में एक लोचा है।
मान लो तुमको गुलाब जामुन बहुत पसंद है। 1 खाओगे, मजा आएगा। 2 खाओगे, फिर भी ठीक है। 5 खा लोगे तो पेट दुखेगा। वही गुलाब जामुन जो सुख दे रहा था, वही दुख देने लगा।
भोग भी ऐसा ही है। शुरू में मीठा लगता है, बाद में चिपक जाता है। और जो चीज चिपक जाए वही दुख देती है।
तो फिर क्या करें ? क्या सब छोड़ दें ?
नहीं भाई, छोड़ना नहीं है।
मैं क्या करता हूं, बताता हूं। जब भी मन कुछ ज्यादा मांगता है, मैं बस 2 मिनट रुक जाता हूं। बस देखता हूं मन को। कुछ करता नहीं। 2 मिनट बाद मन खुद ही शांत हो जाता है।
यही असली शांति है। भोग को देखो, इस्तेमाल करो, पर उसके गुलाम मत बनो।
जैसे तुम साइकिल चलाते हो, साइकिल तुम्हें नहीं चलाती। वैसे ही भोग को चलाओ, भोग तुम्हें न चलाए।
बस इतनी सी बात है। करके देखो, 3
दिन में फर्क दिखेगा।
सोचो, जिसके मन में दिन-रात भूख, प्यास, काम, और इन्द्रियों के भोगों की ही भावना भरी हुई है, क्या वह कभी परमात्मा की सच्ची भावना कर पायेगा? जिसके हृदय में हर समय खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने और शारीरिक सुखों की ही कामना है, उसके हृदय में परमात्मा के लिए स्थान कहाँ बचेगा? एक हृदय में दो तलवारों का निवास नहीं हो सकता। या तो वहाँ भोग रहेंगे, या परमात्मा रहेंगे।
जिसको अभी भी घूमने-फिरने में, मेले-ठेले में, भीड़-भाड़ में, शोर-शराबे में ही मज़ा आता है, वह एकांत में कैसे रह पायेगा? और सत्य तो यह है कि परमात्मा तो एकांत में ही मिलता है। भीड़ में संसार मिलता है, एकांत में परमात्मा मिलता है। जब तक भीड़ का मोह नहीं छूटेगा, एकांत से प्रेम नहीं होगा, और जब तक एकांत से प्रेम नहीं होगा, तब तक परमात्मा की अनुभूति कैसे होगी?
भोगों में रस और सुख जान लेना, यही हमारे बंधन का सबसे बड़ा कारण है। हम सोचते हैं कि इस विषय में सुख है, इस भोजन में सुख है, इस व्यक्ति में सुख है। यही सोच हमें बाँध लेती है। वास्तव में देखने पर पता चलता है कि हम ज़रूरत से ज़्यादा कुछ भी करते हैं, तो उसमें रस नहीं आता। पहले एक मिठाई में जो आनंद आता था, दस मिठाई खाने पर उल्टी आने लगती है। पहले जिसमें सुख दिखता था, अब उसी में दुख दिखने लगता है। फिर यह स्थिति ऐसी हो जाती है जैसे न मिले तो ठीक, मिल जाये तो भी ठीक। यह वैराग्य की पहली सीढ़ी है।
जिसकी सारी व्यवस्था, सारा प्रबंध, सारा दिमाग सिर्फ इन्द्रियों के भोगों को जुटाने में ही लगा हुआ है, वह परमात्मा को पाने की व्यवस्था क्या करेगा? उसके पास समय ही कहाँ है? उसने तो अपना पूरा जीवन ही भोगों की गुलामी में लगा दिया है। सच तो यह है कि भोगों को हमने नहीं भोगा, बल्कि भोगों ने हमें भोग लिया है। हम सोचते हैं हम भोग कर रहे हैं, पर सच में भोग हमें खा रहे हैं। हमारी उम्र, हमारी ऊर्जा, हमारी बुद्धि, सब इन भोगों में ही नष्ट हो रही है।
और इसका प्रत्यक्ष फल आज सारी दुनिया में दिखाई देता है। सारी दुनिया परमात्मा के लिए उत्सुक नहीं है, बल्कि धन कमाने में उत्सुक है। हर व्यक्ति सुबह से शाम तक सिर्फ धन के पीछे भाग रहा है। क्यों? क्योंकि बिना धन के भोगों को भोगा नहीं जा सकता। भोग तो धन से ही आते हैं। इसलिए आदमी सोचता है कि धन ही सब कुछ है।
अच्छा खाना, अच्छा पीना, अच्छे कपड़े लेना, बड़े मकान में रहना, घूमना-फिरना, सुंदर स्त्री के साथ संभोग करना। व्यक्ति इन्हीं सब कामों को करता हुआ या इनको प्राप्त करने में ही लगा रहता है। उसके जीवन का लक्ष्य ही यही बन जाता है। उससे ऊपर उसकी सोच जाती ही नहीं।
लेकिन मनुष्य जीवन का यह उद्देश्य नहीं है। संसार को भोगों की दृष्टि से देखने से ऊपर उठकर, एक परमात्मा के मार्ग में लगाना ही वास्तव में जीवन का असली उद्देश्य है। यह शरीर हमें भोग भोगने के लिए नहीं, बल्कि भोगों से पार जाने के लिए मिला है।
हमसे पहले भी इस धरती पर करोड़ों लोग आये। उनके मन में भी भोगों की तीव्र इच्छा रही। उन्होंने भी कई प्रकार की अय्याशी की, बड़े-बड़े महल बनाये, बड़ी-बड़ी सेनाएँ जुटाईं, सुंदर स्त्रियों का उपभोग किया। लेकिन आज वे सब कहाँ हैं? आज वे सब मृत्यु के मुख में हैं। उनका नाम भी लेने वाला कोई नहीं बचा। उनके महल खंडहर बन गये। उनके भोग उनके साथ नहीं गये।
इसीलिए बुद्धिमान व्यक्ति को सोचना चाहिए कि जब उन सबका यही हाल हुआ, तो हमारा भी यही हाल होगा। फिर इन नष्ट होने वाले भोगों के पीछे अपना अमूल्य जीवन क्यों नष्ट करना?
हमारा सारा जीवन भोगों में न होकर परमात्मा की ओर लगे, तब जाकर हमें आत्मा की परम शांति का अनुभव होगा। वह शांति जो संसार के किसी भी भोग में नहीं मिल सकती। संसार के भोग तो क्षण-भंगुर हैं, आते हैं और चले जाते हैं। पर परमात्मा का सुख अखंड है, शाश्वत है।
जीवन में जो कभी न मिले उसकी आशा रखना व्यर्थ है। संसार के भोग आज हैं, कल नहीं हैं, इसलिए उनकी आशा रखना व्यर्थ है। अगर आशा रखनी ही है, तो परमात्मा की प्राप्ति की आशा रखनी चाहिए। क्योंकि वह एक ऐसी संपत्ति है जो मृत्यु के बाद भी साथ जाती है।
क्योंकि मृत्यु के बाद कभी कोई लौट कर नहीं आता। वहाँ यह कहना संभव नहीं है कि परमात्मा ने जो भोग दिये उन्हें भोग लूँ, इसके अलावा कि मैं भोगों के पीछे जाऊँ। यह असंभव है। मनुष्य योनि बार-बार नहीं मिलती।
इसलिए मैंने निश्चय किया है कि मैं तो परमात्मा के पीछे ही जाऊँगा। बिना परमात्मा को जाने इस जीवन में भोगों में दिल लगाने वाले लोग अंत में कई नरकों में ही जाते हैं। क्योंकि भोग हमें परमात्मा से दूर ही ले जाते हैं। जिसने यह जान लिया कि भोग में ही सुख है, उसके लिए परमात्मा के सुख कभी भी उपलब्ध नहीं हो पायेंगे।
*ॐ दत्तात्रेय नमः*




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