लोकवासना से मुक्ति
लोकवासना से मुक्ति ही परमात्मा की ओर पहला कदम है
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में दूसरों का प्रभाव रहता है। जन्म से ही हम समाज के बीच घिरे होते हैं। परिवार, रिश्तेदार, मित्र, पड़ोसी - सबके अपने नियम, अपनी अपेक्षाएं। मनुष्य जब अपने जीवन को अपने ढंग से, अपनी आत्मा की आवाज पर जीना चाहता है, तो समाज नाम की एक अदृश्य दीवार उसके आड़े आ जाती है।
समाज कहता है - ऐसा करो, वैसा मत करो। लोग क्या कहेंगे? यह भय मनुष्य को जीवन भर गुलाम बनाए रखता है।
जिस किसी ने भी सत्य को जाना, वह सबसे पहले लोकवासना से मुक्त हो गया। लोकवासना क्या है? लोक का अर्थ है संसार, भीड़, समाज और वासना का अर्थ है इच्छा - यानी लोगों से मान्यता पाने की इच्छा, लोगों द्वारा स्वीकार किए जाने की इच्छा, लोगों की नजर में अच्छा बने रहने की इच्छा। यही लोकवासना है।
समाज में बातें फैलाने से कोई सत्य को झूठ नहीं कर पाएगा। सत्य तो सूर्य के समान है, उसे बादल कुछ देर ढक सकते हैं, मिटा नहीं सकते। जिसने भी झूठ का सहारा लिया, वह एक दिन सत्य से बहुत दूर, समाज के ही चंगुल में फंस जाता है। क्योंकि झूठ को बनाए रखने के लिए सौ झूठ और बोलने पड़ते हैं। और समाज झूठ को बहुत जल्दी अपनाता है, क्योंकि झूठ मनोरंजक होता है, चटपटा होता है। सत्य सीधा है, सरल है, इसलिए समाज सत्य से मुंह फेर लेता है।
लोकवासना से मुक्ति इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वह हमें सत्य से, जो कि स्वयं परमात्मा है, उससे दूर कर देती है। हम एक ऐसा संसार बना लेते हैं जो अहंकारी लोगों द्वारा बनाया गया है। उस संसार में प्रतिष्ठा है, पद है, प्रशंसा है। हम उसी कृत्रिम संसार के सहारे अपनी पूरी जिंदगी गुजार देते हैं। हमें लगता है कि लोग हमें अच्छा कहेंगे तो हम सुखी हो जाएंगे।
लेकिन यह संसार तो मिट जाएगा। यह शरीर मिट जाएगा, यह प्रतिष्ठा मिट जाएगी, यह भीड़ मिट जाएगी। जो आज तालियां बजा रही है, वही कल गालियां भी देगी। भीड़ का कोई भरोसा नहीं।
एक मात्र परमात्मा के सहारे ही जिंदगी जीने का असली स्वाद है। जो हमें अपने जीवन का अमूल्य उपहार मिला है, उसको परमात्मा के लिए समर्पित कर देना चाहिए। हम परमात्मा के अंश हैं, और अंश को अपने अंशी में ही लौटना है।
मूर्ख व्यक्ति ही इन बातों को महत्व देता है कि - कोई मेरे बारे में क्या सोचता है? लोग मुझसे नाराज न हो जाएं, मेरे बारे में बुरा न बोलें, कहीं मुझे हंसी का पात्र न बनाया जाए। यह सब विचार केवल उसी व्यक्ति के मन में चलते हैं जिसको संसार में ही सुख दिखता है। वह सोचता है कि सुख दूसरों से मिलेगा, दूसरों की स्वीकृति से मिलेगा। वह दूसरों की आंखों में अपनी छवि देखता रहता है।
लेकिन परमात्मा के प्रति समर्पित व्यक्ति, अवधूत, केवल एक ही विचार करता है - परमात्मा मेरे बारे में क्या सोचता है? उसके सारे कर्म इसी हेतु होते हैं कि कहीं परमात्मा नाराज न हो जाए। वह डरता है तो सिर्फ एक बात से - कहीं मैं परमात्मा से दूर न हो जाऊं, कहीं परमात्मा मुझे भुला न दे।
यह दोनों दृष्टिकोणों में जमीन-आसमान का अंतर है। एक व्यक्ति संसार को खुश करने में लगा है, दूसरा परमात्मा को। संसार को खुश करना असंभव है, परमात्मा को खुश करना बहुत सरल है - बस सच्चे हृदय से याद कर लो।
लोकवासना से मुक्ति ही परमात्मा की दिशा में चलने की शुरुआत है। जब तक तुम लोगों की परवाह करोगे, तुम परमात्मा की परवाह नहीं कर सकते। दोनों एक साथ नहीं चल सकते।
इसलिए मेरे दोस्त, दोस्त बनाना ही है तो केवल परमात्मा को बनाओ। रिश्ता रखना ही है तो केवल परमात्मा से रखो। अपना सुख-दुख, अपनी पीड़ा, अपनी खुशी - सब उसी से कहो। उसी से बातें करो। वह सुनता है, क्योंकि वह तुम्हारे भीतर ही बैठा है।
लोगों की भीड़ केवल मनोरंजन करती है। जब तक तुम्हारे पास कुछ है, जब तक तुम उनके मतलब के हो, तब तक भीड़ है। जिस दिन तुम अकेले पड़ गए, भीड़ गायब हो जाएगी। परमात्मा ही एकमात्र साथ देने वाला है। वह सुख में भी साथ है, दुख में भी साथ है, जीवन में भी साथ है, मृत्यु में भी साथ है।
जिसने भी भीड़ की तरफ देखा, वह परमात्मा के लिए अपरिचित हो गया। और जिसने स्वयं को अकेला कर लिया, भीड़ से मुक्त कर लिया, वह परमात्मा के लिए अपना हो गया। अकेलापन ही परमात्मा से मिलने की प्रयोगशाला है।
भीड़ में तुम परमात्मा को नहीं पा सकते, क्योंकि भीड़ में तुम खुद को ही खो देते हो। अकेले में तुम खुद को पाते हो, और खुद को पाते ही परमात्मा मिल जाता है।
मैंने अपने जीवन में एक बात बहुत गहराई से देखी है। हम पैदा तो अकेले होते हैं, पर जीते हमेशा भीड़ के लिए हैं।
बचपन से ही मेरे कानों में एक ही बात डाली गई - लोग क्या कहेंगे? अच्छे कपड़े पहनो, लोग क्या कहेंगे? ज्यादा मत हंसो, लोग क्या कहेंगे? ये काम मत करो, समाज क्या कहेगा? धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि मैं अपना जीवन जी ही नहीं रहा था, मैं तो समाज का जीवन जी रहा था।
मेरे चारों तरफ एक अदृश्य जेल थी। परिवार, रिश्तेदार, मित्र, पड़ोसी - सबके अपने नियम। मुझे लगा कि अगर मैंने अपनी आत्मा की आवाज सुनी, तो ये सब नाराज हो जाएंगे। और मैं इसी डर में जीता रहा। यही लोकवासना है।
लोकवासना क्या है, मैंने कैसे जाना?
लोकवासना का अर्थ बहुत गहरा है। लोक यानी ये भीड़, ये संसार, और वासना यानी इच्छा। भीड़ से इज्जत पाने की इच्छा, भीड़ में अच्छा दिखने की इच्छा।
मैं भी इसी में फंसा था। मुझे लगता था कि अगर चार लोग मेरी तारीफ कर देंगे, तो मैं सुखी हो जाऊंगा। मैं अच्छे कपड़े इसलिए पहनता था कि लोग देखेंगे, मैं मीठा इसलिए बोलता था कि लोग मुझे अच्छा कहेंगे। पर भीतर से मैं बहुत खाली था। क्योंकि भीड़ कभी खुश होती ही नहीं। आज जो ताली बजाते हैं, कल वही गाली देते हैं। मैंने ये अपनी आंखों से देखा।
जब मैंने सच बोलना शुरू किया, जब मैंने अपने मन की बात लिखनी शुरू की, तो वही लोग जो कल तक मेरे दोस्त थे, मेरे बारे में बातें बनाने लगे। उन्होंने मेरे सच को झूठ बनाने की कोशिश की। तब मुझे एक बात समझ आई - सत्य को तुम दबा सकते हो, मिटा नहीं सकते। सत्य सूर्य जैसा है। बादल कुछ देर के लिए ढक लेंगे, पर सूर्य मिटता नहीं।
झूठ बहुत चटपटा होता है, इसलिए समाज झूठ को जल्दी अपनाता है। सत्य सीधा है, सरल है, इसलिए भीड़ सत्य से मुंह फेर लेती है। मैंने झूठ का सहारा लेकर भी देखा, पर एक झूठ को बचाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़े, और अंत में मैं खुद ही उस जाल में फंस गया।
मेरा सबसे बड़ा भ्रम टूटा
मैं सोचता था कि प्रतिष्ठा, पद, लोगों की वाह-वाही ही जीवन है। मैं एक नकली संसार बना कर जी रहा था। उस संसार में बस अहंकार था। मुझे लगता था कि लोग मुझे अच्छा कहेंगे तो मुझे आनंद मिलेगा।
फिर एक दिन श्मशान में बैठा था। एक शरीर जल रहा था। बड़ा नाम था उसका, बड़ी प्रतिष्ठा थी। पर जाते समय कुछ भी साथ नहीं गया। न उसकी प्रतिष्ठा, न उसकी भीड़। तब मेरे मन में एक बिजली सी कौंधी - ये सब तो मिट जाएगा। ये शरीर मिट जाएगा, ये नाम मिट जाएगा, ये भीड़ भी मिट जाएगी। फिर मैं किसके लिए जी रहा हूँ?
तभी मेरे भीतर पहली बार ये सवाल उठा - एकमात्र परमात्मा के सहारे जीने में ही असली स्वाद है। हम सब परमात्मा के अंश हैं, और अंश को तो अपने अंशी में ही लौटना है। ये बात शास्त्रों में पढ़ी थी, पर उस दिन पहली बार अनुभव हुई।
दो तरह के लोग, दो तरह के डर
मैंने दो तरह के लोग देखे हैं।
एक वो, जो हर पल डरते हैं - कोई मेरे बारे में क्या सोचेगा? कहीं लोग नाराज न हो जाएं, कहीं मेरी हंसी न उड़ाएं। ये लोग हर समय दूसरों की आंखों में अपनी छवि देखते रहते हैं। इनको लगता है कि सुख दूसरों से मिलेगा। मैं भी कभी ऐसा ही था।
दूसरे वो, जिनको मैं अवधूत कहता हूँ। वो फकीर लोग। उनका डर बिल्कुल अलग है। वो ये नहीं सोचते कि लोग क्या सोचेंगे, वो सोचते हैं - परमात्मा मेरे बारे में क्या सोचेगा? कहीं परमात्मा नाराज न हो जाए, कहीं मैं उससे दूर न हो जाऊं।
इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। संसार को खुश करना असंभव है। तुम एक को खुश करोगे, दूसरा नाराज हो जाएगा। पर परमात्मा को खुश करना बहुत सरल है। बस सच्चे दिल से एक बार याद कर लो, वो खुश हो जाता है।
भीड़ से अकेलेपन की ओर - मेरी यात्रा
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| Aataman |
मैंने एक निर्णय लिया। मैंने कहा - बहुत हो गया। अब मैं ये नहीं सोचूंगा कि लोग क्या कहेंगे। अब मैं ये सोचूंगा कि मेरा परमात्मा क्या कहेगा।
जब मैंने ये सोचा, तो शुरू में बहुत अकेला हो गया। भीड़ हट गई। जो लोग मतलब के लिए साथ थे, वो चले गए। पर उसी अकेलेपन में मुझे पहली बार खुद से मिलने का मौका मिला।
मैंने जाना कि भीड़ में तुम खुद को खो देते हो। भीड़ में तुम परमात्मा को नहीं पा सकते। अकेलापन ही परमात्मा की प्रयोगशाला है।
लोगों की भीड़ केवल मनोरंजन करती है। जब तक तुम्हारे पास पैसा है, पद है, तब तक भीड़ है। जिस दिन तुम गिर गए, भीड़ गायब। पर परमात्मा? वो तो हर हाल में साथ है। सुख में भी, दुख में भी, जीवन में भी, मृत्यु में भी।
मैंने अपने सुख-दुख, अपनी सारी बातें अब परमात्मा से कहनी शुरू कर दीं। दोस्त बनाना है तो परमात्मा को बनाओ, रिश्ता रखना है तो उससे रखो। क्योंकि वो तुम्हारे भीतर ही बैठा है, वो सुनता है। दुनिया तो बाहर से सुनती है, और भूल जाती है।
यही मुक्ति का पहला द्वार है
मेरे अनुभव से कह रहा हूँ, जब तक तुम लोकवासना में फंसे हो, तब तक कोई साधना शुरू नहीं होगी। न भक्ति होगी, न ज्ञान होगा।
लोकवासना से मुक्ति ही पहला कदम है। यही असली धर्म है। धर्म का अर्थ मंदिर-मस्जिद नहीं, धर्म का अर्थ है - भीड़ से मुक्त होकर सत्य की ओर चलना।
जितने भी परमात्मा को पाए हैं - चाहे बुद्ध हों, महावीर हों, कबीर हों, नानक हों, जीसस हों या मोहम्मद - उन सबका जीवन देख लो। उन्होंने सबसे पहले क्या छोड़ा? लोगों की परवाह। बुद्ध ने राजपाट छोड़ा, लोगों ने क्या कहा, परवाह नहीं की। कबीर ने पूरी काशी को नाराज कर दिया, पर सच कहा।
क्योंकि उनको पता था - जिसने भी भीड़ की तरफ देखा, वह परमात्मा से अपरिचित हो गया। और जिसने खुद को भीड़ से अकेला कर लिया, वह परमात्मा का अपना हो गया।
तो आज मेरे भाई, मैं तुझसे भी यही कहूंगा - एक शपथ ले। आज से ये सोचना बंद कर दे कि लोग क्या कहेंगे।
लोकवासना को छोड़, परमात्मा को पकड़।
भीड़ मिट जाएगी, तू रह जाएगा। और जब तू रहेगा, तो परमात्मा तेरे साथ रहेगा।
अवधूत अंगिरस (मेरा अपना अनुभव)




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