मन की शक्तिया
जब मन विचारों को सत्य के रूप में देखता है, वही विचार सत्य हो जाते हैं।
यही मन का सबसे गूढ़ रहस्य है। मन की अपार शक्ति है। यह केवल सोचने का यंत्र नहीं, बल्कि सृष्टि को रचने वाली शक्ति है। जिसने भी मन को अपने हित के लिए इस्तेमाल करना सीख लिया, उसने मानो संसार में सारे फलों को प्राप्त कर लिया। परमात्मा का मोक्षरूपी प्रसाद भी मन के कारण ही प्राप्त होता है।
यह मन अपनी शक्ति से ही संसार को इंद्रियों के द्वारा दिखाता है। आँखें तो केवल देखती हैं, पर देखने का अर्थ मन देता है। कान केवल सुनते हैं, पर सुनने में रस मन घोलता है। इस मन ने प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में सुखों को भोगने वाला बनाया है। इस मन से ही भोगों के सुख में रस आता है। यदि रस ही न हो तो भोग क्या है? भोजन सामने है पर मन कहीं और है तो स्वाद नहीं आता। प्रिय व्यक्ति सामने है पर मन उदास है तो प्रेम का अनुभव नहीं होता। अतः सिद्ध है कि सुख बाहर नहीं, मन में है।
ये मन न हो तो संसार कभी उत्पन्न ही नहीं होता। इस मन को परमात्मा ने संसार को सत्य करने के लिए बनाया। यह एक दिव्य यंत्र है जिसके द्वारा परमात्मा स्वयं को देखता है। इस मन द्वारा ही परमात्मा अनंत रूपों में दिखाई देता है। कभी वह राम बन जाता है, कभी कृष्ण, कभी तुम्हारे मित्र के रूप में, कभी शत्रु के रूप में। रूप अनेक हैं, पर देखने वाला मन एक ही परमात्मा को उन रूपों में कल्पित कर रहा है।मन में ही सारे मोह है मन से ही सत्य लगते है
श्रुति का वचन है - मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है। यह कितना सत्य वचन है। मन में विचारों का प्रवाह कभी अंत नहीं पाता। जैसे नदी निरंतर बहती है, वैसे ही विचार निरंतर बहते हैं। एक विचार जाता है, दूसरा आता है। हम सोचते हैं हम विचार कर रहे हैं, पर सत्य तो यह है कि विचार हमें कर रहे हैं। हम विचारों के पीछे खिंचे चले जा रहे हैं।
इन विचारों ने ही मानव को परमात्मा होने से रोक रखा है। हम स्वयं ही ब्रह्म हैं, पर हम मानते हैं कि हम जीव हैं। यह मान्यता किसकी है? मन की। जिसको हम अवचेतन मन कहते हैं, वहाँ मन का सूक्ष्म रूप है, जिससे व्यक्ति सदा अपने जीवभाव के संस्कारों से जुड़ा रहता है। जन्म-जन्मांतर के संस्कार, भय, वासनाएँ, अधूरी इच्छाएँ, सब वहीं संचित हैं। वही हमें बार-बार उसी चक्र में घुमाता है। हम नया जीवन चाहते हैं पर पुराने संस्कारों से सोचते हैं। इसीलिए जीवन बदलता नहीं।
और इस मन का निवृत्त हो जाना ही मोक्ष है। मन का नाश नहीं, मन की चंचलता का, मन के मिथ्या अहंकार का नाश। जब मन शांत हो जाता है, निर्विचार हो जाता है, तब वह दर्पण की तरह स्वच्छ हो जाता है और उसमें परमात्मा का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देता है। तब पता चलता है कि खोजने वाला ही खोया हुआ था और पाने वाला ही पाया जाने वाला है।
मन ने ही जगत का इतना बड़ा इंतजाम किया हुआ है। जो भी जगत में कार्य किए जाते हैं, जितने भी आविष्कार हुए और जो कुछ भी हमें आज दिखाई पड़ता है और हमारे जीवन में रोज़मर्रा में इस्तेमाल होता है, वह सब मन के द्वारा ही है।
ज़रा सोचो - हवाई जहाज उड़ रहा है, वह पहले राइट बंधुओं के मन में एक कल्पना थी। यह मोबाइल जिस पर तुम पढ़ रहे हो, यह पहले किसी इंजीनियर के मन में एक विचार था। एक बड़ी इमारत पहले किसी के के मन में एक छोटी सी कल्पना थी, फिर पत्थर में उतरा। मन ने सारे रिश्ते बनाए। पिता, पुत्र, पति, पत्नी - ये शरीर के नहीं, मन के रिश्ते हैं। शरीर तो मिट्टी है, रिश्ता मन मानता है। सारे शास्त्र को मन ने ही बनाया। वेद, उपनिषद, गीता, कुरान, बाइबल - सब मन की उस अवस्था में लिखे गए जब मन परमात्मा से जुड़ गया था।
सारी वस्तुएँ मन में पहले एक विचार-रूप में थीं। सारे जगत में जिस किसी का भी निर्माण हुआ, वह पहले मन में ही एक कल्पना के रूप में था। अर्थात यह सारा जगत मन की कल्पना का स्थूल रूप है। इसीलिए ज्ञानी कहते हैं - जैसा मन, वैसा जगत। पवित्र मन को यह जगत पवित्र लगता है, प्रेमी को प्रेममय, और भयभीत मन को यह जगत भयावह लगता है। जगत एक ही है, पर हर मन में उसका प्रतिबिंब अलग है।
पृथ्वी में ही नहीं, चराचर सृष्टियाँ भी मन के द्वारा ही सत्य लगती हैं। वायु, अग्नि, आकाश, जल भी मन से ही भिन्न-भिन्न अनुभव में आते हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि पंचमहाभूत हैं, पर संत कहते हैं कि पंचमहाभूतों का अनुभव करने वाला छठा तत्व मन है। यदि मन न हो तो अग्नि की उष्णता कौन जानेगा? जल की शीतलता कौन जानेगा?
ये सूर्य, ये चाँद है, ये बृहस्पति है, ये शनि है आदि ग्रह-उपग्रह भी मन से ही इस तरह दिखाई पड़ते हैं। खगोलशास्त्र मन की ही खोज है। मन ही अनंत कोटि ब्रह्मांडों को अनंत रूपों में, भिन्न-भिन्न रंगों में दिखाता है। एक ही आकाश को कवि अलग देखता है, वैज्ञानिक अलग, और एक प्रेमी अलग। आकाश तो एक है, देखने वाले मन अलग हैं।
ये जो मन है, उसका अस्तित्व ही ब्रह्मांडों का अस्तित्व है। और इस मन का नाश ही ब्रह्मांडों का नाश है। सुषुप्ति में जब मन लीन हो जाता है गहरी नींद में, तब कहाँ रहता है यह जगत? कहाँ रहते हैं सूर्य-चंद्र? कुछ भी नहीं रहता। फिर जागते ही मन लौटता है और साथ ही पूरा जगत लौट आता है। इससे सिद्ध होता है कि जगत बाहर नहीं, मन के भीतर है।
केवल परमात्मा ही सत्य है। जो मन में अनन्त कोटि ब्रह्मांडों का जाल दिखाई पड़ता है, वह केवल मन में ही सत्य है, वरना उसका कोई अस्तित्व नहीं। निस्संदेह ये मन की ही माया है।
और अंत में यही समझना है - ये मन अपार शक्ति का मालिक है। यह बंधन भी बनाता है और यही मोक्ष का द्वार भी खोलता है। यदि यह मन संसार की ओर बहता है तो बंधन है, और यदि यही मन परमात्मा की ओर मुड़ जाता है तो यही मोक्ष बन जाता है। मन को मारना नहीं है, मन को मोड़ना है। जैसे नदी को रोकने से बाढ़ आती है, पर उसी नदी को मोड़ने से खेत हरे-भरे हो जाते हैं।
मन ऐसा मित्र है जो तुम्हे स्वयं परमात्मा ही कर दे ।मन ऐसा शत्रु है जो तुम्हे नर्कों के दर्शन करवादे
इसलिए मन को शत्रु नहीं, मित्र बनाओ। इसे साक्षी भाव से देखना सीखो। विचार आएंगे और जाएंगे, तुम केवल देखने वाले बने रहो। धीरे-धीरे विचारों का प्रवाह शांत होगा ।मन के भोगों के पीछे मत भागे।मन के विचारों को सत्य न माने केवल झूठ ही जाने ।उस शांति में ही उस परम सत्य का दर्शन होगा जो सदा से तुम्हारे भीतर मौजूद था।
मन के विचार ही जीवन बनाते हैं - विचारों को चुनना सीखो
मन में जो भी विचार चलते हैं, अगर वो हद से ज्यादा बढ़ जाएं तो उनका सत्य होना तय है। इसलिए मन के विचारों को सोच-समझकर ही चुनें।
मन एक नदी के समान है, जिसमें विचारों का प्रवाह लगातार चलता रहता है। यह प्रवाह कभी रुकता नहीं है। समस्या विचारों का आना नहीं है, समस्या यह है कि हम स्वयं उन विचारों को सत्य मानकर उनसे जुड़ जाते हैं। जब एक नकारात्मक विचार आता है और आप उसे पकड़ लेते हैं, तो वही विचार धीरे-धीरे पहाड़ बन जाता है।
नकारात्मक विचारों को बढ़ावा न दें
किसी भी नकारात्मक विचार को बढ़ावा मत दीजिये। मन के विचारों में उतना ही ध्यान दें जितना जरूरी है। उनके बारे में ज्यादा मत सोचिये। अगर आप ज्यादा सोचेंगे तो वह विचार मजबूत होगा।
जैसे एक छोटा सा बीज होता है। अगर आप उसे रोज पानी देंगे तो वह बड़ा पेड़ बन जायेगा। वैसे ही नकारात्मक विचार भी एक बीज है। अगर आपने कहा - "मेरी जिंदगी खराब है, मेरे पास कुछ नहीं है, मुझे कोई पसंद नहीं करता" - और इस विचार को आपने रोज सोचा, तो एक दिन यही विचार आपका सत्य बन जायेगा।
मन सबसे बड़ा शत्रु
याद रखिये, इस तरह के नकारात्मक विचार केवल संसार के हैं। आप इन्हें असत्य ही जानिये। इनका अस्तित्व केवल मन के कारण है। इस मन ने ही संसार को सत्य मान लिया है। संसार में कुछ भी सत्य नहीं है, सब कुछ बदलने वाला है।
नकारात्मक विचारों को कैसे रोकें?
विचारों का प्रवाह तो आता रहेगा, उसे आप रोक नहीं सकते। लेकिन आप उसे देख सकते हैं। जब भी कोई नकारात्मक विचार आये, तो खुद से कहिये -
"ये विचार मैं नहीं हूँ। ये तो असत्य है। क्योंकि मैं तो परमात्मा का स्वरूप हूँ और मुझमें विचार उत्पन्न नहीं होते। ये तो माया के संसार के विचार हैं, उसी की तरह एक माया है, झूठ है।"
इस तरह से आप अपने नकारात्मक विचारों को रोक सकते हैं। आपको लड़ना नहीं है, बस देखना है। जानना है कि "मैं तो केवल विचारों को देखने वाला हूँ, विचारों को देखने वाला विचारों से अलग है।"
आप अपने चैतन्य रूप में स्थित रहें, जो स्वयं परमात्मा ही है। उस स्वरूप में न मन है, न उसका संसार है। जब आप उस अवस्था में रहते हैं, तब मन के बिना वजह के विचार आपको छू भी नहीं पाते। जानिये कि ये विचार आते-जाते रहने वाले हैं। ये मेहमान हैं, घर के मालिक आप हैं। मेहमान आयेगा और चला जायेगा।
सकारात्मक विचारों की शक्ति
जब आपने नकारात्मक विचारों को रोकना सीख लिया, फिर आप सकारात्मक विचारों को बढ़ावा देने वाले बन जाते हैं। सकारात्मक विचारों से ही आप अपने जीवन में आश्चर्यजनक बदलाव कर पाएंगे।
हमारा शास्त्र कहता है - जैसे विचार, वैसे कर्म। जैसे कर्म, वैसा जीवन।
आप जिस किसी काम में माहिर होना चाहते हैं, जानिये कि आप उस काम में माहिर हैं। जो भी चाहते हैं, जानिये कि आप उसे पा चुके हैं। मान लीजिये आप चाहते हैं कि आप शांत रहें, तो सुबह उठते ही सोचिये - "मैं शांत हूँ, मैं परमात्मा का अंश हूँ, मुझमें शांति भरी हुई है।" इस विचार को सत्य मान लीजिये। इसमें कुछ बुरा नहीं है। सकारात्मक विचारों को सत्य मान लेने से आपका जीवन ही बदल जायेगा।
अगर आप धन चाहते हैं तो रोना बंद करो कि मेरे पास नहीं है। जानो कि परमात्मा ने सब कुछ दिया है। अगर आप प्रेम चाहते हैं तो जानो कि आप स्वयं प्रेम स्वरूप हो। जो आप अपने बारे में सोचते हो, वही आप बन जाते हो।
विचारों को परमात्मा की ओर मोड़ना
वैसे अगर आप परमात्मा के मार्ग में चलने वाले हो, तो इससे भी ऊँची बात है। सकारात्मक विचार भी आखिरकार संसार के ही हैं। सबसे ऊँचा मार्ग है - अपने सारे विचारों को परमात्मा को अर्पण कर देना।
परमात्मा की कल्पना करो, उसी का ध्यान करो, उसी का नाम लो। अपने मन के विचारों को केवल परमात्मा के लिए उठने दो। ये मन तो मूर्ख है, जो परमात्मा को भूल जाना चाहता है। यह संसार की व्यर्थ बातों में उलझना चाहता है।
इस मन को आप अपने पुरुषार्थ से बार-बार खींच कर लाओ। जैसे एक छोटा बच्चा बार-बार बाजार की तरफ भागता है और माँ उसे बार-बार खींच कर घर लाती है, वैसे ही आपको भी अपने मन को बार-बार संसार से खींच कर परमात्मा की ओर लाना है।
ये दो-चार दिन का कार्य नहीं है। इसको करने में आपका पूरा जीवन चला जाये तो भी कम है। जैसे ही बेवजह के विचारों का प्रवाह आये, उसे जबरदस्ती परमात्मा के विचारों की ओर ले जाओ। शुरू में मन विरोध करेगा, भागेगा, लेकिन धीरे-धीरे वही मन आपका मित्र बन जायेगा।
जब आपका मन केवल परमात्मा के विचारों में लगने लगेगा, तब वही मन आपका सबसे बड़ा मित्र बन जायेगा। फिर वही मन आपको परमात्मा तक पहुंचा देगा।
हमारा जीवन यदि परमात्मा का हो जाए तो हम परमात्मा के सबसे ज्यादा दुलारे हो जाएंगे। इसलिए आज से ही अपने विचारों पर ध्यान देना शुरू करें। नकारात्मक विचार आये तो उसे असत्य जानकर छोड़ दें, और हर विचार को परमात्मा को अर्पण कर दें।
यही जीवन का सार है - विचारों को शक्ति से ही आप परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं।
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