मोक्ष क्या है, इसे समझने के लिए हमने कई सिद्ध संतों से बात की। हमने 4 वेदों, 108 उपनिषदों, 18 पुराणों, गीता, भागवत पुराण और शिव सूत्र जैसे कई वैदिक ग्रंथों का अध्ययन किया। उन सब ग्रंथों से जो ज्ञान मिला, उसी से इस ब्लॉग को लिखा जा रहा है।
शास्त्रों में मोक्ष के तीन मुख्य रास्ते बताए गए हैं - ज्ञान, भक्ति और कर्म। इन्हीं रास्तों पर चलकर कई महात्माओं ने मोक्ष पाया है।
पिछले लेख में हमने जाना था कि मोक्ष कोई जगह नहीं, बल्कि एक अवस्था है, जिसमें कोई भी स्थित हो सकता है। पर सच यह है कि इसे पाना आसान नहीं है। हमारी आत्मा न जाने कितने जन्मों से कितने शरीर बदलती आ रही है। उन जन्मों के संस्कार हमारे मन पर परत की तरह जमे हुए हैं।हमारा मन और शरीर हमें संसार से मुक्त होने से रोकने के लिए भरपूर प्रयास करेगी
कलयुग में तो यह और भी कठिन हो गया है। अब यह सिर्फ साधना नहीं, एक आंतरिक युद्ध बन गया है। यह युद्ध व्यक्ति को अंदर से तोड़ देता है। कई बार लगता है जैसे सब कुछ छिन गया हो। मोक्ष चाहने वाला व्यक्ति आम लोगों जैसा सामान्य जीवन नहीं जी सकता। उसे हर पल खुद से और इस दुनिया के कठोर लोगों से लड़ना पड़ता है।
इसी विषय पर हमें एक ऐसे सिद्ध पुरुष का लिखा पत्र मिला है जो इस समय समाधि में हैं। वही पत्र आज हम इस ब्लॉग में आपके साथ साझा कर रहे हैं।
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| Himalaya ki gufa me samadhi me leen siddh mahatma avdhoot shiromani lokapal ji ka dhyan chitra jo moksha ka gyan de rahe hain |
मोक्ष की प्राप्ति - एक पत्र के रूप में
प्रिय आत्मीय मित्र
तुम्हारा पत्र मिला हमे ये लो भाई,
तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर बहुत देर तक तुम्हारे बारे में सोचता रहा।
तुमने लिखा है कि सब कुछ होते हुए भी मन अशांत रहता है। घर है, परिवार है, काम है, फिर भी भीतर एक खालीपन सा लगता है। और मन में बार-बार एक ही प्रश्न उठता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है।
तुम्हारा यह प्रश्न ही बहुत अनमोल है। सच कहूँ तो ज़्यादातर लोग पूरी ज़िंदगी बिना प्रश्न के ही जी लेते हैं। तुमने प्रश्न पूछा है, इसका अर्थ है तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा का पहला द्वार खुल चुका है। यह घबराने की बात नहीं, यह जागने की बात है।
तुमने मोक्ष के बारे में जानना चाहा है। मैं कोई बड़ा ज्ञानी नहीं हूँ, तुम्हारे जैसा ही एक पथिक हूँ। जो कुछ संतों से सुना है, शास्त्रों में पढ़ा है और जीवन में थोड़ा-बहुत अनुभव किया है, वही तुम्हें एक मित्र की तरह लिख रहा हूँ।
सबसे पहले यह समझो कि मोक्ष का अर्थ मृत्यु नहीं है। हम बचपन से सुनते आए हैं कि मरने के बाद मोक्ष मिलता है, स्वर्ग मिलता है। ऐसा नहीं है।
मोक्ष का सीधा अर्थ है - जीते जी बंधनों से मुक्त हो जाना।
हम बंधे हुए हैं। किससे बंधे हैं? हम अपने शरीर से बंधे हैं, अपने विचारों से बंधे हैं। मैं सुंदर हूँ, मैं असफल हूँ, लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे, मुझे और चाहिए - इन्हीं पतले धागों ने हमें जकड़ रखा है। हम अपने अतीत की यादों से और भविष्य की चिंताओं से बंधे हैं। जिस दिन ये धागे टूट जाते हैं, मन बिल्कुल हल्का हो जाता है, कोई बोझ नहीं रहता। उसी अवस्था का नाम मोक्ष है।
हमारे सनातन धर्म में मोक्ष तक पहुँचने के तीन मुख्य मार्ग बताए गए हैं - ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग और कर्म मार्ग। तुम अपनी प्रकृति के अनुसार कोई भी मार्ग चुन सकती हो, तीनों एक ही शिखर पर ले जाते हैं।
अपना ध्यान रखना। जब मन फिर अशांत हो तो पाँच मिनट आँखें बंद करके बैठ जाना।
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| Moksha ke teen marg gyan yog bhakti yog aur karma yog ko darshata hua adhyatmik chitra jisme prakash ka marg dikhaya gaya hai |
ज्ञान मार्ग
ज्ञान मार्ग कहता है कि हमारी सबसे बड़ी बाधा अज्ञान है। जब तक व्यक्ति खुद को सिर्फ एक शरीर मानता है, तब तक उसकी सोच भी बहुत सीमित रहती है। वह शरीर के ही सुख-दुख, मान-अपमान में उलझा रहता है। वह दूसरों को भी सिर्फ शरीर के रूप में देखता है और उसी हिसाब से व्यवहार करता है। ऐसे में वह उस विराट सत्य को कभी देख ही नहीं पाता जो शरीरों के पीछे है, और उसी में फंसा रह जाता है।
तुमने पत्र में पूछा था कि शरीर के मोह से मुक्ति कैसे मिले। तुम्हारा यह सवाल ही इस बात का सबूत है कि तुम शरीर नहीं हो। अगर तुम शरीर होते, तो यह सवाल उठता ही नहीं। तुम मोह को देख पा रहे हो, इसका मतलब तुम उससे अलग हो।
सच में ज्ञान मार्ग पर वही चल सकता है जिसमें सच्ची जिज्ञासा हो। तुम भी अपनी यात्रा पर चलते रहो। तुम्हारे मन में यह प्रश्न उठा है, इसका अर्थ है कि परमात्मा ने खुद तुम्हारे लिए अपने तक आने का द्वार खोल दिया है।
यह शरीर तो एक दिन नष्ट हो जाएगा। फिर पूरा जीवन सिर्फ इसके लिए क्यों जीना? इससे अच्छा है कि जीवन को आत्मा के लिए जिया जाए, जो कभी नष्ट नहीं होती।
जितने भी सिद्ध महात्मा हुए, उन्होंने जीवन शरीर के लिए नहीं, अपनी आत्मा के लिए जिया, जो परमात्मा का ही अंश है। ज्ञानी को यह जानना चाहिए कि मैं शरीर नहीं, परमात्मा ही मेरे रूप में है। और केवल मेरे रूप में नहीं, यह सारा जगत भी परमात्मा का ही रूप है।
ज्ञानी बनने के लिए बहुत शास्त्रों की जरूरत नहीं। बस एक बात पर अटल रहो - न संसार था, न है, न होगा। है तो केवल परमात्मा। तुम भी नहीं, केवल परमात्मा ही है। जो इस भाव में जीते हैं, वही मोक्ष को पा लेते हैं।
भक्ति मार्ग
भक्ति में ही शक्ति है। यही वह युक्ति है जो सीधे परमात्मा तक ले जाती है। भक्ति की शक्ति से ही प्रहलाद के लिए भगवान को नरसिंह बनकर आना पड़ा। भक्ति के मार्ग पर चलने वाले जितने भी भक्त हुए हैं, परमात्मा ने उन्हें कभी निराश नहीं किया। जब-जब भक्त निराश हुआ, भगवान स्वयं आशा बनकर उसके सामने आ खड़े हुए।
भक्त का जीवन यदि कभी गहरे अंधकार में भी फंस जाता है, तो स्वयं परमात्मा ही प्रकाश बनकर उसका मार्ग दिखाते हैं।
चाहे शैव हो, शाक्त हो या वैष्णव, हर संप्रदाय ने भक्त और भक्ति की कथाएं कही हैं। मैंने कई संप्रदायों के भक्तों से उनके प्रसिद्ध भक्तों की कथाएं सुनी हैं। उन्हें सुनाते हुए उनका भाव ऐसा होता था, जैसे स्वयं परमात्मा ही सामने खड़े हों। उन्हें सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए।
भक्त की महिमा तो स्वयं भगवान ही जानते हैं। संसार की नजर में वह भक्त कैसा भी हो, लेकिन भगवान के लिए वह तो बस उनका अबोध बच्चा है। जैसे माता-पिता अपने नवजात बच्चे से प्रेम करते हैं, वैसा ही दुलार भगवान अपने भक्त से करते हैं। भक्त की महिमा का वर्णन तो भगवान ही कर सकते हैं।
भगवान को भक्त-वत्सल कहा गया है। श्रुति कहती है कि भगवान सब कुछ कर सकते हैं, पर एक भक्त का विश्वास कभी नहीं तोड़ते।
भक्तों ने कभी मोक्ष को चाहा ही नहीं। उनके लिए तो मोक्ष शब्द भी अनजाना है। वे तो परमात्मा के प्रेम में इतने मगन हैं कि उनकी स्थिति वही समझ सकता है जिस पर प्रेम का रंग चढ़ा हो।
भक्ति मार्ग तुम्हें यह नहीं सिखाता कि मोक्ष कैसे मिलेगा, बल्कि यह सिखाता है कि मोक्ष का सवाल ही मिट जाए। तुम्हारा परमात्मा से इतना अटूट प्रेम हो जाए कि वह सुख दे या दुख, मोक्ष दे या न दे, तुम्हें फर्क ही न पड़े। बस तुम उसके प्रेमी बन जाओ, क्योंकि प्रेम ही परमात्मा है और परमात्मा ही सत्य है।
कर्म मार्ग
कर्मों के जाल से मुक्त होने से ही हमें मोक्ष प्राप्ति होती है ये कर्म क्या है ये कर्म का बंधन क्या है ये कर्म सिद्धांत क्या है ये कर्म क्यों करना अनिवार्य है ये सब बाते तुमने मुझे अपने पत्र के माध्यम से
पूछी तो इसका उतर भी सीधा साफ है जिसने कर्म किया वो फल पाएगा ही जिसने अच्छा कर्म किया वो अच्छा फल जिसने बुरा कर्म किया वो बुरा फल ये कर्म सिद्धांत कभी नहीं बदलता इसलिए जीव कर्मों से ही जन्म मरण के चक्कर काटते है लेकिन जो कर्म ही न करे तो जिसमें ये सवाल बन जाए कि मैं करने वाला नहीं हु ये सब स्वयं परमात्मा ही करता है वो मेरे द्वारा ही सब करता है फिर उस में कर्महीनता जन्म लेती है फिर वो मोक्ष के द्वार में खड़ा है जिसने अपने को अकर्ता जाना और परमात्मा को करता जाना जिसने भी परमात्मा ही सत्य है वही सब करता है जब वही परमात्मा करने वाला है तो फल प्राप्त हो या न हो परमात्मा ने किया तो मैं क्यू निराश हो जाऊ मैने थोड़ी किया यही भाव कर्म योग सिखाता है जिसमें व्यक्ति संसार में रहकर अपने जीवन में जो भी सामने आ जाता है उसी में मै कौन हु करने वाला परमात्मा ही करेगा इस तरह की बुद्धि हो जाने से ही व्यक्ति में मोक्ष होना घटित होता है प्रिय मित्र,
कर्मयोग के बारे में तुमने पूछा, तो सुनो। कर्म से बचना संभव नहीं, शरीर है तो कर्म होगा ही। बंधन कर्म से नहीं, फल की इच्छा से बनता है।
गीता कहती है - कर्म करो, फल की चिंता मत करो। जो सामने काम आए, उसे ही पूजा समझकर करो। मैं कर रहा हूँ, यह भाव छोड़ दो। सोचो, परमात्मा ही मुझसे करा रहा है।
जब कर्ता भाव मिट जाता है, तब कर्म तुम्हें बांधता नहीं। सुख-दुख, लाभ-हानि में तुम समान रहते हो। यही मुक्ति है।
संसार में रहो, पर संसार को भीतर मत आने दो। यही कर्मयोग है।
धन्यवाद
आपका मित्र
अंत में
अंत में मैं बस यही कहना चाहूँगा कि श्री श्री अवधूत शिरोमणि लोकापाल वासुदेव जी, जो इस समय हिमालय की एक गुफा में समाधि में लीन हैं, उनसे मेरा पत्र-व्यवहार हुआ था। मेरे मन में मोक्ष को लेकर जितने भी सवाल थे, उन्होंने उन सभी का बहुत ही संतोषजनक उत्तर दिया।
ऊपर लिखी गई ये कुछ बातें उन्हीं की हैं, जो उन्होंने मोक्ष के विषय में मुझे समझाईं। आगे भी उनकी आज्ञा से मैं उनके पत्रों में लिखे ज्ञान को आप तक पहुँचाता रहूँगा।
इस लेख को अंत तक पढ़ने के लिए आपका दिल से आभार। मुझे पूरा विश्वास है कि इसे पढ़कर आपका मन परमात्मा के प्रति और भी समर्पित होगा।
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